आधुनिक युग में होली मनाने की पुरानी परंपरा हुई विलुप्त....!!

●गांव में परंपरागत होली गायन लुप्त के कगार पर
●गांव में परंपरागत होली गायन की पुरानी परंपरा हुई विलुप्त
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव-शंखनाद साहित्यिक मंडली

आज के आधुनिक युग में गुजरे जमाने की होली मनाने की पुरानी परंपरा विलुप्त होती दिख रही है। दो दशक पूर्व फागुन माह प्रवेश करते ही लोग होली त्योहार की तैयारी में जुट जाते थे। लोगों में त्योहार को लेकर काफी उत्साह रहता था। लेकिन आज के दौर में गुजरे जमाने की होली मनाने की परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी है। बुजुर्गों ने बताया कि आज से करीब दो दशक पूर्व फागुन माह प्रवेश करते ही होली की तैयारी शुरू हो जाती थी। लोगों में होली को लेकर काफी उत्साह दिखता था। पुरानी संस्कृति के अनुसार शाम ढलते ही होली गीत गाने वालों की टोली जुटती थी। देर रात तक गीत गाने का दौर चलता रहता था। देवी-देवताओं पर आधारित होली गीत गाए जाते थे। होली की गीतों से पूरा गांव गुंजायमान रहता था। इसमें बुजुर्ग, युवा व बच्चे एक साथ बैठते थे। यहां तक कि एक परिवार के लोग साथ में होली गीत गाते थे। इस दौरान महिलाएं भी गीत सुनने के लिए पहुंचती थीं। अभी भी ग्रामीण इलाकों में कुछ जगहों पर परंपरागत गीत की धुन सुनाई पड़ती है। आज के दौर में ज्यादातर ध्वनि विस्तारक यंत्र से होली गीत सुनाई पड़ती है। गीत के बोल में अश्लीलता झलकती है। यहां तक की अभी की होली गीत अपने परिवार के सदस्यों के साथ सुना नहीं जा सकता है। खासकर महिलाओं को अभी की होली गीतों से शर्मसार होना पड़ रहा है। इससे होली की पुरानी परंपरा समाप्त होने के कगार पर है।
एक माह पूर्व से होलिका दहन की होती थी तैयारी

समाजसेवी सरदार वीर सिंह ने बताया कि होलिका दहन के बाद हिदू रीति-रिवाज के अनुसार नये साल का आगाज होता था। गुजरे जमाने में गांव के एक स्थान पर होलिका दहन किया जाता था। इसके लिए करीब एक माह पूर्व से तैयारी की जाती थी। शाम होते ही ढोल-बाजे के साथ युवाओं की टोली निकलती थी। और लोगों के घर पहुंचकर होली गीत गाते थे। इसके साथ ही गोइठा, लकड़ी का संग्रह किया जाता था। होलिका दहन के दिन बुजुर्ग, युवा, बच्चे व महिलाओं की भीड़ जुटती थी। और देवी-देवताओं का सुमिरन कर ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चारण के साथ होलिका दहन किया जाता था। सुबह होने के बाद लोग होलिका दहन स्थल पर पहुंचकर राख की टिक लगाते थे। इसके साथ ही होली खेलने का दौर शुरू होता था। लेकिन आज एक ही गांव में दर्जनों जगह होलिका दहन किया जाता है।
आपसी भाईचारे के साथ मनाई जाती थी होली

 समाजसेवी अरुण बिहारी शरण ने बताया कि दो दशक पूर्व होली के अवसर पर बाहर रहने वाले लोग अपने घर पहुंच जाते थे। और अपने परिवार के साथ मिलकर होली पर्व मनाते थे। इसके साथ ही पुआ, पूड़ी, खीर समेत विभिन्न व्यंजन बनाया जाता था। पूरे परिवार एक जगह बैठकर खाते थे। साथ ही लोग एक दूसरे के घर पहुंचते थे। बुजुर्गों के पैर पर अबीर लगाकर आशीर्वाद लेते थे। एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर पर्व की बधाई भी देते थे। उस वक्त लोगों के बीच आपसी भाईचारा दिखता था। आज के दौर में होली पर्व पर लोग आपसी दुश्मनी का बदला लेने में जुटे हैं। जिसके कारण सभ्य लोग घर से बाहर भी निकलना नहीं चाहते हैं। और लोगों के बीच आपसी भाईचारा समाप्त होता दिख रहा है।
सुरक्षा के बीच मनाई जाती है होली

 समाजसेवी धीरज कुमार ने बताया कि दो दशक पूर्व होली पर्व आपसी भाईचारे के साथ मनाई जाती थी। लोग एक-दूसरे के घर पहुंचकर अबीर-गुलाल लगाकर पर्व की बधाई देते थे। और आपस में कोई मारपीट व झगड़ा नहीं होता था। इसके लिए कोई बैठक तक नहीं होती थी। आज के दौर में होली पर्व पर पंद्रह दिनों से पूर्व से शांति समिति की बैठक होती है। और प्रशासनिक पदाधिकारी द्वारा पर्व को शांतिपूर्ण संपन्न कराने के लिए आदेश जारी किया जाता है। इसके साथ ही पर्व के दिन गली-मोहल्लों में पुलिस जवान को तैनात किया जाता है।
सरपंच नरेश प्रसाद ने बतायाकि होली न केवल रंगों का त्योहार है, बल्कि सामाजिक सद्भावना का पर्व है। पहले की होली काफी मनमोहक होती थी। फागुन महीना शुरू होते ही होली गीतों के माध्यम से देवी-देवताओं का सुमिरन किया जाता था। लेकिन अब होली ने अश्लीलता का रूप ले लिया है। पुरानी परंपरा व उन दिनों की बात ही समाप्त हो गई है। इसके साथ ही आपसी भाईचारा भी समाप्त हो चुका है।

 समाजसेवी अजय केशरी ने बताया बदलते परिवेश में पुरानी संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। आज फूहड़ गीत लोगों के सामने परोसे जा रहे हैं। इससे मारपीट की घटनाएं बढ़ गई है। सभ्य परिवार के लोग होली खेलने से परहेज करने लगे हैं। अब होली पर्व का महत्व ही समाप्त हो चुका है। आज के दौर में पर्व को शांतिपूर्ण संपन्न कराने के लिए पुलिस जवानों को तैनात किया जाता है।
समाजसेवी अरुण कुमार सिंह ने बताया दो दशक पूर्व फागुन माह प्रवेश करते ही होली की पारंपरिक गीतों का दौर शुरू हो जाता था। शाम ढलते ही बुजुर्ग, युवा व बच्चों की टोली जुट जाती थी। और लोग ढोल, नगाड़ा, झाल के साथ होली की पारंपरिक गीत गाते थे। यह सिलसिला एक महीने तक चलता रहता था। जिसमें परिवार के सभी सदस्य शामिल होते थे। लेकिन आज अश्लील गीतों का दौर शुरू हो गया है। और पारंपरिक गीत समाप्त हो चुका है। पहले की अपेक्षा अब लोग अपने परिवार में सिमट चुके हैं।
 रजनीश कुमार उर्फ़ मुन्ना ने बताया करीब दो दशक पूर्व फागुन माह में मोहल्लों में पारंपरिक होली गीत की शोर होने लगती थी। जो अपनी संस्कृति का अहसास कराता था। लेकिन आज ध्वनि विस्तारक यंत्र पर होली गीत बजाये जाते हैं। इन गीतों की धुन में अश्लीलता भरा रहता है। खासकर समाज की महिलाओं को शर्मसार होना पड़ता है। पहले होली पर्व पर लोग एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर बधाई देते थे। और बुजुर्गों का पैर छुकर आशीर्वाद लेते थे।

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