राजनीति के शिखर पुरुष जगजीवन राम की 118वीं जयंती पर विशेष,.....!!

जगजीवनराम ने देश में जनवितरण प्रणाली की नींव रखी थी
 ●सर्वहारा राजनीति के बड़े पुरोधा थे जगजीवन राम
● बाबू जगजीवन राम सर्वहारा वर्ग के झंडाबरदार अगुआ  
 
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली  

जगजीवन राम जिन्हें प्यार से लोग बाबूजी कहते हैं, अपने समय की राजनीति के बड़े पुरोधाओं में से एक थे। वे एक प्रख्यात समाज सुधारक, असाधारण सांसद और सर्वहारा वर्ग के झंडाबरदार अगुआ थे। उन्होंने अपना राजनीतिक सफर एक अनुसूचित नेता के तौर पर शुरू किया था, परन्तु शीघ्र ही देश भर में उनकी ख्याति एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय राजनेता के रूप में फैल गई। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, कई भाषाओं के जानकार, चिन्तक और विचारक बाबूजी समय समय पर हर वर्ग को जगाया करते थे।
बाबू जगजीवन राम, लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी शोषितों की आवाज गंगाराम धानुक के राजनीतिक शिष्य थे। जगजीवन राम बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों, छात्रों, नौजवानों, साहित्यकारों और सवर्णों के बीच भी वे उतने ही लोकप्रिय थे जितने अनुसूचितों एवं पिछड़ों में बाबूजी ने करीब पाँच दशक तक देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया। स्वतंत्रता के बाद तथा डॉ० आंबेडकर की मृत्यु के पश्चात् उनका कद इतना ऊँचा हुआ कि न केवल अनुसूचित जाति उन्हें अपना रहनुमा समझते थे वरन किसी भी प्रधानमंत्री के लिए सामान्यतः उनकी सलाहों को नजरअंदाज करना मुश्किल हुआ करता था। यही नहीं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी भी उन्हें आदरपूर्वक बाबूजी के नाम से सम्बोधित करती थीं। उनका जन्मदिन समता दिवस के रूप में देशभर में मनाया जाता है।

जगजीवन राम का जन्म, शिक्षा और पारिवारिक जीवन:  

जगजीवन राम का जन्म बंगाल प्रेसिडेंसी के तत्कालीन शाहाबाद जिला, वर्तमान भोजपुर (आरा) जिला बिहार राज्य के आरा मुख्यालय से सटे चंदवा नामक गांव में पिता शोभी राम और माता वासंती देवी के यहाँ 5 अप्रैल 1908 को हुआ था। उनके पिता शोभी राम एक शिवनारायणी संत थे वे अपने इलाके के शिवनारायणी संप्रदाय के गुरू थे। उनकी अपनी गद्दी और पीठ थी। वे संत रैदास और संत कबीर के भी भक्त थे। जगजीवन राम तीन भाइयों और पाँच बहनों में सबसे छोटे थे। शोभी राम के दो बेटे और तीन बेटियाँ ही जीवित बचे थे। पुत्रों के नाम क्रमशः संतलाल, जगजीवन राम तथा पुत्रियों के नाम बालकेशी, रामकेशी और रामदासी थे। जगजीवन राम 6 वर्ष के अबोध बालक थे, तभी उनके पिता ने अपने जीवन की अंतिम सांस 50 वर्ष की उम्र में ली। उनके पिता ने मृत्यु के समय उनकी माता से वचन लिया था कि वह उनके सबसे छोटे पुत्र को शिक्षा दिलायेंगी। इसी वचन के कारण उनकी माता ने उनका पाठशाला में नामांकन कराया। 8 वर्ष की अल्पायु में जगजीवन राम की शादी हो गयी। उनकी शादी अपने गांव से 5 किलोमीटर दूर सोनपुरा गांव के सुख लाल की 6 वर्षीया पुत्री भूली से हुई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा नगरपालिका पाठशाला आरा में हुई थी। 5वीं कक्षा तक प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत आरा के अग्रवाल मिडिल (महाजनी) स्कूल में उन्होंने दाखिला लिया। यहाँ अंग्रेजी न आने के कारण परेशानियों का सामना किया। परन्तु अपनी अटूट लगन व मेहनत के बल पर कुछ ही महीनों में अपनी कक्षा के सामान्य छात्रों से आगे बढ़त बना ली। अंग्रेजी में समाचार पत्र पढ़ने लगे और अंग्रेजी में धाराप्रवाह बोलने लगे। मिडिल स्कूल पास करने के बाद उन्होंने सन् 1922 में आरा टाउन स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ युवा जगजीवन राम को फिर छुआछूत और जात पात का कटु अनुभव हुआ। उनके पानी पीने हेतु एक अलग घड़े की व्यवस्था की गई। इस बात ने उन्हें कहीं गहरे तक जाकर प्रभावित किया और इसका उत्तर आक्रोश बनकर उनके अंदर से निकला। जिसके चलते उन्होंने अलग रखे घड़े को फोड़ दिया- एक बार नहीं तीन–तीन बार। अंततः घड़े के बार-बार फूटने से परेशान प्रधानाध्यापक ने बड़ी जाति के छात्रों की शरारत समझकर आदेश दिया कि जगजीवन राम भी सवर्ण हिन्दुओं के घड़े से ही पानी पिया करेगा, जिसे इस पर एतराज हो, वह अपनी व्यवस्था स्वयं करे। जगजीवन राम धीरे-धीरे जीवन के हर क्षेत्र में विजय प्राप्त करते रहे। उस जमाने में सवर्णों की गली से जूता पहनकर, छाता लगाकर चलना, सड़कों पर बैलगाड़ी में बैठ कर चलना, घोड़े पर सवार होकर चलना, अच्छे कपड़े पहनना अछूत का बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था। उन्हें मरे हुए जानवर (गाय, भैंस) को उठाना और उसका सड़ा माँस खाने को मजबूर किया जाता था। कोई अछूत इसकी अवहेलना करने की हिमाकत नहीं कर सकता था। पर, बालक जगजीवन राम ने वह हिम्मत दिखाई।
अपने गृह जिला शाहाबाद, बिहार से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करने के बाद पंडित मदन मोहन मालवीय के बुलावे पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययन करने गए। यहाँ भी उन्हें कथित अछूत जाति के होने का कटु अनुभव हुआ। बिरला छात्रावास में ब्लाक सर्वेन्ट (कहार) ने बर्तन धोने तथा नाई ने बाल काटने से इनकार कर दिया। जगजीवन राम को बिरला छात्रवृत्ति प्रदान की गई थी। बिरला छात्रवृत्ति धारकों को छात्रावास में रहना अनिवार्य था। जगजीवन राम आचार्य ध्रुव से मिले और छात्रावास में अपनी कठिनाइयों को बताया तथा विश्वविद्यालय से बाहर रहने की इजाजत माँगी। आचार्य ध्रुव ने कहा कि मेरे साथ आ जाओ। जगजीवन राम ने कहा कि कल आपका नौकर बर्तन मलने से इन्कार कर देगा तब आप क्या करेंगे? आचार्य ध्रुव ने कहा कि देखो, महाराष्ट्र का एक अछूत विद्यार्थी शंकर जी गुल्डेकर चौथे हॉस्टल ( रुईया छात्रावास) में रहता है और अपना खाना बना लेता है, तुम भी बना लेना। जगजीवन राम ने कहा कि विश्वविद्यालय में रहकर वे यह काम नहीं करेंगे, बाहर रह कर सभी काम कर लेंगे। जब विश्वविद्यालय में रहकर खाना बनायेंगे तो हर वक्त दिमाग में यही आयेगा कि चूंकि चमार इसलिए उन्हें अपना खाना अलग बनाना पड़ रहा हर वक्त हीन भावना दिमाग में रहेगी। यह पसन्द नहीं करते। आचार्य ध्रुव विश्वविद्यालय के नियमों के विरुद्ध उन्हें छात्रावास बाहर रहने की स्वीकृति दी। उन्हें छात्रावास छोड़कर अस्सी घाट पर रहना पड़ा। जहाँ एक केवट (मल्लाह) के मकान में किराये पर रहे। बाद में केवट ने भी जाति का पता चलने पर घर छोड़ने को कहा। पर, पेशगी पहले दे देने के कारण कुछ लोगों के द्वारा बीच बचाव करने के बाद केवट ने उन्हें मकान रहने दिया। माहौल में रहते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आई०एससी० की परीक्षा पास की। काशी में उन्होंने संत रैदास, संत कबीर एवं मध्य युगीन संतों अन्य धर्म ग्रंथों का भी अध्ययन किया। उनसे उन्हें संघर्ष की प्रेरणा मिली। विश्वविद्यालय जैसे उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान में भी छुआछूत एवं अन्य अमानवीय बर्ताव से वे इतने क्षुब्ध हुए कि आगे की पढ़ाई बनारस में नहीं करने का निश्चय कर कलकत्ता चले गये। उनके बड़े भाई संतलाल, कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में कम्पाउंडर थे। जगजीवनन राम विद्यासागर कॉलेज में बी.एस.सी. में प्रवेश लिया और 1931 में बी.एस.सी. की डिग्री प्राप्त की। जगजीवन राम के सार्वजनिक जीवन की शुरुआत पटना के अस्पृश्यता विरोधी सम्मेलन के माध्यम से शुरू हुई। 1933 में वे हरिजन सेवक संघ बिहार के मंत्री बनाए गए। काँग्रेस सम्मेलनों में भाग लेना शुरू किया। वे स्वतंत्रता आन्दोलन में दो बार जेल गये (10 दिसम्बर, 1940 से 10 अक्टूबर, 1941 तक तथा 19 अगस्त, 1942 से 05 अक्टूबर 1943 तक)। कुल मिलाकर करीब 24 महीने हजारीबाग जेल में रहे। 
उनकी पहली पत्नी भूली देवी का देहांत बीमारी के कारण 1933 में हुई। पुनः कानपुर निवासी डॉ. बीरबल की पुत्री इन्द्राणी से जगजीवन राम का विवाह जून 1935 को हुआ। डॉ० बीरबल एक प्रसिद्ध चिकित्सक और समाजसेवी थे। इन्द्राणी देवी एक सुशिक्षित महिला थी। उनके एक पुत्र सुरेश कुमार और एक पुत्री मीरा कुमार हुए। उनके पुत्र और पुत्री दोनों ने अन्तर्जातीय विवाह किया था। सुरेश कुमार और उनकी पत्नी कमलजीत कौर की शादी ज्यादा दिनों तक सुखद नहीं रही। उन्हें तलाक की अर्जी देनी पड़ी। सुरेश कुमार की एकमात्र पुत्री मेधावी कीर्ती हुई। और मीरा कुमार की शादी कोयरी (कुशवाहा) समाज के भोजपुर जिला जगदीशपुर विधानसभा के विधायक सुमित्रा देवी के पुत्र मंजुल राज से हुई। उनके एक पुत्र अंशुल कुमार और दो पुत्रियाँ स्वाति कुमार तथा देवांगना कुमार हुई। जगजीवन राम के पुत्र सुरेश कुमार की मृत्यु 22 मई, 1985 को 46 वर्ष की उम्र में हो गयी।

जगजीवन राम और प्रधानमंत्री पद की कुर्सी:

बाबू जगजीवनराम भारत के चोटी के विचारक, भविष्यद्रष्टा और ऋषि राजनेता थे जो सबके कल्याण की बात  सोचते थे। बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। उनके सामने चार बार प्रधानमंत्री बनने के अवसर आये- सन् 1966, 1977, जुलाई 1979 और अगस्त 1979 में लेकिन प्रत्येक बार षड्यंत्रपूर्वक एवं जातिवादी पूर्वाग्रहों के चलते किसी न किसी बहाने उन्हें यह पद प्राप्त नहीं हुआ। यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि यदि वे अनुसूचित जाति के नहीं होते तो प्रधानमंत्री अवश्य बन गये होते। बाबूजी को प्रधान मंत्री पद की राह में जन्मना जातिप्रथा का कलंक हमेशा अवरोधक बना।  


  जगजीवन राम की विरासत:

जगजीवन राम ने राजनीति में अपनी बहुत लम्बी और सफल पारी खेली थी। सफलता ने उनके व्यक्तित्व को वह चमक दी, जिसे देख कर बहुतों को ईर्ष्या भी होती थी। उनका कद राजनेताओं के लिए अनुकरणीय और कामना की चीज बनी। उन्होंने बड़े पदों की शोभा बढ़ाई। राजनीति में उन्होंने बहुतों को उपकृत किया। बाबूजी एक भविष्यद्रष्टा थे। वे अपने समय से आगे की सोचा करते थे। वे मानते थे कि ज्ञान एक बड़ी शक्ति है। इसलिए उन्होंने ज्ञान की साधना करने वाली संस्थाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। उस बड़ी सोच के तहत ही उन्होंने विभिन्न प्रकार के सामाजिक और अकादमिक कार्यों की नींव रखी और उनको अंजाम तक पहुँचाने का कार्य किया। सामाजिक क्षेत्र में भी उन्होंने कई अच्छे कार्य किये थे। जगजीवन राम को धार्मिक प्रवृति, उच्च विचार, आदर्श मानवीय मूल्य और सूझबूझ जैसे गुण अपने माता-पिता से विरासत में मिला था।
बाबू जगजीवन राम का स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान:

भारतीय राजनीति के कई शीर्ष पदों पर आसीन रहे जगजीवन राम न सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी, कुशल राजनीतिज्ञ, सक्षम मंत्री एवं योग्य प्रशासक रहे वरन् एक कुशल संगठनकर्ता, सामाजिक विचारक व ओजस्वी वक्ता भी थे। बाबू जगजीवन राम शिक्षित थे जिसके कारण वो अंग्रेजों की “फूट डालो, राज करो” की नीति को अच्छे से समझते थे और वे गांधी जे के विचारों के प्रबल समर्थक थे। उस समय महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत दल से जुड़ गये। हिन्दू-मुश्लिम विभाजन, दलितों और सवर्णों के बीच मतभेद आदि समस्याएं थी। मुस्लिम लीग की कमान जिन्ना के हाथ में थी और जिन्ना अंग्रेजी सरकार के इशारों पर ही कार्य करते थे। उन्होंने विभिन्न उपक्रमों-विभागों मंक अनुसूचितों-पिछड़ों को जोड़ने, भर्ती करने और मुख्यधारा में लाने की राह प्रशस्त की।
 
बाबू जगजीवन राम की राजनितिक सफलता:

सन् 1946 ई. में जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार में शामिल हुए और उसके बाद सत्ता की उछ सीढ़ियों पर चढ़ते गये। पांच दशक से अधिक समय तक राजनीति में सक्रिय रहे। राजनीति में रहते हुए उनहोंने श्रम मंत्री, कृषि मंत्री, संचार मंत्री, रेलवे मंत्री और रक्षा मंत्री के पद को शुशोभित किया। इन क्षेत्रों में विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य भी किये। किसी भी मंत्रालय की समस्या का समाधान बड़े ही कुशलता से करते थे। बाबू जगजीवन राम ने कभी भी मंत्रालय से इस्तीफ़ा नहीं दिया। सभी मंत्रालयों का कार्यकाल पूरा किया।

दलित समाज के मसीहा व शोषितों की आवाज 'जगजीवन राम':

एक समय जगजीवन राम, कर्पूरी ठाकुर और रामनरेश यादव पर मनुवादी लोगों द्वारा फब्तियाँ कसी जाती थी।
दिल्ली से चमरा भेजा संदेश, कर्पूरी केश बनावे भैंस चरावे रामनरेश।
1936 से 1986 तक 50 वर्षों का उनका जनहित को समर्पित सार्वजनिक जीवन कुछ अपवादों को छोड़कर शानदार रहा। इस देश में राष्ट्रपति तो कोई दलित-मुसलमान बन जाता है, पर अफ़सोस कि ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर गर्व से भर जाने वाला यह देश आज भी एक दलित या मुसलमान को प्रधानमंत्री बनाने की सदाशयता उदारता दिखाने को तैयार नज़र नहीं आता। उम्मीद है, स्थितियां बदलेंगी और जो काम पहले नहीं किया गया, वो अब हिन्दुस्तान में दिखेगा।
जगजीवन राम को भारतीय समाज और राजनीति में दलित वर्ग के मसीहा के रूप में याद किया जाता है। वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में से एक थे जिन्होंने राजनीति के साथ ही दलित समाज के लिए नई दिशा प्रदान की। उन्होंने उन लाखों-करोड़ो अभिवंचितों की आवाज उठाई जिन्हें सवर्ण जातियों के साथ चलने की मनाही थी, जिनके खाने के बर्तन अलग थे, जिन्हें छूना पाप समझा जाता था और जो हमेशा दूसरों की दया के सहारे रहते थे। पांच दशक तक सक्रिय राजनीति का हिस्सा रहे जगजीवन राम ने अपना सारा जीवन देश की सेवा और दलितों के उत्थान के लिए अर्पित कर दिया।
जगजीवन राम का निधन: 

इस महान राजनीतिज्ञ का 6 जुलाई, 1986 में 78 साल की उम्र में निधन हो गया। बाबूजी ने एक सपना देखा था कि अभिवंचितों, पिछड़े और मजलूम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के मजबूत स्तम्भ बने, आत्मसम्मानी बने और देश को दिशा निर्देश देने का कार्य करें। उन्होंने जातिविहीन समाज बनाने तथा सच्चा स्वस्थ लोकतंत्र लाने का भी सपना देखा था। जातिवाद को समाप्त करने के लिए एक जाति के वर वधू की शादी को नाजायज करार देने का कानून बनाने की वकालत की थी। उन्होंने एक और सपना देखा था- सबको दो वक्त की रोटी देने का शिक्षा देने का, रोजगार देने का। ये सपने अभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँचे हैं। क्या ये सपने पूरे होंगे ?

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