साहित्यकार सुरेंद्र प्रसाद तरुण की 9 वीं पुण्यतिथि पर विशेष.....!!
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
अपने हुनर और काम से सबको हैरान कर देनेवाली प्रतिभाएं इस दुनिया में बहुत ही कम पैदा होती हैं। इतना ही नहीं, ये प्रतिभाएं एक ऐसी अमिट छाप छोड़ जाती हैं जिसे सदियों तक मिटाना संभव नहीं है। इन्हीं अद्भुत प्रतिभाओं में से एक थे, बिहार के महान राजनेता सुरेंद्र प्रसाद तरुनजी, जिन्होंने नालन्दा ही नहीं विश्व को का महत्वपूर्ण पहचान दिया।समरसता, निश्छलता, मधुरता, सत्यता व सक्रियता के कर्णधार थे बिहार सरकार के भूतपूर्व शिक्षा मंत्री सुरेन्द्र प्रसाद तरुण। स्व.तरुण जी ने अपना पूरा जीवन सादगी में व्यतीत किया। जब भारत अंग्रेजी हुकूमत का दंश झेल रहा था, तब 18 अगस्त 1926 को नालंदा स्थित राजगीर के पंडितपुर ग्राम में इनका जन्म हुआ। माता लक्षिया देवी व पिता भतु यादव ने कल्पना भी नहीं किया होगा कि उनके घर एक अच्छे लड़के का जन्म हुआ है। जो भविष्य में अपनी क्रियाकलापों से पूरे राज्य का नाम रोशन करेंगे। तरुण जी बाल्य काल में ही गुलामी के जंजीर से जकड़े भारत को आजाद करने के आंदोलन में कूद पड़े। पूरे देश वासियों को स्वयं की नजरों से देखा था। वहीं स्वतंत्रता संघर्ष की लड़ाई में आंदोलनकारी, क्रांतिकारी, गतिविधियों में स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजी शासन के द्वारा प्रताड़ना, यातना व बलिवेदी पर चढ़ाते भी देखा। महानायक महात्मा गांधी सरीखे सत्याग्रह के महानायक तथा भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद आदि जैसे क्रांतिवीरों को आजादी की लड़ाई में कुर्बान होने के साक्षी रहे तरुण की प्रेरणा स्त्रोत में उक्त महान व्यक्तियों की छवि झलकती थी। वे एक अनुभव का खजाना थे। पराधीन व स्वाधीन भारत की हवा में सांस लेने का अनुभव तथा स्वराज के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले महानायकों के समकालीन रहे स्व. तरुण ने भी स्वाधीन भारत में भ्रष्टाचार व जनहित के लिए सर्वस्व त्याग दिया। जिन्होंने अपना सफर एक गांव से शुरू कर अपना भाग्य राजकीय स्तर के सिहासन तक पहुंचाया। समयवार व नियमित रूप से राजगीर के विभिन्न लोक हित व सरकारी योजनाओं को जिस स्पष्टवादिता व अपनी बुलंद प्रखर आवाज के चाबुक के बल पर उन्होंने संबंधित विभाग के पदाधिकारियों को फटकारते क्रियान्वयन कराया। वे दो बार विधायक बने थे। पहली बार 1980 में अतरी तो दूसरी बार 1985 में हिलसा से चुने गये थे। वे 1942 से ही कांग्रेस से जुड़े थे। तरुण जी 1972 में इंडियन कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने थे। वहीं नालंदा जिला के कांग्रेस कमेटी के प्रथम अध्यक्ष भी बने और दस साल तक रहे। सुरेन्द्र प्रसाद तरुण जी ने राजनीति के साथ समाज को अपनी कलम से भी रास्ता दिखाया था।तरुण जी ने हिन्दुस्तान समाचार व प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया से जुड़कर पत्रकारिता की थी। उन्होंने मगध सांस्कृतिक संघ की स्थापना की थी। यही नहीं विश्व प्रसिद्ध वार्षिक राजगीर महोत्सव के आयोजन के बीज बोने में अहम भूमिका भी स्व. तरुण को ही जाता है। जिन्होंने सन 1986 में अपने मंत्रित्व काल में राजगीर महोत्सव का आयोजन तत्कालीन पर्यटन मंत्री एचकेएल भगत के सहयोग से कराकर इस आयोजन को राज्य का सर्वप्रमुख महोत्सव के नाम से अमर कर दिया। जो वर्तमान में एक मेले का भव्य रूप धारण कर चुका है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन नगरी आज जिस मुकाम पर है। उसमें स्व. तरुणजी के अथक प्रयास तथा मेहनत की चमक दिखाई देती है। समाज व जनहित को इनके द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदमों से जो लाभ प्राप्त हुआ है वो अविस्मरणीय है। शायद यही वजह रही कि 2011 के आयोजित राजगीर महोत्सव के मुख्य मंच से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंच पर उपस्थित तरुण जी को राजगीर के प्राण संबोधन से सम्मानित किया था। राजगीर के भीष्म पितामह प्रखर पत्रकार व नामचीन साहित्यकार सुरेंद्र प्रसाद तरुण जी का निधन 21 दिसंबर 2016 की रात लंबी बीमारी के बाद हुआ था। उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अंतिम सांस ली।
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