स्मृति शेष : अपने विचार और व्यवहार से अमर हो गए कॉमरेड मोहन प्रसाद .....!!
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
कॉमरेड मोहन प्रसाद एक पक्के मार्क्सवादी, खेत मज़दूरों और शोषितों के अद्वितीय नेता, चिंतक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सच्चे सिपाही थे। वे हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गए और अपने पीछे छोड़ गए एक विरासत और एक प्रेरणा दायक जीवन की मिसाल जो उनके प्रिय साथियों का मार्गदर्शन तो करेंगी ही लेकिन दूसरे अनेको लोगो को शोषण और जुलम के खिलाफ और बराबरी के समाज के लिए आमूल-चूल सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष के लिए प्रेरित करेंगी।
मोहन प्रसाद का जन्म और शिक्षा
स्वर्गीय कॉमरेड मोहन प्रसाद का जन्म निश्चलगंज के मध्य वर्गीय परिवार में चंद्रवंशी समाज के पिता तुलसी प्रसाद और माता चौरसिया देवी के घर 6-5-1942 में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय से किया और मैट्रिक उच्च विद्यालय बड़ीमठ से किया था। तत्पश्चात् बीएन कॉलेज पटना से इंटर और बीए (स्नातक) 1966 में करने के बाद इन्होंने ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन (AISF) की सदस्यता ग्रहण कर कई आंदोलनों में भाग लिया। ये अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत उच्च विद्यालय से ही शुरुआत की थी। स्नातक डिग्री हासिल करने के बाद सदा के लिए वे कम्युनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए और घर परिवार को त्याग कर राजनीति में अलावाँ के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के नेता गया सिंह और विजय कुमार यादव इत्यादि नेताओं के सम्पर्क में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और 1952-54 में वे बिहार सरकार द्वारा नहर सिंचाई दर में की गई वृद्धि के खिलाफ सीपीआई के नेतृत्व में चलाए गए किसान संघर्ष के प्रमुख नेताओं में से एक थे।
उन्होंने नालंदा जिले में सामंती ताकतों की हर साजिश को नाकाम करने और कम्युनिस्ट झंडे तले जिले के गरीब और शोषितों की एकता के बल पर उन्होंने उनके अधिकारों के लिए एक नया अध्याय शुरू किया। उन्होंने पार्टी द्वारा चलाए जा रहे किसान संघर्षों की जिम्मेदारी प्रमुखता से संभाली। और क्रांतिकारी संघर्षों की गौरवशाली गाथा शुरू किया।
उन्होंने बिहारशरीफ के बड़ी पहाड़ी एवं छोटी पहाड़ी के बीच में पहाड़ी पर 1969 में कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा गरीबों को तत्कालीन कम्युनिस्ट पार्टी के प्रखर नेता कॉमरेड मोहन प्रसाद, कॉमरेड गया सिंह, कॉमरेड विजय कुमार यादव, कॉमरेड चन्द्रदेव प्रसाद हिमांशु, कॉमरेड श्रीनारायण सिंह एवं अन्य नेताओं के सहयोग से नया मोहल्ला बसाया गया, उस बसाए गए नये मोहल्ले को शहीद मंसूर आलम के नाम पर मंसूर नगर का नामकरण किया।
कॉमरेड मोहन प्रसाद के सादगी, ईमानदारी और वैचारिक निष्ठा उनकी पहचान थी। अविवाहित रहकर उन्होंने पूरा जीवन पार्टी और जनसेवा को समर्पित किया।
मोहन प्रसाद मार्क्सवाद के गहन अध्ययन के लिए सोवियत संघ गये
मोहन प्रसाद लगभग 12 वर्षों तक नालंदा जिला सचिव के पद पर रहकर संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते रहे। इसके साथ ही वे पार्टी की राज्य परिषद के भी सदस्य थे।उन्होंने बताया कि वर्ष 1980 में पार्टी की ओर से मोहन प्रसाद को मार्क्सवाद के गहन अध्ययन के लिए सोवियत संघ भेजा गया था, जहां उन्होंने दो वर्षों तक रहकर अध्ययन किया। स्वदेश लौटने के बाद वे लगातार पार्टी कार्यों और जन आंदोलनों में सक्रिय रहे। उन्होंने नालंदा में किसान संघर्ष एवं मजदूरों के मजदूरी के लिए नए उभार का नेतृत्व भी किया।
कॉमरेड मोहन प्रसाद सत्ताधारी वर्ग के लिए हमेशा एक बड़ी चुनौती बने रहे। चाहे कांग्रेस सरकार हो, लालू-राबड़ी की 'सामाजिक न्याय' सरकार हो या 'सुशासन-विकास' के ढोल बजाने वाली नीतीश सरकार, सभी उनसे खतरा महसूस करते रहे। आपातकाल के दौरान ही नहीं, बल्कि लालू के शासनकाल (1995 और 1997), राबड़ी देवी के शासनकाल (2000) और नीतीश कुमार के शासनकाल (वर्तमान) में भी उनके खिलाफ कई झूठे मामले गढ़े गए और उन्हें गिरफ्तार करने की साजिशें रची गईं। ऐसे ही एक झूठे मामले में उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया, जिसे उनकी मृत्यु तक रद्द नहीं किया गया।
मोहन प्रसाद ने दबे-कुचलों का नेतृत्व किया
कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में कॉमरेड मोहन प्रसाद ने दबे-कुचले वर्गों में राजनीतिक मुखरता की क्रांतिकारी चिंगारी को आरंभिक चरण से लेकर नालंदा सहित बिहार प्रदेश के मैदानी इलाकों के क्रांतिकारी सामंतवाद-विरोधी संघर्षों तक प्रज्वलित किया। इन संघर्षों के फलस्वरूप दलित-पिछड़े ग्रामीण गरीबों को उन्होंने न केवल संसद और विधानसभा में अपने प्रतिनिधि भेजे, बल्कि स्थानीय स्वशासन निकायों में भी शक्ति संतुलन बदल दिया। कॉमरेड मोहन प्रसाद ने बिहार में भूमि सुधार के मुद्दे को इतनी प्रतिबद्धता से उठाया कि उन्हें नालंदा का स्वामी सहजानंद कहा जाता है।
वृद्धावस्था और गंभीर बीमारियों के बावजूद, कॉमरेड मोहन प्रसाद अपने अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे और जन कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते रहे। उन्होंने न केवल नालंदा बल्कि प्रदेश के कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। कॉमरेड मोहन प्रसाद का व्यक्तित्व क्रांतिकारी संघर्षों की अग्नि में तपकर मजबूत हुआ था। वे नालंदा के दलित उत्कट लोगों में से एक अद्वितीय नेता थे, जो उनकी अपनी भाषा बोलते थे। एक ओर वे अपनी सादगी, मित्रवत और सरल स्वभाव तथा विनम्रता के लिए जाने जाते थे, तो दूसरी ओर अपने दृढ़ सिद्धांतों और अटूट प्रतिबद्धता के लिए। वे संघर्ष और सादगी के अद्वितीय प्रतीक थे। उन्होंने पार्टी द्वारा सौंपी गई अनेकों जिम्मेदारियों को सहजता से ग्रहण किया और उन्हें पूर्ण समर्पण के साथ सफलतापूर्वक निभाया। उनका संपूर्ण संघर्षमय जीवन न केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
मार्क्सवाद से प्रेरित होकर छोड़ी नौकरी
वैसे तो कॉमरेड मोहन प्रसाद अपने बारे में बहुत कम बात करते थे फिर भी एक बार बताया था कि उन्होंने छात्र जीवन में ही तय कर लिया था कि वह ग्रामीणों के बीच में जाकर शोषितों और उत्पीड़तों के लिए कुछ करेंगे परन्तु कैसे और क्या करेंगे यह साफ नहीं था। लक्ष्य साफ़ हुआ जीवन के अनुभवों से। वह अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ पटना के मलिन बस्तियों (झुग्गियों) में रहकर मिल और कामगार मज़दूरों के बच्चो को पढ़ाते थे। मज़दूरों के बीच में रहते हुए समझ काफी स्पष्ट होती गई। इसी बीच कई मार्क्सवादी नेताओं से कई विषयों पर उनकी चर्चा शुरू हुई। चर्चाओं में मार्क्सवादी और नक्सलवादी आंदोलन का भी जिक्र आया। नौजवान कॉमरेड मोहन प्रसाद व्याकुल हो उठे। फिर शुरू हुआ मार्क्सवादी साहित्य के अध्ययन की प्रक्रिया। खेत मज़दूरों और ईंट के भट्टे में काम करने वाले मज़दूरों की दशा देख कर उनके जीवन का मकसद तय हो गया। उनके जीवन को बहुत प्रभावित किया। कॉमरेड मोहन प्रसाद बताते थे कि गांव से एक खेत मज़दूर महिला और उसका बच्चा खेत में काम करने गए थे। जैसा कि खेत मज़दूरों के लिए आम है दिन भर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद रात को इन खेत मज़दूरों को खेतों में खुले आसमान के निचे ही सोना पड़ता था। इसे देखकर बहुत द्रवित हो गये।
मोहन प्रसाद ने गरीबों के लिए कई गांव बसाये
हरनौत प्रखंड के गोखुलपुर मठ, झिंग नगर के जमींदार बंशी साव की जमीन पावा में, एवं चिकसौरा में उन्होंने जमींदारों के जमीन को छीन कर गरीबों को बसाया था। उन्होंने ग्रामीण भारत में सर्वहारा-खेत मज़दूरों विशेष तौर पर खेतिहर और कामगार मजदूरों को संगठित करना जीवन का लक्ष्य बना लिया।
कॉमरेड मोहन प्रसाद का वैचारिक दृढ़ता और अनुकरणीय सादा जीवन
कॉमरेड मोहन प्रसाद वैचारिक रूप से बहुत ही स्पष्ट थे। उन्हें सामाजिक बदलाव का इंक़लाबी का रास्ता बिलकुल स्पष्ट दीखता था। सामाजिक बदलाव में खेत मज़दूरों का महत्व वह खूब समझते थे। वह कोई अति उत्साही मानवतावादी नौजवान नहीं थे बल्कि एक गम्भीत मार्क्सवादी चिंतक थे जो शोषण, शोषण की प्रक्रिया और इसे बदलने के रास्ते पर गंभीरता से विचार कर रहे थे। इसी समझ के साथ वह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और ताउम्र इसके सच्चे सिपाही व जनता की जनवादी क्रांति के प्रणेता रहे। अखिल भारतीय खेत मज़दूर यूनियन और बीड़ी मजदूर के आंदोलन का नेतृत्व किया।
मार्क्सवाद के विचार को आत्मसाद करते हुए, शोषितों की लड़ाई में उन्होंने अपना जीवन भी बदल दिया। मानों उनकी अपनी कोई पहचान नहीं जो कुछ है वह लाल झंडे का। इतना साधारण जीवन कि कोई सन्यासी भी रश्क करने पर मज़बूर हो जाये। सर्वहारा की लड़ाई में अपने को उनका हिस्सा बना दिया। जमा पूँजी के नाम पर बौद्विक सम्पदा और बलिदानों के खजाने के सिवाय कुछ भी नहीं। एक खाते-पीते परिवार से आने के वावजूद सर्वहारा में उनकी तरह रहना, केवल दिखने के लिए नहीं बल्कि वैसा जीवन जीना-आप प्रेरित हो सकते है, किस्से सुना सकते है परन्तु इसे जीना आसान नहीं है। और इसी मुश्किल को अपना जीवन बनाने का नाम ही कॉमरेड मोहन प्रसाद है। उन्होंने शादी नहीं की कम्युनिस्ट पार्टी परिवार ही समाज हो गया था। बिहारशरीफ छोटी पहाड़ी मंसूर नगर के राहुल भवन में पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उनके रहने की व्यवस्था कर दी।
घोर व्यक्तिवाद और जातिवाद युग में उनका पहचान लाल झंडा रहा
घोर व्यक्तिवाद और जातिवाद के इस युग में कॉमरेड मोहन प्रसाद की पहचान लाल झंडा ही थी। उनके काम बलिदानो और बौद्धिक स्तर के कारण वह नालंदा ही नहीं पूरे राज्य में समाज के सभी हिस्सों में काफी लोकप्रिय थे। सामान्यता प्रशासनिक अधिकारी और राजनेता उनके नाम और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे। जो उनसे नहीं मिले थे वह भी उनकी ख्याति से अछूते नहीं रहे थे। पर कॉमरेड मोहन प्रसाद तो मानो इस सब से परे थे। कभी भी अपनी पहचान का फायदा नहीं उठाया। यहाँ तक कि मज़दूरों की लड़ाई लड़ते हुए मज़दूरों के अधिकारों को तर्कों और आंदोलन की ताकत पर जीता। कई संघर्षों में जीत के बाद पता चलता था कि इसका नेतृत्व कॉमरेड मोहन प्रसाद ही कर रहे थे। एक बार जिले के सरमेरा प्रखंड में खेत मज़दूरों के आंदोलन में अधिकारीयों से वार्ता चल रही थी। कॉमरेड मोहन प्रसाद हमेशा की तरह नेतृत्व कर रहे थे। अधिकारी तो अपनी सामंती अकड़ में रहते हैं और वह वर्ताव में झलकता है। इतने में कोई वरिष्ठ अधिकारी कॉमरेड मोहन प्रसाद को पहचान लिए और कनिष्ट अधिकारी के कान में धीरे से बता भर दिया कि जिनसे वह बात कर रहे है वह कॉमरेड मोहन प्रसाद जी हैं। वह अधिकारी तो मानने को तैयार ही नहीं। समझ ही नहीं पा रहा है जिस इंसान के बारे में उन्होंने इतना सुना है वह उनसे मज़दूरों के साथ जिरह कर रहा है। वह थे हमेशा लोगो में पर बिना अपने नाम का डिंडोरा पिटे। एक सच्चे मार्क्सवादी की तरह, मार्क्सवाद को लागू करते हुए।
हर किसी के पास कॉमरेड मोहन प्रसाद की सादगी की कई कहानियां है। एक बार हिलसा रात को देर से पहुंचे तो किसी को परेशान न करने के मकसद से बस अड्डे में ही सो गए। कपड़े जो पहने थे हमेशा की तरह साधारण। रात को पुलिस उठा कर थाने में ले गई कि सार्वजनिक जगह पर क्यों सो रहें है। बिना अपनी पहचान बताए चुप-चाप रात पुलिस स्टेशन में गुजारी। सुबह जब मजदूर के नेताओं ने खोज कि तो पुलिस थाने में पहुंचे। पुलिस वालो को जब पता चला कि रात भर कॉमरेड मोहन प्रसाद को थाने में जमीन पर सुलाया तो बहुत शर्मिंदा हुए। माफी मांग बड़े आदर से कॉमरेड मोहन प्रसाद को छोड़ कर आए। ऐसे थे कॉमरेड मोहन प्रसाद।
प्यार और भावनाओं से भरे थे कॉमरेड मोहन प्रसाद
कॉमरेड मोहन प्रसाद अपने जीवन में कठोर अनुसाशन का पालन करते थे और मज़बूती से विचार के साथ खड़े रहते थे पर इसका यह मतलब नहीं कि वह कठोर थे। अपने साथियों के जीवन और उनकी जरूरतों का विशेष ध्यान रखते थे। बिना कहे समझ जाते थे दूसरो की तकलीफ और समाधान भी हो जाता, बिना उनका नाम आए। अपनी माँ और कार्यकर्ताओं से बहुत प्रेम करते थे।
कॉमरेड मोहन प्रसाद ने जिले में खेत मज़दूर यूनियन और बीड़ी मजदूर यूनियन का राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व किया वही प्राथमिक स्तर पर कमेटियों को भी चलाया। यह उनकी खासियत थी कि ज़मीनी स्तर पर लोगों से जुड़ना और उनको लामबंद करना। नालंदा जिले में कई पंचायतो में खुद रह कर उन्होंने संगठन का निर्माण किया। एक तरह से कहें तो मॉडल तैयार किये। उन्होंने नालंदा में सामंतो के खिलाफ गरीबों की ज़मीन के लिए तीखे आंदोलन लड़े। गरीबों के नेतृत्व ही नहीं किया बल्कि उनको एक ताकत के रूप में संगठित किया जो अपनी लड़ाई खुद लड़ सके। पुलिस और सामंतो के दमन का बहादुरी से सामना किया। वह केवल आंदोलनकारी नहीं थे बल्कि कृषि व्यवस्था की समस्याओ और वैकल्पिक कृषि नीति की गहरी समझ रखते थे। पर्यावरण से उन्हें सहज प्रेम थे। सूखे के संकट से निपटने के लिए जल सरक्षण और प्रबंधन का उनका मॉडल नालंदा जिले के क्षेत्र में काफी लोकप्रिय है। कॉमरेड मोहन प्रसाद अब हमारे बीच शारीरिक रूप से विराजमान नहीं हैं। जब तक समाज में उत्पीड़न, शोषण और असमानता बनी रहेगी, जब तक भूमि सुधार और सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेते, कॉमरेड मोहन प्रसाद नालंदा सहित पड़ोसी जिलों की लोकतांत्रिक क्रांति के संघर्ष क्षेत्रों में एक मशाल की तरह हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनके सपनों को साकार करने के लिए उस मशाल की रोशनी में आगे बढ़कर ही हम कॉमरेड मोहन प्रसाद को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।
कॉमरेड मोहन प्रसाद को लाल सलामी!
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