ककड़िया विद्यालय की छात्राओं ने छठ पूजा की निकाली झांकी....!!

●अभिनय के जरिये बच्चों ने छठ महापर्व की महिमा का किया बखान
●मानव को प्रकृति से जोड़ने का महापर्व है छठ पूजा 
●प्रकृति से प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है छठ महापर्व
●पर्यावरण व जैव संरक्षण से लोगों को जोड़ता है छठ महापर्व
नूरसराय-ककड़िया,20 अक्टूबर 2025 : मध्य विद्यालय ककड़िया के प्रांगण में विद्यालय परिवार ने शनिवार की देर शाम भारतीय संस्कृति का महापर्व छठ पारंपरिक मूल्यों को आत्मसात करते हुए प्रधानाध्यापक शिक्षाविद् दिलीप कुमार की अध्यक्षता में छठ की अपरंपार महिमा पर जीवंत आकर्षक झांकी प्रस्तुत कर मन मोहा।
प्रधानाध्यापक दिलीप कुमार के मार्गदर्शन में, छात्राओं ने छठ पूजा से जुड़ी विभिन्न विधियों को मंच पर जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। इसमें खरना की तैयारी, सूर्य को अर्घ्य अर्पण और डाला सजाने जैसे दृश्य शामिल थे। झांकी में सूर्य को अर्घ्य देने, छठ मइया की आराधना और घाट की पूजा का मनमोहक चित्रण किया गया। उन्होंने कहा- छठ महापर्व हमें प्रकृति से भी जोड़ता है। नदी, तालाब आदि जल-स्त्रोत के करीब घाटों पर छठ की पूजा होती है, इस तरह इस पर्व में हम प्रकृति के समीप पहुंचते हैं। छठ पर्व पर हमें नदी और तालाब जैसे हमारे जल-स्त्रोतों के भी संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लेना चाहिए।
मौके पर शिक्षक राकेश बिहारी शर्मा ने कहा कि इस झांकी के माध्यम से भारतीय संस्कृति से जोड़ना, स्वच्छता, नारी सम्मान, प्रकृति प्रेम और स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश देना है। मानव को प्रकृति से जोड़ने का महापर्व है छठ पूजा। यह पर्व वास्तव में प्रकृति से जुड़ने और उसकी पूजा करने का एक उत्सव है। जिसमें न तो मूर्ति पूजा होती है और न ही भव्य सजावट, बल्कि सीधा प्रकृति के तत्वों को ही पूजा जाता है।  छठ में सबसे महत्वपूर्ण स्थान सूर्य देव का है, जो सभी ऊर्जा और जीवन का स्रोत हैं। उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देना हमें बताता है कि जीवन के हर चरण का सम्मान करना चाहिए। यह हमें प्रकृति के चक्र और हमारे अस्तित्व में उसकी भूमिका की याद दिलाता है। यह पर्व नदियों या प्राकृतिक जलस्रोतों के तट पर किए जाते हैं। भक्त पूजा से पहले इन जलस्रोतों की सफाई करते हैं, जो जल संरक्षण और पारिस्थितिक जागरूकता को बढ़ावा देता है।
विद्यालय की शिक्षिका पूजा कुमारी एवं अनीता कुमारी ने बताया कि महापर्व छठ झांकी का एक मात्र उद्देश्य छात्राओं में बिहार की संस्कृति, लोक परंपरा और धार्मिक आस्था के प्रति जागरूकता पैदा करना है। ऐसे आयोजन बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कृति और अध्यात्म की ओर उन्मुख करते हैं।
शिक्षक मो. रिजवान अफ़ताब ने कहा कि इस छठ पूजा में प्रसाद बनाने से लेकर पूजा की अन्य सामग्रियों तक, प्राकृतिक रूप से उपलब्ध चीजों का इस्तेमाल होता है। बांस की टोकरी, मिट्टी के चूल्हे और प्राकृतिक प्रसाद जैसी चीजें पर्यावरण के प्रति सम्मान दर्शाती हैं। उन्होंने कहा- लोक आस्था का महापर्व छठ धार्मिक व आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ आम लोगों को पर्यावरण जैव व जल संरक्षण से जोड़ता है। यह स्वच्छता व प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। छठ वैज्ञानिकता से जुड़ा हुआ है। 
जितेन्द्र कुमार मेहता ने कहा- यह महापर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति सिर्फ एक संसाधन नहीं, बल्कि एक पूज्यनीय और महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके बिना जीवन संभव नहीं है। इस पर्व पर चढ़ाए जाने वाला केला, दीया, सूथनी, आंवला, बांस का सूप व डलिया किसी ने किसी रूप में हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है।
शिक्षक सतीश कुमार ने कहा- यह पर्व मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है और किसानों को उनकी मेहनत का फल देने वाली प्रकृति के प्रति आभार प्रकट करने का मौका देता है। सूर्य की उपासना का महापर्व छठ केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है, बल्कि ऊर्जा के अक्षय स्त्रोत सूर्य की पूजा और उन्हें मौसमी फलों का भोग लगाया जाना पर्यावरण के महत्व को दर्शाता है
विद्यालय परिसर में पारंपरिक छठ गीतों की स्वर लहरियां गूंज उठीं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
इस आयोजन में स्थानीय ग्रामीण, विद्यालय के शिक्षक रणजीत कुमार सिन्हा, सुरेश कुमार, मुकेश कुमार, बाल संसद के प्रधानमंत्री अर्जुन कुमार, शिक्षामंत्री सलोनी कुमारी, दिव्या भारती, मुश्कान कुमारी, राज नंदनी कुमारी, खुशी कुमारी, वर्षा कुमारी, राखी कुमारी, राशि कुमारी, लभली कुमारी, नंदनी कुमारी, स्नेहा कुमारी, चांदनी कुमारी, नीतु कुमारी, रेखा कुमारी, जौशन कुमार, राजवीर कुमार, आदित्य कुमार, रविश कुमार तथा विद्यालय परिवार के सदस्य उपस्थित रहे। उपस्थित लोगों ने छात्राओं की प्रस्तुति की सराहना की और कहा कि ऐसे आयोजन बच्चों में सांस्कृतिक जुड़ाव और नैतिक मूल्यों को मजबूत करते हैं।

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