भारत में वैलेंटाइन डे मनाने की सच्चाई.....!!

● भारत त्योहारों का देश हैं जहां कई त्योहार मनाए जाते हैं
●भारतीय युवाओं में फैलाई जा रही वैलेंटाइन डे सांस्कृतिक प्रदूषण है
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव साहित्यिक मंडली शंखनाद

भारत में जितने भी प्रकार के त्यौहार मनाये जाते हैं उन सभी त्योहारों के पीछे एक सच्ची कहानी होती है जो इतिहास के पन्नो पर लिखी गयी है और वो सभी त्यौहार सदियों से चली आ रही है जो एक रिवाज की तरह बन गयी है। भारत त्योहारों का देश हैं जहां पूरे साल अलग अलग त्योहार बड़ी ही धूमधाम से मनाए जाते हैं। भारत में सभी धर्मों के लोग अपना त्योहार एक साथ मिल-जुलकर मनाते हैं चाहें वह हिंदुओं की दिवाली हो, मुस्लमानों की ईद हो, सिखों की लोहड़ी हो या फिर ईसाइयों का क्रिसमस हो। भारत में सभी त्योहार खुशी और जुनून के साथ मनाए जाते हैं। भारत में मनाए जानें वाले त्योहारों को हम तीन प्रकार से बांट सकते हैं जैसे राष्ट्रीय त्योहार, धार्मिक त्योहार और मौसमी त्योहार। सभी त्योहारों का अपना एक विशेष महत्त्व है और इन्हें मनाने का तरीका भी अलग अलग है।
वेलेंटाइन डे पर लोग एक दूसरे को प्यार और उपहार का तोहफा देते हैं। एक अनुमान के अनुसार पूरे अमेरिका में, एक मिलियन से अधिक के गुलदस्ते हर साल वितरित किए जाते है। क्या आप जानते है कि यह दिन सिर्फ प्यार और उपहार के लिए नहीं बल्कि जुनून, बलिदान और भक्ति की कहानी है। यही वेलेंटाइन डे का वास्तविक उद्देश्य है। यूरोप और अमेरिका का समाज जो है वो रखैलों (Kept) में विश्वास करता है पत्नियों में नहीं, यूरोप और अमेरिका में आपको शायद ही ऐसा कोई पुरुष या मिहला मिले जिसकी एक शादी हुई हो, जिनका एक पुरुष से या एक स्त्री से संबंध रहा हो और ये एक दो नहीं हजारों साल की परम्परा है उनके यहाँ। आपने एक शब्द सुना होगा “Live in Relationship” ये शब्द आज कल हमारे देश में भी नव-अभिजात्य वर्ग में चल रहा है, इसका मतलब होता है कि “बिना शादी के पति-पत्नी की तरह से रहना”। तो उनके यहाँ, मतलब यूरोप और अमेरिका में ये परंपरा आज भी चलती है, खुद प्लेटो (एक यूरोपीय दार्शनिक) का एक स्त्री से सम्बन्ध नहीं रहा, प्लेटो ने लिखा है कि “मेरा 20-22 स्त्रीयों से सम्बन्ध रहा है” अरस्तु भी यही कहता है, देकातेर् भी यही कहता है, और रूसो ने तो अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “एक स्त्री के साथ रहना, ये तो कभी संभव ही नहीं हो सकता, तो वहां एक पत्नि जैसा कुछ होता नहीं। और इन सभी महान दार्शनिकों का तो कहना है कि “स्त्री में तो आत्मा ही नहीं होती” “स्त्री तो मेज और कुर्सी के समान हैं, जब पुराने से मन भर गया तो पुराना हटा के नया ले आये”। तो बीच-बीच में यूरोप में कुछ-कुछ ऐसे लोग निकले जिन्होंने इन बातों का विरोध किया और इन रहन-सहन की व्यवस्थाओं पर कड़ी टिप्पणी की। उन कुछ लोगों में से एक ऐसे ही यूरोपियन व्यक्ति थे जो आज से लगभग 1500 साल पहले पैदा हुए, उनका नाम था- वैलेंटाइन। उस वैलेंटाइन नाम के महापुरुष का कहना था कि “हम लोग (यूरोप के लोग) जो शारीरिक सम्बन्ध रखते हैं कुत्तों की तरह से, जानवरों की तरह से, ये अच्छा नहीं है, इससे सेक्स-जनित रोग (veneral disease) होते हैं, इनको सुधारो, एक पति-एक पत्नी के साथ रहो, विवाह कर के रहो, शारीरिक संबंधो को उसके बाद ही शुरू करो” ऐसी-ऐसी बातें वो करते थे और वो वैलेंटाइन महाशय उन सभी लोगों को ये सब सिखाते थे, बताते थे, जो उनके पास आते थे, रोज उनका भाषण यही चलता था रोम में घूम-घूम कर। संयोग से वो चर्च के पादरी हो गए तो चर्च में आने वाले हर व्यक्ति को यही बताते थे, तो लोग उनसे पूछते थे कि ये वायरस आप में कहाँ से घुस गया, ये तो हमारे यूरोप में कहीं नहीं है, तो वो कहते थे कि “आजकल मैं भारतीय सभ्यता और दशर्न का अध्ययन कर रहा हूँ, और मुझे लगता है कि वो परफेक्ट है, और इसिलए मैं चाहता हूँ कि आप लोग इसे मानो”, तो कुछ लोग उनकी बात को मानते थे, तो जो लोग उनकी बात को मानते थे, उनकी शादियाँ वो चर्च में कराते थे और एक-दो नहीं उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई थी। जिस समय वैलेंटाइन हुए, उस समय रोम का राजा था क्लौड़ीयस, क्लौड़ीयस ने कहा कि “ये जो आदमी है-वैलेंटाइन, ये हमारे यूरोप की परंपरा को बिगाड़ रहा है, हम बिना शादी के रहने वाले लोग हैं, मौज-मजे में डूबे रहने वाले लोग हैं, और ये शादियाँ करवाता फ़िर रहा है, ये तो अपसंस्कृति फैला रहा है, हमारी संस्कृति को नष्ट कर रहा है”, तो क्लौड़ीयस ने आदेश दिया कि “जाओ वैलेंटाइन को पकड़ के लाओ “, तो उसके सैनिक वैलेंटाइन को पकड़ के ले आये। क्लौड़ीयस नेवैलेंटाइन से कहा कि “ये तुम क्या गलत काम कर रहे हो ? तुम अधमर् फैला रहे हो, अपसंस्कृति ला रहे हो” तो वैलेंटाइन ने कहा कि “मुझे लगता है कि ये ठीक है”, क्लौड़ीयस ने उसकी एक बात न सुनी और उसने वैलेंटाइन को फाँसी की सजा दे दी, आरोप क्या था कि वो बच्चों की शादियाँ कराते थे, मतलब शादी करना जुर्म था। क्लौड़ीयस ने उन सभी बच्चों को बुलाया, जिनकी शादी वैलेंटाइन ने करवाई थी और उन सभी के सामने वैलेंटाइन को 14 फ़रवरी 498 ईःवी को फाँसी दे दिया गया। पता नहीं आप में से कितने लोगों को मालूम है कि पूरे यूरोप में 1950 ईःवी तक खुले मैदान में, सावर्जानिक तौर पर फाँसी देने की परंपरा थी। तो जिन बच्चों ने वैलेंटाइन के कहने पर शादी की थी वो बहुत दुखी हुए और उन सब ने उस वैलेंटाइन की दुखद याद में 14 फ़रवरी को वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया तो उस दिन से यूरोप में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है। मतलब ये हुआ कि वैलेंटाइन, जो कि यूरोप में शादियाँ करवाते फ़िरते थे, चूकी राजा ने उनको फाँसी की सजा दे दी, तो उनकी याद में वैलेंटाइन डे मनाया जाता है। ये था वैलेंटाइन डे का इतिहास और इसके पीछे का आधार। अब यही वैलेंटाइन डे भारत आ गया है जहाँ शादी होना एकदम सामान्य बात है यहाँ तो कोई बिना शादी के घूमता हो तो अद्भुत या अचरज लगे लेकिन यूरोप में शादी होना ही सबसे असामान्य बात है। अब ये वैलेंटाइन डे हमारे स्कूलों में कॉलजों में आ गया है और बड़े धूम-धाम से मनाया जा रहा है और हमारे यहाँ के लड़के-लड़िकयां बिना सोचे-समझे एक दुसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड दे रहे हैं। और जो कार्ड होता है उसमे लिखा होता है ” Would You Be My Valentine” जिसका मतलब होता है “क्या आप मुझसे शादी करेंगे”। मतलब तो किसी को मालूम होता नहीं है, वो समझते हैं कि जिससे हम प्यार करते हैं उन्हें ये कार्ड देना चाहिए तो वो इसी कार्ड को अपने मम्मी-पापा को भी दे देते हैं, दादा-दादी को भी दे देते हैं और एक दो नहीं दस-बीस लोगों को ये ही कार्ड वो दे देते हैं। और इस धंधे में बड़ी-बड़ी कंपिनयाँ लग गयी हैं जिनको कार्ड बेचना है, जिनको गिफ्ट बेचना है, जिनको चाकलेट बेचनी हैं और टेलीविजन चैनल वालों ने इसका धुआधार प्रचार कर दिया। ये सब लिखने के पीछे का उद्देँशय यही है कि नक़ल आप करें तो उसमे अकल भी लगा लिया करें। उनके यहाँ साधारणतया शादियाँ नहीं होती है और जो शादी करते हैं वो वैलेंटाइन डे मनाते हैं लेकिन हम भारत में क्यों।
परंपरागत भारतीय मूल्य एवं वेलेंटाइन डे
परंपरागत रूप से, भारतीय गाँव में नातेदारी अधिक मजबूत थी। यह नातेदारी प्राय: जाति पर आधारित था जिसके तहत विवाह संबंध भी अपने ही जाति में निर्धारित की जाती थी जो कि आंशिक सुधार के बाद आज भी प्रचलन में है। आमतौर पर गाँव के बुजुर्ग, स्कूल शिक्षक, वरिष्ठ रिश्तेदार, नाई और ब्राह्मण गाँव के वयस्क बच्चों के लिए उपयुक्त वर खोजते थे। ऐसे विवाह अधिकतर जातिगत मानदंडों द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही संपन्न होते थे। तथापि भारत में विवाह एक सामाजिक और धार्मिक प्रथा रही है। यद्यपि हिन्दू विवाह का अर्थ जन्म-जन्मांतर का संबंध और मुस्लिम विवाह को एक समझौता माना जाता हैं। लेकिन आधुनिकता के साथ विवाह संबंध प्रेम-संबंधों में तब्दील हो चुकी हैं जिसे वेलेंटाइन डे के माध्यम से देखा जा सकता हैं।
दरअसल प्रेम की व्यक्तिगत भावनाओं के इस अचानक सार्वजनिक प्रदर्शन ने भारतीय समाज के कुछ वर्गों को झकझोर दिया है जिसमें एक ओर कट्टरपंथी और दूसरी ओर रूढ़िवादी धर्मांध वर्ग प्रमुखता से शामिल हैं। जहाँ रूढ़िवादी धर्मांध वर्ग ने वेलेंटाइन डे की निंदा करते हुए इसे पश्चिमीकरण और वैश्वीकरण का अवांछनीय प्रभाव बताया है, वहीं कुछ लोगों को इस नए ‘प्रेम उत्सव’ के पीछे एक छिपे एजेंडे का संदेह है। उभरते भारतीय मध्यम वर्ग को लक्षित करके खुलेआम व्यवसायीकरण को बढ़ावा देने के लिए पश्चिम के नव-साम्राज्यवाद को दोषी ठहराते हैं। हालाँकि रूढ़िवादी इस प्रेम उत्सव के पीछे पश्चिम की ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ के संबंध में कट्टरपंथियों से सहमत हैं, लेकिन उनके आरोप अलग हैं। ऐसे में कई प्रकार्यवादी विद्वानों का तर्क है कि वेलेंटाइन डे कथित तौर पर पारंपरिक भारतीय संस्कृति को नष्ट करने और भारतीय युवाओं को नैतिक रूप से भ्रष्ट करने वाली बाहरी ताकतों द्वारा फैलाई जा रही सांस्कृतिक प्रदूषण हैं।

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