धर्म के योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज....!!

●भारतीय नौसेना का जनक छत्रपति शिवाजी
●सनातन धर्म के योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव-शंखनाद साहित्यिक मंडली

छत्रपति शिवाजी महाराज एक पराक्रमी योद्धा होने के साथ राष्ट्र भक्ति, कर्तव्य परायणता, धर्म संस्कृति के संवाहक थे। उन्होंने अपने संघर्षमयी जीवन में देश और धर्म की रक्षा के लिए मुगल शासकों से लड़ाईयां लड़ी। भारत की पवित्र माटी में जन्मे छत्रपति शिवाजी महाराज साहस, राजकौशल और कुशल प्रशासक की सनातन प्रतिमूर्ति थे। उन जैसा योजनाकार और संगठनकर्ता और कहीं नहीं दिखता। उन्होंने अनेक उतार-चढ़ावों का सामना किया, लेकिन कभी भी मर्यादा का हनन नहीं किया। उन्होंने पूरी निष्पक्षता के साथ राज किया। इन्हीं गुणों के कारण वे आज भी समूचे भारत और भारतवासियों के दिल में बसे हैं। सच कहें तो आधुनिक भारत के निर्माण में उनका अभूतपूर्व योगदान है। वे हमारे नायक हैं। शिवाजी आज के भारत में प्रतिरोध के अग्रदूत, नेता और राष्ट्र निर्माता के रूप में विख्यात हैं।

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म और शिक्षा :

महाराष्ट्र, पुणे के शिवनेरी दुर्ग में 19 फरवरी 1630 को शिवाजी का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोंसले था। शिवाजी के पिता का नाम शाहाजी और मां का नाम जीजाबाई था। शिवाजी की मां पर उनके धार्मिक गुणों का गहरा प्रभाव था। उन्होंने घर से शुरूआती शिक्षा पूरी की थी। शिवाजी को बचपन से ही धार्मिक, राजनीतिक और युद्ध विद्या की शिक्षा दी गई थी। उनका बचपन गोपाल, राजा राम, संतों तथा रामायण-महाभारत व सत्संग के बीच बीता था। शिवाजी सभी कलाओं में माहिर थे। वह सभी कलाओ में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध की शिक्षा ली थी। उनके पिता अप्रतिम शूरवीर थे। शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओं को समझने लगे थे।

शिवाजी के परिवार :

प्राप्त जानकारी के मुताबिक शिवाजी के कई पत्नियां थीं। उनका पहला विवाह सईबाई निंबालकर के साथ हुआ था। उस दौरान शिवाजी की उम्र महज 10 साल थी। सईबाई और शिवाजी की 4 संतानें थी। वहीं उनकी दूसरी पत्नी का नाम सोयराबाई मोहिते था। यह काफी चर्चित महिला थीं। शिवाजी के बाद उनके बड़े बेटे संभाजी उत्तराधिकारी बने थे।
शिवाजी की युद्ध नीति :

माना जाता है शिवाजी महाराज ने ही गुरिल्ला युद्ध की नई तकनीकों को जन्म दिया था। गुरिल्ला युद्ध की मदद से उन्होंने मुगलों को कड़ी टक्कर दी थी। शिवाजी ने अपनी एक स्थायी सेना बनाई थी। बता दें कि शिवाजी की मृत्यु के समय उनकी सेना में 30-40 हज़ार नियमित, स्थायी रूप से नियुक्त घुड़सवार, 
मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी :

1260 हाथी और एक लाख पैदल सैनिक थे। इसके अलावा उनकी सेना तोपखानों से लैस थी। महान राजा आज भी भारत में उतने ही सम्मानित और प्रसिद्ध हैं जितने कि चार सौ साल पहले थे। एक योद्धा राजा और मराठा साम्राज्य के संस्थापक के रूप में उनकी महान सैन्य उपलब्धियाँ, प्रशासनिक कुशलता और राजनीतिक सूझबूझ उन्हें भारत के सबसे प्रसिद्ध राजाओं की श्रेणी में रखती हैं। बचपन से ही महान और न्यायप्रिय नायकों की कहानियाँ सुनते हुए पले-बढ़े शिवाजी में देश के प्रति कर्तव्य की भावना अंतर्निहित थी।
शिवाजी ने जब पहली बार पुणे की जागीर संभाली और एक स्वतंत्र मराठा शासन की स्थापना का प्रयास शुरू किया, तब उनकी आयु मात्र सोलह वर्ष थी । अपने प्रारंभिक काल में ही उन्होंने तोरना किले पर विजय प्राप्त कर अपने सैन्य अभियानों की शुरुआत की। उन्होंने राजगढ़, कोंधना और पुरंदर किले जैसे अन्य किलों को शीघ्र ही अपने अधीन कर लिया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया, जिसने मराठा साम्राज्य की नींव रखी।
शिवाजी के भीतर भारतीय संस्कृति के महान संस्कार कूट-कूट कर भरे थे। वह सदैव अपने माता-पिता और गुरु के प्रति श्रद्धालु और सेवाभावी बने रहे। उन्होंने कभी भी अपनी माता की किसी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया और पिता के विरुद्ध पर्याप्त विपरीत परिस्थितियों के होने के उपरांत भी कभी विद्रोही स्वभाव का परिचय नहीं दिया। वह उनके प्रति सदैव एक कृतज्ञ पुत्र की भांति ही उपस्थित हुए। शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा मिली। जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की भांति उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को मुक्त करा लिया। इससे उनके चरित्र की उदारता का बोध हमें होता है और हमें पता चलता है कि वह हृदय से कृतज्ञ रहने वाले महान शासक थे। उस समय की राजनीति में पिता की हत्या कराकर स्वयं को शासक घोषित करना एक साधारण सी बात थी। यदि शिवाजी चारित्रिक रूप से महान नहीं होते तो वह अपने पिता की हत्या तक भी करा सकते थे, परंतु उन्होंने ऐसा कोई विकल्प नहीं चुना। शाहजी राजे के निधन के उपरांत ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया। यद्यपि वह उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। कहने का अभिप्राय है कि उनकी अधिपति होने की यह स्थिति उनके भीतर अहंकार का भाव उत्पन्न कर सकती थी, परंतु शिवाजी सत्ता को पाकर भी मद में चूर नहीं हुए। उनके नेतृत्व को उस समय सब लोग स्वीकार करते थे। यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।
आज भी शिवाजी की संगठन कुशलता का उदाहरण दिया जाता है। उस समय मराठा अलग-अलग रहते थे, अलग-अलग ही लड़ाई भी लड़ते थे। शिवाजी ने अनुभव किया कि मराठों में जोश और स्वदेशाभिमान तो है, पर एकता नहीं होने के कारण वे सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसलिए शिवाजी ने उन्हें एक-एक करके संगठित किया। उसके बाद तो मराठों की विजय पताका फहरने लगी। शिवाजी की राजकीय व्यवस्था और सेना खड़ी करने की क्षमता अद्भुत थी। उनकी न्याय व्यवस्था तो ऐसी थी कि दुश्मन भी इस मामले में उनकी तारीफ करते थे।
छत्रपति शिवाजी हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने की कोशिश करते थे। उनसे जुड़ा एक प्रसंग इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि वे अपने आलोचकों से भी सीख लेते थे। यह उन दिनों की बात है जब शिवाजी मुगलों के विरुद्ध छापामार युद्ध लड़ रहे थे। एक रात वे थके-हारे एक वृद्धा की झोंपड़ी में जा पहुंचे। उनके चेहरे को देखकर वृद्धा बोली, ‘‘सिपाही, तेरी सूरत शिवाजी जैसी लगती है। तू भी उसी की तरह मूर्ख है।’’ शिवाजी ने कहा, ‘‘शिवाजी की मूर्खता के साथ-साथ मेरी भी कोई मूर्खता बताएं।’’ वृद्धा ने उत्तर दिया, ‘‘वह दूर किनारों पर बसे छोटे-मोटे किलों को आसानी से जीतते हुए शक्ति बढ़ाने की बजाए बड़े किलों पर धावा बोल देता है और फिर हार जाता है।’’ वृद्धा की इस बात से शिवाजी को अपनी रणनीति की विफलता का कारण समझ में आ गया। उन्होंने वृद्धा से सीख प्राप्त कर पहले छोटे-छोटे लक्ष्य बनाए और उन्हें प्राप्त करने के लिए मेहनत करने लगे। उन्होंने छोटे किलों को जीतने पर ध्यान लगाया और परिणाम जीत के रूप में आने लगा। इससे उनके साथ-साथ उनके सैनिकों का भी मनोबल बढ़ा। इस मनोबल की बदौलत ही वे बड़े किलों को जीत पाए। ज्यों-ज्यों जीत मिलती गई, उनकी शक्ति बढ़ती गई।
छत्रपति शिवाजी चाहते थे कि मराठों के साम्राज्य का विस्तार हो और उनका अलग से एक राज्य हो। अपने इसी सपने को साकार करने के लिए उन्होंने 28 वर्ष की आयु में अपनी एक अलग सेना एकत्रित करनी शुरू कर दी और अपनी योग्यता के बल पर मराठों को संगठित किया तथा एक अलग साम्राज्य की स्थापना भी की। उन्होंने जहाजी बेड़ा बनाकर एक मजबूत नौसेना की स्थापना की। इसलिए उन्हें भारतीय नौसेना का जनक कहा जाता है।
शिवाजी ने राज्य की चिरकालीन दृढ़ता के लिए अनेक संस्थाओं का निर्माण करवाया। औरंगजेब की प्रचंड शक्ति का सामना कर विजय प्राप्त करने में इन संस्थाओं का बहुत उपयोग हुआ। इस कारण मराठे स्वसंरक्षण और राज्यवर्धन, ये दोनों काम कर सके।
एक दिन सूर्यास्त के बाद शिवाजी ने द्वारपाल से द्वार खोलने के लिए कहा। द्वारपाल ने साफ-साफ कहा कि सूर्यास्त के बाद द्वार नहीं खुलेगा। इस कारण शिवाजी को बाहर ही रात गुजारनी पड़ी। सुबह होते ही उन्होंने द्वारपाल को दरबार में बुलाया और द्वार न खोलने का कारण पूछा। द्वारपाल ने जवाब दिया, ‘‘महाराज जब आप ही अपने आदेश का पालन नहीं करेंगे तो प्रजा क्या करेगी?’’ द्वारपाल की कर्तव्यनिष्ठा और निर्भीकता से शिवाजी बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उसे अंगरक्षक बना लिया।
समर्थ गुरु रामदास छत्रपति शिवाजी के गुरु थे। एक दिन उन्होंने दरवाजे के बाहर से शिवाजी से भिक्षा की मांग की। शिवाजी ने कहा, भिक्षा मांग कर आपने हमें लज्जित किया। गुरु रामदास ने कहा, ‘‘आज मैं गुरु के रूप में नहीं, बल्कि भिक्षुक के नाते भिक्षा मांगने यहां आया हूं।’’ शिवाजी ने एक कागज पर कुछ लिखकर गुरु के कमंडल में डाल दिया। उसमें लिखा था- सारा राज्य गुरुदेव को अर्पित है। गुरु रामदास ने कागज फाड़ दिया और कहा, ‘‘मैं तुम्हारे अंदर का अहंकार निकाल नहीं पाया हूं। तुम राजा नहीं, एक सेवक हो। जो चीज तुम्हारी है ही नहीं उसे तुम मुझे दे रहे हो।’’ गुरुदेव ने आगे कहा, ‘‘वत्स! यह राज-पाट, धन-दौलत सब जनता की मेहनत का फल है। इस पर सबसे पहले उनका अधिकार है। तुम एक समर्थवान सेवक हो। एक सेवक को दूसरे की चीज को दान देना राजधर्म नहीं है।’’ शिवाजी ‘‘गुरुदेव की भावना को समझ गए और उनसे क्षमा मांग कर बोले, गुरुदेव! अब कभी भूल नहीं होगी।’’
शिवाजी की सैन्य रणनीति गुरिल्ला युद्ध पर आधारित थी, जिसमें गति और अचानक हमले शामिल थे, इसीलिए शिवाजी को " पहाड़ी चूहा " के नाम से जाना जाता था। उनकी रणनीतियों ने उन्हें अपनी स्थिति पर डटे रहने और मुगल साम्राज्य और अन्य विरोधियों सहित, उनकी संख्या और सैन्य शक्ति की परवाह किए बिना, दुश्मनों को हराने में सक्षम बनाया।
1674 में रायगढ़ किले में राज्याभिषेक के साथ ही शिवाजी को छत्रपति (सम्राट) माना जाने लगा । यह न केवल उनकी सत्ता स्थापित करने का तरीका था, बल्कि महान भारत में एक नए शक्तिशाली शासक, मराठा साम्राज्य के उदय का भी प्रतीक था । शिवाजी की इन नई नीतियों में प्रशासन का विकेंद्रीकरण, कृषि को प्रोत्साहन और न्यायसंगत कराधान शामिल थे।
शिवाजी को सबसे शक्तिशाली नौसेना बलों में से एक के निर्माण के लिए याद किया जाता है। अरब सागर में शक्ति संतुलन के महत्व को समझते हुए, उन्होंने नौसेना का निर्माण और तटों को सुदृढ़ किया। मराठा तट को विदेशी आक्रमणों, विशेष रूप से पुर्तगालियों और सिद्दी शासकों से रचनात्मक रूप से बचाने के अलावा, उनकी नौसेना ने समुद्री व्यापार और वाणिज्य की भी रक्षा की। अपनी इस दूरदर्शिता और रणनीतिक योजना कौशल के कारण उन्हें स्नेहपूर्वक ' भारतीय नौसेना का जनक' कहा जाता है ।
छत्रपति शिवाजी का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे मात्र एक प्रशासक ही नहीं थे। उन्हें न्याय के सिद्धांतों, विशेषकर समानता और गरीबों के प्रति उनके समर्पण के लिए याद किया जाता है। महिलाओं के प्रति शिवाजी की सहानुभूति, धार्मिक सहिष्णुता पर उनका बल, गैर-मराठी लोगों को मराठा सेवा में शामिल करना, उनके कुछ प्रगतिशील कार्यों में से हैं। शिवाजी का कार्य आज भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है और आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। उनके जीवन और उपलब्धियों का वर्णन इतिहास, पुस्तकों, लोक कथाओं और सामुदायिक मौखिक इतिहास में मिलता है। राष्ट्र के इतिहास में उनकी भूमिका को स्मरण करने के लिए भारत में कई ऐतिहासिक इमारतें, संस्थान और संगठन उनके नाम पर स्थापित किए गए हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन :

03 अप्रैल 1680 के दिन रायगढ़ फोर्ट में छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन हुआ था। हांलाकि उनकी मृत्यु को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। कई इतिहासकारों का मानना है कि शिवाजी की मृत्यु स्वभाविक थी, तो वहीं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उन्हें साजिश के तहत जहर दिया गया था। जिसके बाद शिवाजी की हालत बिगड़ने लगीं औऱ खून की पेचिस शुरू हो गईं। जिसके चलते शिवाजी को बचाया नहीं जा सका।
लेकिन छत्रपति शिवाजी महाराज के निधन के बारे में लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक “छत्रपति शिवाजी” के पृष्ठ संख्या 117 पर लिखते हैं “शिवाजी अपने राज्य प्रबंध में लगे हुए थे कि मार्च सन 1680 ई को अंतिम दिनों में उनके घुटनों में सूजन पैदा हो गई। यहां तक कि ज्वर भी आना आरंभ हो गया। जिसके कारण 7 दिन में शिवाजी की आत्मा अपना नश्वर कलेवर छोड़ परम पद को प्राप्त हो गई। 15 अप्रैल सन 1680 को शिवाजी का देहावसान हो गया।” ( संदर्भ : “छत्रपति शिवाजी” लेखक लाला लाजपतराय, प्रकाशक: सुकीर्ति पब्लिकेशंस, 41 मेधा अपार्टमेंट्स, मयूर विहार 01, नई दिल्ली 110091)
शिवाजी महाराज ने अपने शासनकाल में गरीबों, वंचितों और महिलाओं के कल्याण के लिए कार्य किया। वह किसी भी धर्म के विरोधी नहीं थे।

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