स्वतंत्रता सेनानी शिक्षाविद् डॉ रामस्वरूप शर्मा की 102वीं जयंती पर विशेष....!!

● डॉ. रामस्वरूप शर्मा जी सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे
 लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली

बहुजन हिताय बहुजन सुखाय महापुरुष जन्म लेते हैं। उनका आविर्भाव समाज के हितार्थ होता है। वह समाज की रूढ़िवादी परम्परा का अनुसरण नहीं करते। अपितु समाज को बदल डालते हैं। भारत के इतिहास में ऐसे कई नायक हुए हैं जिनका जिक्र इतिहास की पुस्तकों में प्रायः नहीं किया गया। दरअसल, इतिहास लिखना भी एक राजनीति है। कुछ लोगों का मानना है कि इतिहास यथार्थ की अभिव्यक्ति होती है, लेकिन एक इतिहासकार जिस यथार्थ को अपनी अभिव्यक्ति के लिए चुनता है उसके पीछे उसकी विचारधारा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत में जाति एक बहुत बड़ी विचारधारा के रूप में भी काम करती रही है इसलिए हमारे यहां इतिहास लेखन भी जातिगत विचारधारा से प्रेरित रहा है। यही कारण है कि भारत के इतिहास की पुस्तकों में जाति के क्रम में जो नीचे के महापुरुष हैं उनके बारे में कम लिखा गया है या कुछ भी नहीं लिखा गया है। इतिहास लेखन पर जातिगत विचारधारा इस कदर हावी दिखती है कि कुछ तो ऐसे लोग भी हैं जिनकी समाज में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही है, लेकिन उनके बारे में अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करके उन्हें महापुरुष बनाया गया। यह मात्र संयोग नहीं है कि ऐसे लोगों की एकमात्र खूबी यह रही है कि उन्होंने भारतीय जाति-व्यवस्था में ऊपर के क्रम में जन्म लिया है। देश में एक नहीं, कई हजार सेनानी हैं जिन्हें हमने इतिहास के पन्नो में दबा दिया,  भुला दिया, बिसरा दिया। कई तो ऐसे भी है जिनका शासकीय पन्नो में जिक्र तक नहीं मिलता है। कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी भी थे जो मरे तो नहीं लेकिन जिन्होंने देश को आजादी दिलाने के लिए मौत से भी भयानक कठिनाइयां झेली, मगर उनके योगदान किसी भी तरह कमतर नहीं थे। 
स्वर्गीय डॉ. रामस्वरूप शर्मा जी सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे, लेकिन हमेशा गुमनाम ही रहे। और आजादी के बाद अपने सहयोगियों के कहने पर शिक्षक की नौकरी कर ली। स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर नुक-छिप कर कई आंदोलनों में इन्होने भाग लिया था। ये असहायों की मदद करने को हमेशा सक्रिय रहते थे। घर के सभी लोग आंदोलनकारियों को मदद किया करते थे। सभी भाई को क्रांतिकारी विचारधारा विरासत में मिली थी। घर में स्वतंत्रता सेनानियों का जमाबड़ा लगा रहता था। मानव के मन में समाजसेवा का भाव होना बेहद जरूरी है। अपने लिए तो हर कोई जीवन व्यतीत करता है, लेकिन दूसरों के लिए भी जीना चाहिए। समाज सेवा का जज्बा यदि इंसान के अंदर हो तब वह किसी भी मुश्किल का सामना कर सेवा कर ही लेता है। हम तन-मन धन सभी तरह से समाज की सेवा कर सकते हैं।
स्वतंत्रता सेनानी डॉ. रामस्वरूप शर्मा का जन्म 14 जनवरी 1922 को ग्राम एवं पो०- गोपालबाद, थाना- सरमेरा, जिला- तत्कालीन पटना एवं वर्तमान नालन्दा में हुआ था। इनके पिता स्व० गेनौरी ठाकुरजी, माता- जानकी देवी थे। गेनौरी ठाकुरजी की शादी दरवे के मंगर ठाकुर की पुत्री से हुई थी। गेनौरी ठाकुरजी नाई कुल के प्रसिद्ध जर्राह थे। गेनौरी ठाकुर एक भाई और पांच बहन थे। इनका खानदानी पेशा नाई गिरी और पुस्तैनी कार्य जर्राही और आयुर्वेदिक था। गेनौरी ठाकुरजी के तीन पुत्र हैं- डॉ. रामस्वरूप शर्मा, विन्देश्वरी ठाकुर और रामाश्रय शर्मा जी हैं। स्वतंत्रता सेनानी डॉ. रामस्वरूप शर्मा का प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण पाठशाला के बाद उच्च विद्यालय बिंद में हुई थी। विद्यालयी शिक्षा के बाद इनके परम् मित्र डॉक्टर जगदीश प्रसाद और रामलखन प्रसाद के सहयोग से शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त कर नौकरी कर ली थी। शिक्षक रहते इन्होंने साहित्यालंकार स्नातक तक की परीक्षा पास की थी।  डॉ. रामस्वरूप शर्माजी भाईयों में सबसे बड़े थे। इन्होंने बीएचएमएस (कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल) से होम्योपैथ की डिग्री प्राप्त की थी। ये अपने क्षेत्र के मशहूर होम्योपैथ चिकित्सक एवं जर्राह थे। 
डॉ. रामस्वरूप शर्माजी का विवाह ग्राम- बबनविगहा पो०- बरबीघा तत्कालीन जिला मुंगेर वर्तमान शेखपुरा जिला के स्व० झौरी ठाकुर जी की सुपुत्री श्रीमती फुलेश्वरी देवी के साथ हुआ था। फुलेश्वरी देवीजी अपने पति के साथ काँग्रेस कायकर्ता एवं संत विनोवा के साथ भूदान यज्ञ में काम करने वाली आदर्श महिला थी। इनसे चार पुत्र ब्रज बिहारी, विपिन बिहारी, रास बिहारी, राकेश बिहारी शर्मा एवं दो पुत्री अनीता देवी और सुनीता देवी हैं। सभी पुत्र एवं पौत्र सरकारी सेवा में कार्यरत हैं।
डॉ. रामस्वरूप शर्मा जी गोपनीय ढंग से स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रहे थे। उन्होंने अगस्त क्रांति 1942 ई० में अंग्रेजों भारत छोड़ दो, करो या मरो के आह्वान पर सक्रिय भाग लिया जिसके कारण सरमेरा थाना की पुलिस ने गिरफ्तार कर एस०डी०ओ० कोर्ट में चालान कर दिया था। लेकिन इनके पिता जी गेनौरी ठाकुर के वकील मित्र ने पैरवी कर छुड़ा दिया था। जिससे उन्हें जेल जाना नहीं पड़ा। बाद में गोपनीय तौर पर घर गृहस्थी करते हुए काँग्रेस के कार्यक्रमों को करते रहे। सभी भाइयों में आपसी अगाध प्रेम रहा है। सरमेरा प्रखंड के स्वतंत्रता सेनानियों में स्व. बच्चन सिंह, स्व. नवलकिशोर सिंह, स्व. श्रीमती विद्यावती देवी, स्व. श्री राम भजु सिंह, स्व. श्री राम गति सिंह, स्व. दिनेशर प्र. सिंह, स्व. श्री राम नगीना शर्मा, स्व. श्री कमलेश्वरी प्र. सिंह, स्व. श्री श्याम बिहारी सिंह, स्व. श्री बाबुलाल कहार, स्व. श्री लक्ष्मण महतो, स्व. श्रीमती सीता देवी, स्व. श्री द्वारिका महतो, स्व. श्रीमती कमलेश्वरी देवी, स्व. श्री वासुदेव सिंह अध्यापक जी, स्व. श्री बजरंगी साव, स्व. श्री दानी प्र. सिंह, स्व. श्री कपिलदेव सिंह, स्व. श्रीमती सोना देवी, स्व. श्री वेरादर सिंह, स्व. श्री तनिक प्र. सिंह, स्व. श्री सूर्य नारायण तिवारी तथा गोपालबाद के स्व. श्री गरभू महतो जोकि स्व. डॉ. रामस्वरूप शर्मा जी के परम् मित्र थे। डॉ. रामस्वरूप शर्मा जी के पुत्रों ने इन दिनों पुराने घर को तोड़कर नए घर का निर्माण कर लिया है। संयोग से कई वर्ष पूर्व इनके पुत्रों ने एक-सवा लाख ईट का भट्टा पकाकर निकट के भूखंड में तथा पुराने भवन में लगा दिया है। अतिथि सत्कार में इनका पूरा परिवार प्रवीण है। इनके सभी पुत्र सरल, सोधे एवं मृदुभाषी सज्जन हैं। सादा जीवन उच्च विचार इनका सिद्धांत रहा है। सभी भाईयों में इनका प्रेमपूर्ण बर्ताव है। स्वतंत्रता सेनानी रामस्वरूप शर्मा जी का निधन पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) में किडनी की बीमारी से 6 मार्च 1983 को हो गया।

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