“बिहार की शराबबंदी: सामाजिक क्रांति या अवैध शराब का साम्राज्य?..

 आलेख: लेखिका सविता बिहारी
बिहार में अप्रैल 2016 में लागू पूर्ण शराबबंदी अब अपने दसवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसे महिलाओं की मांग और सामाजिक सुधार के नाम पर लागू किया था। सरकार का दावा था कि इससे घरेलू हिंसा, अपराध और नशाखोरी पर रोक लगेगी।

करीब एक दशक बाद सामने आए आंकड़े इस नीति की जटिल तस्वीर पेश करते हैं। एक ओर महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सुधार की बातें सामने आती हैं, तो दूसरी ओर अवैध शराब का विशाल नेटवर्क, राजस्व नुकसान और जहरीली शराब से मौतें गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
कानून का कड़ा इस्तेमाल
2016 से 2025 के बीच शराबबंदी कानून के तहत 16 लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया। राज्य में 10 लाख से ज्यादा केस दर्ज हुए। इस दौरान पुलिस ने 4.5 करोड़ लीटर से अधिक अवैध शराब और 1.6 लाख से ज्यादा वाहन जब्त किए।
इतनी बड़ी संख्या बताती है कि यह देश के सबसे ज्यादा लागू किए जाने वाले दंडात्मक कानूनों में से एक बन चुका है।

महिलाओं को मिला कुछ राहत
शराबबंदी के समर्थक मानते हैं कि इसका सबसे बड़ा फायदा महिलाओं को हुआ है। कई सरकारी और सामाजिक रिपोर्टों के अनुसार शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा में लगभग 37% तक कमी आई है।
महिलाओं के खिलाफ अपराध में भी 45% तक गिरावट दर्ज की गई। गरीब परिवारों में बचत बढ़ी और घरों का पैसा शराब के बजाय बच्चों की पढ़ाई, भोजन और जरूरतों पर खर्च होने लगा।
लेकिन बढ़ा अवैध कारोबार
नीति का दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है। शराबबंदी के बावजूद बिहार में अवैध शराब का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा हो गया है। पड़ोसी राज्यों से तस्करी खुलेआम हो रही है। कई जगहों पर देसी शराब की अवैध भट्टियां चल रही हैं।
कई रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि इस काले कारोबार में युवाओं की संख्या बढ़ रही है, जो पड़ोसी राज्यों से शराब लाकर कई गुना कीमत पर बेचते हैं।

जहरीली शराब से मौतें
शराबबंदी के बाद जहरीली शराब की घटनाएं भी चिंता का विषय बनी हैं। 2016 से 2025 के बीच बिहार में 190 से अधिक लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हुई है।
सारण क्षेत्र को इस तरह की घटनाओं का हॉटस्पॉट माना जाता है, जहां त्योहारों के समय ऐसी घटनाएं ज्यादा सामने आती हैं।

राजस्व को भारी झटका
शराबबंदी से राज्य की आय पर भी बड़ा असर पड़ा। 2016 से पहले बिहार सरकार को शराब से करीब 3142 करोड़ रुपये सालाना राजस्व मिलता था।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आज राज्य को हर साल लगभग 40 हजार करोड़ रुपये तक के संभावित राजस्व का नुकसान हो रहा है, जो विकास योजनाओं को प्रभावित कर सकता है।

पुलिस-प्रशासन पर बढ़ा दबाव
शराबबंदी लागू कराने में पुलिस और प्रशासन को भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। पिछले कुछ वर्षों में 400 से ज्यादा पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई है।
कई अधिकारियों को निलंबित, बर्खास्त या पद से हटाया गया। इससे शराब माफिया और प्रशासन की मिलीभगत के आरोप भी लगातार उठते रहे हैं।

इतिहास में भी रहा है शराबबंदी का प्रयोग
बिहार में शराबबंदी की परंपरा पुरानी है। 1938 में स्वतंत्रता सेनानी जगलाल चौधरी ने कुछ जिलों में शराबबंदी लागू कर इतिहास रचा था।
इसके बाद 1977 में जननायक कर्पूरी ठाकुर ने भी पूर्ण शराबबंदी लागू की, लेकिन राजनीतिक दबाव और शराब माफिया के कारण यह ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी।

बड़ा सवाल अभी भी कायम
करीब दस साल बाद भी बिहार में यह बहस जारी है कि शराबबंदी राज्य के लिए वरदान है या अभिशाप।
एक पक्ष इसे महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सुधार का बड़ा कदम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे अवैध कारोबार, जहरीली शराब और राजस्व नुकसान को बढ़ावा देने वाली नीति बताता है।

अब सवाल यह है कि क्या बिहार को शराबबंदी को और सख्ती से लागू करना चाहिए या इस नीति की नई समीक्षा करने का समय आ गया है।

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