औंगारी धाम एक प्राचीन और पौराणिक सूर्य मंदिर....!!

● द्वापर युग से जुड़ा है औंगारी धाम का इतिहास
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली

नालंदा जिले के एकंगरसराय प्रखंड मुख्यालय से लगभग तीन किमी दूर है कि द्वापरकालीन सूर्योपासना का केन्द्र औंगारी धाम। यहां का सूर्य मंदिर अनूठा है। शायद यह देश का इकलौता सूर्य मंदिर है, जिसका दरवाजा पश्चिम की ओर है। औंगारी धाम एक प्राचीन और पौराणिक सूर्य मंदिर है, जिसे देश के 12 मुख्य सूर्यपीठों में से एक माना जाता है। द्वापर युग में श्रीकृष्ण के पौत्र साम्ब द्वारा स्थापित इस मंदिर की खासियत है कि इसका द्वार पश्चिममुखी है, जिसका संबंध एक बारात को चुनौती देने की लोककथा से है। यहाँ के पवित्र सूर्य कुंड में छठ पूजा के दौरान स्नान करने से चर्म रोग ठीक होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
 
सूर्य मंदिर में काले पत्थर की प्रतिमा है :

द्वापर युग में इसे अंगारक के रूप में जाना जाता था, जो बदलते-बदलते अपभ्रंश के रूप में औंगारी बोला जाने लगा है। यहां एक काफी पुराना सूर्य मंदिर है। यहां की मूर्तियां काले पत्थर की है। एक मान्यता के अनुसार इसे अंगामनाथ मठ के नाम से भी जाना जाता था।
औंगारी धाम की प्रमुख कहानी और विशेषताएँ:

हिंदू धर्मावलंबियों में जातीय छुआछूत को लेकर कई तरह का रूढ़िवाद रहा है। ऐसे में जब छठ महापर्व की बात आती हैं तो इसे जातीय छुआछूत को मिटाने वाला पर्व भी माना जाता है। छठ महापर्व में विभिन्न जातियों के द्वारा आपसे सामंजस्य से इस पर्व को किया जाता है। जिसमें समाज के कई जातियों के द्वारा निर्मित सामग्री का उपयोग होता है। यह औंगारी धाम 300 ईसा पूर्व से सूर्य उपासना का केंद्र के नाम से जाना जाता है, जोकि अनोखी वास्तुकला और मूर्तियों का अनुपम संगम है।

ऐतिहासिक संबंध: मान्यता है कि भगवान कृष्ण के पौत्र साम्ब को कुष्ठ रोग (कोढ़) हुआ था। नारद जी की सलाह पर, उन्होंने 12 सूर्य मंदिरों की स्थापना की, जिसमें 'अंगारक' (अब औंगारी) शामिल है। यहाँ के सूर्य कुंड में स्नान करने से वे रोगमुक्त हुए थे।
पश्चिममुखी द्वार की किंवदंती: कहा जाता है कि एक बार एक बारात इस मंदिर के पास से गुजरी। बारातियों ने भगवान की शक्ति को चुनौती दी कि यदि वास्तव में यहाँ सूर्यदेव हैं, तो मंदिर का दरवाजा पूरब के बजाय पश्चिम की ओर हो जाए। मान्यता है कि उसी समय मंदिर का दरवाजा पश्चिम की ओर मुड़ गया और वह आज भी उसी दिशा में है।
औरंगजेब का हमला: इतिहास के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया था, लेकिन वे काले पत्थर की इस पौराणिक मूर्ति को नुकसान नहीं पहुँचा सके।
छठ व्रत का महत्व: कार्तिक और चैत्र छठ के पावन मौके पर यहाँ बिहार के अलावा देश-विदेश से भी लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं और तालाब में अर्घ्य देकर मन्नतें मांगते हैं।
प्राचीन मान्यता: पुराने समय में इसे 'अंगामनाथ मठ' के नाम से भी जाना जाता था और यहाँ आज भी भगवान सूर्य के साथ उनके सहचर भगवान विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की प्राचीन काले पत्थर की मूर्तियां मौजूद हैं। 
 
सूर्योपासना के लिए नालंदा का पूरे देश में काफी महत्व है। देश के 12 जगहों पर भगवान श्री कृष्ण के पौत्र राजा साम्ब द्वारा सूर्यपीठ की स्थापना की गयी थी, जिसमें से दो नालंदा में ही है। सिलाव प्रखंड का बड़गांव और एकंगरसराय प्रखंड का औंगारी धाम। दोनों जगहों पर पूरे देश के लोग छठ व्रत करने आते हैं। औंगारी धाम को सूर्यपीठ के रूप में धार्मिक व पौराणिक मान्यता है। यहां का भी इतिहास भगवान श्री कृष्ण के पौत्र राजा साम्ब से जुड़ा है। यही कारण है कि पूरे देश से लोग यहां भी छठ व्रत करने आते हैं। चैत्र और कार्तिक दो मौके पर यहां छठव्रतियों की भीड़ जुटती है। लोग यहां आकर छठ करने की मनौती भी मांगते हैं। जब मन्नत पूरी हो जाती है तब लोग यहां आकर मन्नत पूरा करते हैं। कहा जाता है कि यहां सभी तरह के रोग व्याधि, दुख दूर होते हैं और मनोकामना पूरी होती है। हालांकि कोरोना को लेकर इस बार यहां मेला का आयोजन नही किया गया है। सूर्य मंदिर है, यहां काले पत्थर की प्रतिमा है द्वापर युग में इसे अंगारक के रूप में जाना जाता था, जो बदलते-बदलते अपभ्रंश के रूप में औंगारी बोला जाने लगा है। यहां एक काफी पुराना सूर्य मंदिर है। यहां की मूर्तियां काले पत्थर की है। यह प्रखंड मुख्यालय से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। एक मान्यता के अनुसार इसे अंगामनाथ मठ के नाम से भी जाना जाता था।
कुष्ठ रोग के श्राप से मुक्ति के लिए साम्ब ने कराया था निर्माण :

बड़गांव की तरह ही यहां का भी इतिहास राजा साम्ब से जुड़ा है। बताया जाता है कि राजा साम्ब की उपेक्षा से नाराज होकर नारद मुनि ने भगवान श्री कृष्ण को तीनों लोकों का समाचार सुनाने के क्रम में इनकी शिकायत श्री कृष्ण से कर दी। कहा कि साम्ब ब्रज में गोपियों के साथ रास रचा रहे हैं। इसके बाद उन्होंने साम्ब को जाकर कहा कि भगवान श्री कृष्ण उन्हें याद कर रहे। साम्ब काफी सुन्दर थे और उनका चेहरा श्रीकृष्ण से काफी मिलता जुलता था। नारद जी ने श्री कृष्ण को भी ब्रज में बुला लिया। प्रचलित कथाओं के अनुसार जब राजा साम्ब ब्रज पहुंचे तो गोपियां उनमें लिपट गयी, जिसे देख वह कुपित हो गये और कुष्ठ रोगी होने का श्राप दे दिया। बाद में जब कृष्ण को सच्चाई पता चला तो उन्होंने नारद जी से हल पूछने की बात कही। नारद जी ने ही भगवान सूर्य की उपासना और 12 सूर्य पीठों की स्थापना की सलाह दी थी।
आम दिनों में भी होती है पूजा : यहां आम दिनों में भी पूजा-अर्चना होती आ रही है। किसी भी दिन यहां पूजा शुभकारी है लेकिन रविवार को पूजा का विशेष महत्व है जो पूर्व पुराण में भी वर्णित है।
5.30 बजे खुलता है पट : सुबह 5.30 बजे सूर्यादय के पूर्व मंदिर का पट खुल जाता है। सूर्यास्त के बाद पट बंद होता है।
मौसम के अनुसार लगता है भोग : यहां मौसम के अनुसार उपलब्ध फल आदि के अलावा पकवान, बताशा का भोग लगता है। लोग विशेष रूप से सुगंधित लाल फूल चढ़ाते हैं।
चढ़ावे पर चल रही व्यवस्था : मंदिर की व्यवस्था चढ़ावे और चंदा से चल रही है। लोग यहां गुप्त दान भी करते हैं। स्थानीय पुजारी इसके अधिकारी होते हैं। मंदिर का खर्च इसी से चलता है। यहां वंशानुकरण के अनुसार पुजारी की व्यवस्था है और प्रत्येक पुजारी के लिए समय निर्धारित है।
मंदिर से जुड़ी है खास मान्यता : इस मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम की ओर है। जबकि पहले पूरब दिशा की ओर था। आम तौर पर पश्चिम की ओर मंदिर का मुख्य द्वार नहीं होता। मंदिर के गर्भगृह में आदमकद प्रतिमा भगवान भास्कर के साथ भगवान विष्णु का भी विराजमान है।

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