बिहार का मघड़ा धाम, जहां चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी दौरा किया था .....!!

●मघड़ा का अद्भुत शीतलाष्टमी मेला
●बिहार में नालंदा के ऐतिहासिक मघड़ा धाम 
 ●मघड़ा में मां शीतला का अद्भुत और ऐतिहासिक मेला
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली

बिहारशरीफ शहर के पंचाने नदी के तट पर बसी ऐतिहासिक गांव मघड़ा है। यह जिला मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला का मंदिर है। यहाँ तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेले का भव्य आयोजन होता है। यह मेला चैत्र कृष्ण सप्तमी की पावन तिथि से शुरू होता है। इस दिव्य मेले में शामिल होने के लिए उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली समेत सात समंदर पार से भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां के दरबार में मत्था टेकते हैं। 
मघड़ा मेला का इतिहास और पौराणिक महत्व:

सती से संबंध: मान्यता है कि जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के खंड किए थे, तब शिव ने सती के अवशेषों को एक 'मघ' (घड़े) में यहाँ छिपाया था, जिसे बाद में खुदाई में माता की प्रतिमा के रूप में प्राप्त किया गया।
मेले का ऐतिहासिक और आस्था का अटूट विश्वास :

मघड़ा का मेला केवल लोक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रमाण इतिहास के पन्नों में भी दर्ज हैं। चीनी यात्री ह्वेनसांग जब नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब वे अक्सर इस मंदिर परिसर के नीम और पीपल की शीतल छांव में विश्राम किया करते थे, जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी पुस्तकों में भी किया है।
              पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर जब ब्रह्मांड का भ्रमण कर रहे थे, तब माता का कंगन और शरीर का कुछ हिस्सा यहां गिरा था। जिससे इस स्थान का नाम 'मघड़ा' प्रसिद्ध हुआ। बाद में राजा वृषकेतु को मिले ईश्वरीय स्वप्न के बाद हुई कुएं की खुदाई में माता की अलौकिक प्रतिमा यहां से प्रकट हुई। जिसे मिट्ठी कुआं (मीठा कुआं) कहते है।
यहां कभी गुप्तकाल के शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय चीनी चात्री फाह्यान ने पूजा की थी। माता शीतला मंदिर के पास ही एक बड़ा सा तालाब है। माता के दर्शन को आने वाले श्रद्धालु तालाब में स्नान करने के बाद ही पूजा-अर्चना करते हैं। वहीं स्कंदपुराण में भी इस अद्भूत मंदिर व तालाब का जिक्र है।  
अद्भुत परंपरा, जो विश्व में और कहीं नहीं :

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज बड़ा रूप ले चुका है। हर साल चैत माह के कृष्णपक्ष के दिन सप्तमी से ही भव्य मेला का आयोजन किया जाता है। इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि सप्तमी के दिन ही माता शीतला के नाम से अरवा चावल, चना का दाल, साग, पुड़ी, हलवा आदि पकवान बनाए जाते हैं और माता को भोग लगाया जाता है। इसके ठीक अगले दिन अष्टमी को मघड़ा व आसपास के इलाके में ही नहीं बल्कि माता में आस्था रखने वाले तमाम लोगों के घर में चूल्हे नहीं जलते हैं। इस दिन यदि किसी के घर में कोई अतिथि भी आ जाए तो चाय तक नहीं बनाया जाता। सप्तमी को बने प्रसाद को लोग अष्टमी को बसियौरा के रूप में ग्रहण करते हैं।
बसियौरा और निर्जल चूल्हा: मघड़ा की सबसे अद्भुत परंपरा 'बसियौरा' पूजा है, जो त्याग और नियम की पराकाष्ठा है।
अनोखा नियम: अष्टमी के दिन पूरे गांव में चूल्हा जलाना वर्जित रहता है। यहां तक कि घरों में झाड़ू भी नहीं लगाई जाती।
प्रसाद का विधान: सप्तमी को निर्मित चने की दाल, चावल और सब्जी-पूड़ी का 'बासी' भोग, अष्टमी को मां को अर्पित किया जाता है।
अक्षय जलस्रोत: इस प्रसाद को बनाने के लिए केवल ऐतिहासिक 'मिट्ठी कुआं' के जल का ही उपयोग होता है। माना जाता है कि ये वही स्थान है जहां से मां प्रकट हुई थीं और भीषण गर्मी में भी इस कुएं का जल कभी कम नहीं होता।
भभूत से मिटते हैं असाध्य रोग :

लोगों में विश्वास है कि चेचक और चर्म रोगों जैसी व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए माता शीतला का दरबार सर्वोत्तम है। श्रद्धालु यहां की पवित्र भभूत और पास के तालाब के जल को संजीवनी मानते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार तालाब में स्नान करने से चेचक रोग से मुक्ति मिल जाती है। शरीर में जलन की शिकायत है तो उससे भी राहत मिलती है।
 
84 डिसमिल में फैला है मघड़ा तालाब :

84 डिसमिल में फैले इस तालाब की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। अमूमन तालाब मानव निर्मित होता है। लेकिन यह तालाब दैविक है। इस तालाब की स्थापना कब और किसने की इसका जिक्र कहीं नहीं है। मान्यता के अनुसार तालाब-महिमा तथा माता शीतला की कृपा के कारण इस गांव को सिद्धपीठ के रूप में जाना जाता है। तालाब में सालों भर लबालब पानी भरा होता है। लेकिन सफाई व्यवस्था की कमी के कारण पानी के तासीर में कमी आती जा रही है।
मघड़ा मेला में अमर सिंह उर्फ चुन्नू सिंह ने बताया कि मान्यता के अनुसार माता शीतला की पूजा आग व अन्य गर्म चीजों से करना वर्जित है। इस कारण मां शीतला की मंदिर में अग्नि जलाना मना है। शीतलाष्टमी के दिन भी लोग घर में चूल्हा नहीं चलाते हैं और बासी प्रसाद खाकर बसियौरा मनाते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

प्रधानाध्यापक के सेवानिवृत्ति पर भव्य विदाई समारोह का आयोजन, शिक्षकों और छात्रों ने दी भावभीनी विदाई...!!

सुपुर्दे खाक हुए मो. तस्लीमुद्दीन, संघ के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष कुमार राकेश ने कहा- अलविदा भाई.....!!

शिक्षक नेता के निधन पर ककड़िया में श्रद्धांजलि सभा.....!"