वन्देमातरम् गीत के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की 129 वीं पुण्यतिथि पर विशेष ..!!


 
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
 बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय बंगला के प्रख्यात उपन्यासकार, कवि, गद्यकार और पत्रकार थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौराम वंदेमातरम् गीत ने जनमानस में राष्ट्रीयता की अलख जगाई थी। आज भी राष्ट्रीय गीत सुनकर, प्रत्येक भारतीय गर्वित अनुभव करता है। इसी राष्ट्रीय गीत के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी की आज जयंती है। अपने गीत से उन्होंने शस्यश्यामला भारत भूमि की अर्चना की। बंकिमचंद्र चटर्जी को प्रख्यात उपन्यासकार, कवि, गद्यकार और पत्रकार के रूप में जाना जाता है। वे बांग्ला के अतिरिक्त, दूसरी भाषाओं पर भी समान अधिकार रखते थे। उन्हें लोग बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के नाम से भी जानते हैं।
 
बंकिमचंद्र चटर्जी का साहित्य के प्रति झुकाव  

बंकिमचंद्र चटर्जी को बंगला और संस्कृत साहित्य की अच्छी जानकारी थी। सरकारी नौकरी में रहते हुए, उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीयों पर अंग्रेजों के दमनचक्र को बहुत नजदीक से देखा था। सरकारी नौकरी में होने के कारण बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय किसी सार्वजनिक आन्दोलन में प्रत्यक्षतः भाग नहीं ले सकते थे, पर उनका मन कचोटता था। इसलिए उन्होंने साहित्य के माध्यम से, स्वतंत्रता आन्दोलन में अपना योगदान देने का संकल्प लिया। बंकिम चंद्र चटर्जी कविता और उपन्यास दोनों लिखते थे। वे दोनों ही विधाओं में न केवल पारंगत बने, बल्कि अपनी बेहतरीन रचनाओं से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया।

बंकिम चंद्र चटर्जी का साहित्यिक जीवन :-

बंकिम चंद्र चटर्जी कविता और उपन्यास दोनों लिखने लगे और दोनों ही विधाओं में न केवल पारंगत बने, बल्कि एक से बढ़कर एक रचनाओं से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया। बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत कविता के लेखक के रूप में की थी। वह फिर कल्पना में बदल गया। दुर्गेशानंदिनी, उनका पहला बंगाली रोमांस, 1865 में प्रकाशित हुआ था। उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में कपालकुंडला (1866), मृणालिनी (1869), विश्वरक्षा (1873), चंद्रशेखर (1877), रजनी (1877), राजसिम्हा (1881), और देवी चौधुरानी शामिल हैं। 1884)। बंकिम चंद्र चटर्जी का सबसे प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ (1882) था। आनंद मठ में “बंदे मातरम” गीत था, जिसे बाद में राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया गया था। बंकिम चंद्र चटर्जी साहित्यिक अभियान के माध्यम से बंगाली भाषी लोगों की बुद्धि को उत्तेजित करके बंगाल के एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान को लाना चाहते थे। इस दृष्टि से उन्होंने 1872 में बंगदर्शन नामक मासिक पत्रिका निकाली। इन सभी उपन्यासों की विशेषता यह है कि इनके पात्र ऐतिहासिक या तत्कालीन समाज से लिए गए हैं।
बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित प्रबन्ध ग्रन्थ :-  कमलाकान्तेर दप्तर, लोकरहस्य, कृष्ण चरित्र, बिज्ञानरहस्य,  बिबिध समालोचना, प्रबन्ध-पुस्तक, बिबिध प्रबन्ध
बंकिम चंद्र चटर्जी सम्पादित ग्रन्थावली :- दीनबन्धु मित्रेर जीबनी, बांगला साहित्ये प्यारीचाँद मित्रेर स्थान, संजीबचन्द्र चट्टोपाध्यायेर जीबनी,

 'वन्दे मातरम्' गीत और क्रांतिकारियों की प्रेरणा

बंकिमचंद्र ने अपने लेखन की शुरुआत अंग्रेजी उपन्यास से की थी, लेकिन बाद में उन्हों ने हिंदी में लिखना शुरू किया। देश के लिए राष्ट्रगीत और अन्यी रचनाओं को आज भी याद किया जाता है। बंकिमचंद्र ने जब इस गीत की रचना की तब भारत पर ब्रिटिश शासकों का दबदबा था। ब्रिटेन का एक गीत था 'गॉड! सेव द क्वीन'. भारत के हर समारोह में इस गीत को अनिवार्य कर दिया गया। बंकिमचंद्र तब सरकारी नौकरी में थे। अंग्रेजों के बर्ताव से बंकिम को बहुत बुरा लगा और उन्होंने साल 1876 में एक गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया 'वन्दे मातरम्'।
राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास आनंदमठ में की थी। यह उपन्यास वर्ष 1882 में प्रकाशित हुआ। आनंदमठ में ईस्ट इंडिया कंपनी से वेतन के लिए लड़ने वाले भारतीय मुसलमानों और संन्यासी ब्राह्मण सेना का वर्णन किया गया है। वन्देमातरम् गीत इतना लोकप्रिय था कि, स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसका संगीत तैयार किया। बंकिमचंद्र चटर्जी की रचनाओं के अनुवाद दुनिया की कई भाषाओं में हुए। उनकी कई रचनाओं पर फिल्में भी बनीं। शासकीय सेवा में रहते हुए भी, उन्होंने स्वातंत्र्य चेतना जागृत करने में, अपनी महती भूमिका निभाई। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान 'वन्दे मातरम्' गीत क्रांतिकारियों की प्रेरणा का स्रोत तो था ही, आज भी राष्ट्रवादी इस पर गर्व करते हैं।

 बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्म, शिक्षा और पारिवारिक जीवन  :-

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म, 27 जून, 1838 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के, कांठलपाड़ा ग्राम में हुआ। वे एक समृद्ध और परंपरागत बंगाली परिवार में जन्मे थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मिदनापुर में की थी। वह एक प्रतिभाशाली छात्र थे। मिदनापुर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद बंकिम चंद्र चटर्जी ने हुगली के मोहसिन कॉलेज में प्रवेश लिया और वहां छह साल तक अध्ययन किया। किताबों के प्रति बंकिम चंद्र चटर्जी की रुचि बचपन से ही थी। वे पहले आंग्ल भाषा की ओर भी आकृष्ट थे, पर बाद में उन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव उत्पन्न हुआ। वे एक मेधावी व मेहनती छात्र थे। पढ़ाई के साथ- साथ खेलकूद में भी उनकी रुचि थी।
बंकिम चंद्र ने हुगली के मोहसीन कॉलेज में जब दाखिला लिया तो, एक बार उनके अंग्रेजी के टीचर ने उन्हें बुरी तरह से डांटा था। इससे वह काफी आहत हुए थे। तब से अंग्रेजी भाषा के प्रति उनका लगाव खत्म हो गया। यहीं से उनकी अपनी मातृभाषा के प्रति रूचि बढ़ने लगी। और धीरे-धीरे वह शिखर पर पहुंच गए। बंकिम चंद्र चटर्जी की शादी तब हुई थी जब वह केवल ग्यारह साल के थे। उस समय उनकी पत्नी केवल पाँच वर्ष की थी। बंकिम चंद्र चटर्जी केवल बाईस वर्ष के थे जब उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। कुछ समय बाद उन्होंने फिर से दूसरी शादी की। उनकी दूसरी पत्नी राजलक्ष्मी देवी थीं। उनकी तीन बेटियां थीं लेकिन कोई बेटा नहीं था। वर्ष 1856 में उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया था। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने उस दौर में प्रेसीडेंसी कॉलेज से, बीए की उपाधि ग्रहण की। उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की। वर्ष 1858 में डिप्टी मजिस्ट्रेट का पदभार संभाला।

बंकिम चंद्र चटर्जी कलकत्ता के डिप्टी कलेक्टर के रूप में :-

1857 में, ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ एक मजबूत विद्रोह हो रहा था, लेकिन बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और 1859 में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और कलकत्ता के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने उसी साल में डिप्टी कलेक्टर के रूप में बंकिम चंद्र चटर्जी को नियुक्त किया। बंकिम चंद्र चटर्जी बत्तीस साल तक सरकारी नौकरी में रहे और 1891 में सेवानिवृत्त हो गए। वह बहुत कर्तव्यनिष्ठ कार्यकर्ता थे। कुछ काल तक बंगाल सरकार के सचिव पद पर भी रहे। रायबहादुर और सी. आई. ई. की उपाधियां पाईं।

बंकिम चंद्र चटर्जी का निधन :-

बंकिम चटर्जी शानदार कहानीकार, और रोमांस के मास्टर थे। चटर्जी के रूप में पहले और बाद में किसी भी बंगाली लेखक ने इस तरह के सहज और सार्वभौमिक लोकप्रियता का आनंद नहीं लिया। उनके उपन्यासों का भारत की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद किया गया है। 8 अप्रैल, 1894 को उनका निधन हो गया।

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