राजगीर का मकर संक्रांति मेला पर विशेष....!!

 ●राजगीर में वर्ष 1959 में हुई थी मकर मेला की शुरुआत
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली

बिहार के राजगीर में मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित होने वाला मकर मेला हर साल आकर्षण और आकर्षण का केंद्र बनता है। इस मेले का महत्व केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यधिक है। बिहार सरकार ने इसे सरकारी मेला घोषित कर दिया है।

मकर मेला की शुरुआत :

राजगीर में मकर मेले की शुरुआत 1959 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य राजगीर के सांस्कृतिक और कृषि कार्य को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना था। यह मेला मकर संक्रांति का दिन मनाया जाता है, जिसे हिंदू धर्म में विशेष महत्व दिया गया है। इस अवसर पर राज्य के अलग-अलग विचारधारा वाले लोग राजगीर के स्तम्भ हैं, जहां के गर्म जल के कुंड लोगों को प्रमुख आकर्षण का केंद्र बनाते हैं।
मकर मेला न केवल धार्मिक उत्सव है, बल्कि इसमें सांस्कृतिक और मनोरंजन का दृश्य भी महत्वपूर्ण है। मेले में आने वाले लोग कई जल कुंड और अन्य जलधाराओं में स्नान कर पूजा करते हैं। ये कुंड अपने औषधीय गुणों के लिए प्रसिद्ध हैं। नहाने के बाद लोग दान-पुण्य करते हैं और पारंपरिक भोजन का आनंद लेते हैं। इसके अलावा, मकर मेले में लोक नृत्य, संगीत, रंगोली प्रतियोगिता, दही खाओ प्रतियोगिता, और पतंग महोत्सव जैसे विभिन्न सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित किए जाते हैं।

 राजकीय मकर मेला और पूर्व शिक्षा मंत्री सुरेन्द्र प्रसाद तरुण :

आठ दिवसीय राजकीय मकर मेला को लेकर इस बार शहर के लोगों में भी उत्साह देखने को मिल रहा है। यह मेला हमारी संस्कृति की पहचान देने वाला हुआ करता था। इसकी शुरुआत पूर्व शिक्षा राज्य मंत्री सुरेन्द्र प्रसाद तरुण की पहल पर वर्ष 1959 में पहली बार हुई थी। मेला का उद्घाटन सूबे के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह ने की थी। मेला के दूसरे साल मयांमार के प्रधानमंत्री यूनो आये थे। उस समय मेला में कवि सम्मेलन हुआ था। प्रशासनिक उदासीनता के बाद मेला को सालों तक पूर्व मंत्री स्व. सुरेन्द्र प्रसाद तरुण ने मंत्री श्रवण कुमार के सहयोग से बचाकर रखा था। मकर मेला नाम सुनते ही जेहन में किसानों द्वारा उपज की जाने वाली बड़ी-बड़ी मूली, सब्जी, लाठी सहित अन्य उत्पादों की याद आती है। इस मेले की लाठी काफी प्रचलित है। किसान व मजदूर यहां से खरीद कर उसे सालोंभर अपनी खेती के काम में उपयोग लाते हैं। यह किसान-मजदूर का मेला होता है। मेला में कुंड स्नान का एक अलग महत्व होता है। इस मेला में पहले किसानों के द्वारा उपज की गई फसल की प्रदर्शनी लगाई जाती थी।
  मेले में उत्पादों की प्रदर्शनी :

किसान अपने खेत के उपजे हुए कद्दू, कोहड़ा, आलु, मूली को लाकर प्रदर्शनी में लगाते थे। सालों तक पूर्व मंत्री स्व. तरुण जी ने इसे अपने बलबूते बचाये रखा। हर साल वे मेला थाना परिसर में 14 जनवरी को पूजा करते थे। उस पूजा में मंत्री श्रवण कुमार भी शामिल होते थे। स्व. तरुण जी के वर्ष 2016 में निधन हो जाने के बाद ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार की पहल पर शहरवासियों ने इस मेला को जीवित रखा। उसके बाद वर्ष 2019 में इसे नगर पंचायत द्वारा लगाया गया। उसके बाद 2020 में राजकीय मेला की घोषणा हो जाने के बाद सरकारी स्तर पर लगाया गया था। कोरोना के कारण 2021 एवं 2022 में लगाया नहीं जा सका। अब यह मेला सरकारी स्तर पर लगाया जाता है।
मेला में खूब बिकती हैं लाठियां :

मकर मेला को किसानों का मेला ही कहा जाता रहा है। इस मेला में जहां किसान अपनी उपज की प्रदर्शनी लगाते थे, वहीं मेला से ही अपने सालभर के उपयोग के लिए लाठियां खरीद कर ले जाते थे। पहले मेला के समय नाबार्ड हाट लगायी जाती थी। इससे लोगों को हस्तकरधा निर्मित सामान आसानी से मिल जाता था।

मेले में ग्रामीण एवं कृषि कलाकृतियों की प्रदर्शनी: 

स्थानीय कृषि, मूर्तियों और हस्तशिल्प का प्रदर्शन किया जाएगा।
पशु प्रदर्शनी: मेले का एक प्रमुख आकर्षण है दुधारू पशुओं की प्रदर्शनी। युवाओं के लिए कुश्ती और अन्य खेलों का आयोजन।
खाद्य स्टॉल: यहां राजगीर के प्रसिद्ध व्यंजन और मिठाइयों का आनंद लेने के लिए कई खाद्य स्टॉल लगाए जाते हैं।

  मकर मेले का आकर्षण :

 पतंग प्रतियोगिता, संत समागम यात्रा और शाही स्नान, दंगल प्रतियोगिता, फुटबॉल और क्रिकेट प्रतियोगिता, वॉलीबॉल प्रतियोगिता और रंगारंग कार्यक्रम। इसके आलवे एथलेटिक प्रतियोगिता, बच्चों की क्विज़ और वाद-विवाद प्रतियोगिता, टमटम और पालकी सज्जा, दुधारू पशु प्रदर्शनी, कृषि उत्पाद प्रदर्शनी, और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ नुक्कड नाटक राजगीर मकर मेला का मुख्य आकर्षण होते हैं।
लोग कुंड के पानी में बनाते हैं भोजन :

गर्मजल के झरनों और कुंड़ों में स्नान करने के बाद ग्रामीण परंपरागत भोजन दही, चूड़ा, भूरा, तिलकुट साथ आलू दम की सब्जी छककर खाते थे। दूसरे दिन खिचड़ी पका कर खाते थे। कुंड के पानी के बने भोजन का स्वाद ही कुछ अलग होता है। ग्रामीण मेला का आनंद लेते और पहाड़ों का सैर भी करते थे 
पहले संन्यासी संक्रांति काल में पंच पहाडियों की गुफाओं में कल्पवास करते थे। यहां के कुंडों में स्नान करते थे। मकर संक्रांति के मौके पर राजगीर के आध्यात्मिक माहौल चरम पर रहता आया है। सनातन संस्कृति का अनूठा संगम की झलक इस मौके पर देखने को मिलती है।

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