शंखनाद के साहित्यकारों ने डुकारेल की 281वीं जयंती मनाई ......!!

पूर्णिया के प्रथम कलेक्टर डुकारेल को श्रद्धांजलि, बिहारशरीफ में विचार गोष्ठी आयोजित
●बिहारशरीफ में डुकारेल की 281वीं जयंती पर सामाजिक न्याय व स्त्री सुरक्षा पर चिंतन
●स्त्री सुरक्षा और समानता के अग्रदूत डुकारेल की जयंती पर बिहारशरीफ में परिचर्चा
●डुकारेल जयंती पर गूंजा सामाजिक न्याय का संदेश, शंखनाद मंडली ने किया आयोजन
●सामाजिक न्याय और स्त्री सुरक्षा के अग्रदूत थे डुकारेल  
बिहारशरीफ, 15 अप्रैल 2026 : बिहारशरीफ छोटीपहाड़ी, रामसागर राम जी के निवास पर स्थित सभागार में सामाजिक न्याय और स्त्री सुरक्षा के अद्वितीय अग्रदूत, पूर्णिया के प्रथम कलक्टर जेरार्ड गुस्तावस डुकारेल की 281 वीं जयंती शंखनाद साहित्यिक मंडली की ओर से उनके जीवन एवं कार्यों पर शंखनाद के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह कि अध्यक्षता में एक परिचर्चा आयोजित की गई।  जिसका मंच संचालन शंखनाद के मीडिया प्रभारी शायर नवनीत कृष्ण ने किया।
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह, महासचिव राकेश बिहारी शर्मा एवं प्रोफेसर डॉ. शकील अहमद अंसारी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन एवं डुकारेल के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया।
जयंती समारोह की अध्यक्षता करते हुए नामचीन साहित्यिक योद्धा डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह ने उपस्थित विद्वानों एवं समाज के जागरूक नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम सब यहाँ एक ऐसे महान व्यक्तित्व की 281 वीं जयंती पर एकत्रित हुए हैं, जिन्होंने अपने कार्यों और विचारों से समाज में न्याय, समानता और विशेषकर स्त्री सुरक्षा की मजबूत नींव रखी-जेरार्ड गुस्तावस डुकारेल ने। डुकारेल केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं थे, बल्कि वे एक संवेदनशील समाज सुधारक भी थे। पूर्णिया के प्रथम कलक्टर के रूप में उन्होंने जिस निष्पक्षता और दृढ़ता के साथ कार्य किया, वह आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। उस दौर में, जब समाज में असमानताएँ और कुरीतियाँ व्याप्त थीं, उन्होंने साहस के साथ सामाजिक न्याय की आवाज उठाई और महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
आज जब हम आधुनिक भारत में आगे बढ़ रहे हैं, तब भी उनके विचार और सिद्धांत उतने ही प्रासंगिक हैं। हमें यह समझना होगा कि समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब न्याय और सुरक्षा हर व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं तक पहुँचे।
आइए, हम सभी उनके आदर्शों को आत्मसात करें और एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जहाँ समानता, सम्मान और सुरक्षा हर नागरिक का अधिकार हो। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
मौके पर शंखनाद के महासचिव साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा ने कहा कि आज का यह अवसर हम सभी के लिए अत्यंत गर्व और प्रेरणा का क्षण है, जब हम जेरार्ड गुस्तावस डुकारेल जैसे महान व्यक्तित्व को स्मरण कर रहे हैं। डुकारेल ने अपने कार्यकाल में यह सिद्ध कर दिया कि प्रशासन केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम भी है। उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित किया और महिलाओं के सम्मान एवं सुरक्षा के लिए जो प्रयास किए, वे इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम उनके विचारों को केवल स्मरण तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और कार्यों में उतारें। समाज में व्याप्त अन्याय, भेदभाव और असुरक्षा के खिलाफ आवाज उठाना हम सभी का कर्तव्य है।
शंखनाद साहित्यिक मंडली सदैव ऐसे महान व्यक्तित्वों के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध रही है, और आगे भी इस दिशा में निरंतर कार्य करती रहेगी।
आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम एक न्यायपूर्ण, सुरक्षित और समतामूलक समाज के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँगे।
 
प्रोफेसर शकील अहमद अंसारी ने कहा कि जेरार्ड गुस्तावस डुकारेल के पिता का नाम एड्रियन कोल्टी डुकारेल और माता का नाम एलिज़ाबेथ (हैमिल्टन) कोल्टी डुकारेल था। 
भाई-जेम्स कोल्टी डुकारेल, बहन-एलिज़ाबेथ जेन (डुकारेल) सट्टन और मारिया कोल्टी (डुकारेल) मॉरिस एवं पत्नी का नाम एलिज़ाबेथ शर्फ-उन-निशा खानम। जो पूर्णिया की रहने वाली थीं। डुकारेल के छह बच्चे थे- दो बेटा और चार बेटी। इनमें से चार बच्चे कलकत्ता (भारत) में पैदा हुए थे और दो बेटी जेनी और हेरियट इंग्लैंड में।
डुकारेल की मृत्यु 14 दिसंबर 1800 ई. में दुर्घटना से हुई थी। लेकिन उसका सुपुर्द ए खाक 22 दिसंबर को हुआ था। इसलिए, इसमें भ्रम पैदा होता है।
इस अवसर पर शायर बेनाम गिलानी,सरदार वीर सिंह, सुभाषचंद्र पासवान, राजदेव पासवान, राम प्रकाश सिंह, जाहिद हुसैन,राज हंस कुमार, रामजी प्रसाद ,धीरज कुमार, पुनीत हरे, स्नेहा कुमारी, नितेश कुमार, प्रभात कुमार, राजीव कुमार सहित कई गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

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