आध्यात्म और मानवता का संगम: स्मृति शेष आचार्य चंदना जी महाराज....!!

सेवा, साधना और समर्पण की अमर गाथा: स्मृति शेष आचार्य चंदना जी

●मानव सेवा ही सच्चा धर्म: पद्मश्री आचार्य चंदना जी को विनम्र श्रद्धांजलि

●त्याग से सेवा तक का अद्वितीय सफर: आचार्य चंदना जी महाराज की प्रेरक जीवनगाथा

●एक साध्वी, एक मिशन, एक क्रांति: आचार्य चंदना जी का प्रेरणादायी जीवन

●सेवा की साध्वी, करुणा की प्रतिमूर्ति: पद्मश्री आचार्य चंदना जी को श्रद्धांजलि

●करुणा, सेवा और साधना की ज्योति: आचार्य चंदना जी सदैव स्मरणीय

●जिनका जीवन बना मानवता की मिसाल: आचार्य चंदना जी को भावपूर्ण नमन

●एक युग का अंत नहीं, प्रेरणा की शुरुआत: आचार्य चंदना जी की अमर कहानी
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव-शंखनाद साहित्यिक मंडली

आचार्य चंदना जी आधुनिक जैन समाज की एक अत्यंत प्रेरणादायक साध्वी, समाजसेवी और शिक्षाविद् थी। पद्मश्री आचार्य चंदना जी महाराज एक प्रतिष्ठित जैन साध्वी, समाज सेविका और 'वीरायतन' की संस्थापिका थी। उन्हें 2022 में भारत सरकार द्वारा सामाजिक कार्यों (समाज सेवा) के क्षेत्र में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
 
आचार्य चंदना जी का जन्म, शिक्षा और पारिवारिक जीवन :

आचार्य चंदना जी का जन्म 26 जनवरी 1937 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के चासकमन गाँव में कटारिया परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम शकुंतला कटारिया था। उनकी माता प्रेमकुंवर कटारिया और पिता माणिकचंद कटारिया थे। उन्होंने तीसरी कक्षा तक औपचारिक शिक्षा प्राप्त की थी। बचपन से ही उनकी इच्छा जरूरतमंदों की सहायता और सेवा करने की थी। शकुंतला के नाना ने उन्हें सुमति कुंवर से साध्वी दीक्षा लेने के लिए प्रेरित किया। चौदह वर्ष की आयु में, उन्होंने जैन दीक्षा प्राप्त की और साध्वी चंदना नाम से जानी गईं। उन्होंने जैन शिक्षाओं, जीवन के अर्थ और उद्देश्य तथा अन्य धर्मों का अध्ययन करने के लिए 12 वर्ष का मौन व्रत लिया। उन्होंने आचार्य तुलसी के सान्निध्य में दीक्षा ली। वे तेरापंथ जैन धर्मसंघ की प्रमुख साध्वियों में से एक बनीं। कठोर साधना, अनुशासन और ज्ञान के माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। उन्होंने मुंबई के भारतीय विद्या भवन से दर्शन आचार्य, प्रयाग से साहित्य रत्न और पथार्डी धार्मिक परीक्षा बोर्ड से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी। चंदना को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से नव्य-न्याय और व्याकरण के क्षेत्र में शास्त्री की उपाधि प्राप्त किया। 1968 में, उन्होंने उस संप्रदाय को छोड़ दिया जिसमें उन्हें दीक्षा दी गई थी और अमर मुनि की परंपरा में शामिल हो गईं। 1987 में, अमर मुनि ने चंदना को आचार्य की उपाधि प्रदान की। वह इस उपाधि से सम्मानित होने वाली पहली जैन साध्वी बनीं, जिसकी जैन समुदाय के कुछ लोगों ने आलोचना की।

 देश की पहली जैन साध्वी आचार्य :

आचार्य चंदना जी ने भले ही महाराष्ट्र में जन्म लिया है लेकिन उन्होंने बिहार को ही अपनी कर्म भूमि बनाया। वह देश की पहली जैन साध्वी हैं जिन्हें जैन समाज में प्रतिष्ठित आचार्य पद से सम्मानित किया है। जैन धर्म के इतिहास में पहली बार दीक्षित वर्ग द्वारा सक्रिय सेवा के सिद्धांत की स्थापना चंदना जी का एक क्रांतिकारी कदम माना जाता है।

सामाजिक कार्य और 'वीरायतन':

वीरायतन की स्थापना: 1973-74 में, उन्होंने बिहार के राजगीर में जैन धर्म के सिद्धांतों पर आधारित एक धार्मिक संगठन वीरायतन की स्थापना की थी। यह एक अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक संगठन है, जो आध्यात्मिक विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और जाति, पंथ, नस्ल या लिंग के आधार पर भेदभाव के बिना सेवाएं देता है। उन्होंने जैन समुदाय में 'सेवा' (मानव सेवा) की अवधारणा को प्रचलित किया, जो केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर समाज के उत्थान के लिए कार्य करती है। वीरायतन का उद्देश्य केवल धर्म प्रचार नहीं, बल्कि मानव सेवा था। इसका मूल मंत्र है: सेवा, शिक्षा और साधना।

कार्यक्षेत्र: वीरायतन के माध्यम से वे स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के क्षेत्रों में निर्धन और असाधारण परिवारों के लिए निस्वार्थ सेवा कर रही हैं।
कार्यक्षेत्र का विस्तार: राजगीर के अलावा, वीरायतन के केंद्र अमेरिका, इंग्लैंड, कीनिया, संयुक्त अरब अमीरात और नेपाल जैसे अन्य देशों में भी हैं, जहाँ अस्पताल और स्कूल चलाए जाते हैं। 

 उपलब्धियां और सम्मान:

26 जनवरी 2022 को चंदना जी को मानवीय सेवा और सामाजिक कार्य में उनके योगदान के लिए भारतीय सरकार द्वारा दिया जाने वाला चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किया गया।
5 सितंबर 2002 को, उन्हें केंद्रीय मंत्री श्रीमती सुमित्रा महाजन द्वारा वीरायतन के माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा, जनसंख्या, प्रदूषण नियंत्रण और प्राकृतिक आपदाओं के क्षेत्र में मानवता की सेवा के लिए श्री देवी अहिल्या राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
वीरायतन को करुणा, शिक्षा और अहिंसा के माध्यम से महावीर के कार्य को सभी तक विस्तारित करने में उनकी सेवा के लिए जैना राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया गया।
1980 में, चंदना ने यूनाइटेड किंगडम में लीसेस्टर जैन सेंटर में एक संग्रहालय की स्थापना में सहायता की। 1998 में, चंदना ने क्लीवलैंड, ओहियो में नेशनल फेडरेशन ऑफ एशियन इंडियंस ऑफ नॉर्थ अमेरिका के सम्मेलन में उद्घाटन प्रार्थना की, जो जैन धर्म के इतिहास में ऐसा करने वाली एकमात्र ज्ञात महिला संन्यासिनी थीं। क्लीवलैंड के मेयर ने उन्हें शांति फैलाने में मदद करने के लिए एक पुरस्कार से सम्मानित किया। वे पिछले 50 से अधिक वर्षों से बिहार को अपनी कर्मभूमि बनाकर सेवा कार्य कर रही हैं।
  
वीरायतन के प्रमुख कार्य और योगदान ;

1. शिक्षा के क्षेत्र में :
वीरायतन के अंतर्गत अनेक स्कूल, कॉलेज और व्यावसायिक संस्थान स्थापित किए गए। गरीब और ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जाती है।

2. स्वास्थ्य सेवा में :

मुफ्त या सस्ती चिकित्सा सेवाएँ, विशेषकर नेत्र चिकित्सा में बड़ा योगदान। हजारों लोगों की आँखों की रोशनी लौटाने का कार्य किया गया।
3. आपदा राहत कार्य :
लातूर भूकंप, गुजरात भूकंप और अन्य आपदाओं में वीरायतन ने सक्रिय राहत कार्य किए। राहत के साथ-साथ पुनर्वास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. महिला सशक्तिकरण
महिलाओं के लिए शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता कार्यक्रम चलाए गए। वीरायतन का कार्य भारत तक सीमित नहीं रहा। अमेरिका, यूके और अफ्रीका में भी इसके केंद्र स्थापित हुए, जहाँ शिक्षा और सेवा का कार्य जारी है।
 आचार्य चंदना जी का व्यक्तित्व और विचार :
आचार्य चंदना जी का मानना है कि धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि मानव सेवा ही सच्चा धर्म है। वे करुणा, अहिंसा और सेवा के सिद्धांतों पर आधारित जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।
आचार्य चंदना जी का जीवन त्याग, सेवा और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने जैन साध्वी होते हुए भी समाज के सबसे ज़रूरतमंद वर्ग तक पहुँचकर यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिकता और सामाजिक सेवा साथ-साथ चल सकती हैं।

  सादगी और अनुशासन :

उनका जीवन अत्यंत सादा है न कोई व्यक्तिगत संपत्ति, न सुविधा की चाह। कठिन तप और अनुशासन के बावजूद वे हमेशा शांत और प्रसन्न रहती हैं।
 
 अहिंसा और करुणा : 

जैन धर्म के मूल सिद्धांत-अहिंसा और करुणा है। उनके जीवन में स्पष्ट दिखाई देते हैं। वे हर जीव के प्रति दया और सम्मान रखने की प्रेरणा देती रही।
आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण :

उनका मानना है कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है। वे शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाती हैं।

 विनम्रता और अहंकार का त्याग :

आचार्य चंदना जी हमेशा कहती थी कि हम केवल एक माध्यम हैं, करने वाला तो ईश्वर है। सफलता मिलने पर भी विनम्र रहना जरूरी है। आचार्य चंदना जी का जीवन यह सिखाता है कि आध्यात्मिकता और सेवा अलग नहीं हैं। छोटे-छोटे कार्य भी बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। विनम्रता और करुणा ही सच्ची महानता है। उनके जीवन के ये प्रसंग केवल प्रेरणा नहीं देते, बल्कि यह भी बताते हैं कि एक व्यक्ति दृढ़ संकल्प से पूरे समाज को सकारात्मक दिशा दे सकता है।

आचार्य श्री चंदना जी महाराज का निधन :
 
वीरायतन की संस्थापिका और जैन धर्म की पहली महिला आचार्य, आचार्य चंदनाजी महाराज उर्फ़ ताई महाराज का निधन 22 अप्रैल 2026 दिन बुधवार की सुबह 10:50 बजे पुणे में हो गया। 90 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली और देवलोक गमन कर गईं। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार 24 अप्रैल 2026 को संध्या 5 बजे पुणे के बैकुंठ श्मशान भूमि, नवी पेट में किया गया। 
परिवार में दो भाई और चार बहनों में चंदना जी सबसे बड़ी थीं। उनके पिता मानिकचंद जी एवं माता प्रेमबाई कटारिया ने वर्ष 1952 में राजस्थान के गुलाबपुरा में साध्वी रत्न श्री सुमति कुंवर जी के सानिध्य में उनकी दीक्षा कराई। दीक्षा के समय इनकी उम्र करीब 15 साल थी। दीक्षा के बाद इन्होंने कठिन तप और साधना का मार्ग अपनाया। वर्ष 1971 में महाराष्ट्र से पैदल यात्रा करते हुए वह राजगीर पहुंचीं और यहीं से उन्होंने समाजसेवा के अपने मिशन की शुरुआत की। राजगीर को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया और यहीं "वीरायतन" संस्था की स्थापना की। ‘जहां जिनालय, वहां विद्यालय और चिकित्सालय’ को बनाया जीवन मंत्र : आचार्य चंदना जी का मूल सिद्धांत जहां "जिनालय, वहां विद्यालय और चिकित्सालय" था। इसी सूत्र को आधार बनाकर उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी कार्य किया। आज वीरायतन के देश-विदेश में 25 से अधिक केंद्र संचालित हो रहे हैं, जो शिक्षा, चिकित्सा और सेवा के माध्यम से लाखों लोगों को लाभ पहुंचा रहे हैं। करीब 25 हजार विद्यार्थी विभिन्न शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जबकि लाखों मरीजों को चिकित्सा सेवाएं मिल रही हैं। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना भी की और धार्मिक प्रवचनों को जनसुलभ बनाने के लिए 1959 में माइक का उपयोग शुरू कर एक क्रांतिकारी कदम उठाया। 
आचार्य चंदना जी का मूल संदेश है,  सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की स्थिति में है। उनके विचारों का सार “सेवा ही सच्चा धर्म है।” उनका मानना है कि पूजा, व्रत या अनुष्ठान तभी सार्थक हैं जब वे मानव सेवा से जुड़े हों। वीरायतन और उनका मूल सिद्धांत भी यही है।

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