बुद्ध जयंती: गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं का उत्सव...
● महात्मा बुद्ध के उपदेश आज भी प्रासंगिक
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
महात्मा बुद्ध की जयंती बौद्ध धर्म का पवित्र पर्व है, जो महात्मा बुद्ध के जन्म, ज्ञान और महापरिनिर्वाण की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन लोग ध्यान, प्रार्थना और अहिंसा का पालन करते हुए शांति व सद्भाव का संदेश फैलाते हैं। यह हमें बुद्ध के उपदेशों पर चलने और शांति व ज्ञान के मार्ग को अपनाने का संदेश देता है। बौद्ध धर्म में वैशाख महीने की पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। बुद्ध पूर्णिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि महात्मा बुद्ध के जीवन की तीन सबसे महत्वपूर्ण घटनाएं इसी दिन हुई थीं, उनका जन्म, उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और उनका महापरिनिर्वाण। यही कारण है कि इसे आध्यात्मिक दृष्टि से साल की सबसे शक्तिशाली पूर्णिमाओं में से एक माना जाता है। बुद्ध जयंती के मूल में शांति का संदेश है। सचेतनता और करुणा का अभ्यास करके, व्यक्ति आंतरिक शांति विकसित कर सकते हैं, जो स्वाभाविक रूप से उनके आपसी व्यवहार में भी फैलती है। समुदायों में सद्भाव को बढ़ावा देने से एक अधिक शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण होता है।
महात्मा बुद्ध की शिक्षा अहिंसा, शांति, करुणा और मध्यमार्ग आज के दौर में मानसिक तनाव, हिंसा, उपभोक्तावाद और पर्यावरणीय संकट से जूझ रही मानवता के लिए अत्यंत आवश्यक है। उनके सिद्धांत जैसे अष्टांगिक मार्ग और आत्म दीपों भव (स्वयं के प्रकाश बनों), व्यक्तिगत मानसिक शांति और सामाजिक सामंजस्य स्थापित करने में सधे मार्ग हैं, आज के अराजकता और निरंतर परिवर्तन से चिन्हित युग में, महात्मा बुद्ध की कालजयी शिक्षा आधुनिक जीवन के लिए मार्ग दर्शन सिद्धांतों के रूप में गुंजती है। उनकी शिक्षाओं में गहन ज्ञान हमारे समकालीन है। बुद्ध का मत रहा है कि मनुष्य में संकल्प शक्ति का होना बहुत जरूरी है, इससे पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि से लेकर बड़े-बड़े चट्टान को भी नियंत्रित किया जा सकता है। आज के समय की भागदौड़ भरी जिंदगी में ध्यान और विपश्यना के माध्यम से मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक स्थिरता और तनाव को कम करने के लिए बुद्ध के उपदेश प्रासंगिक है, दुनिया में हिंसा और संघर्षों के बीच बुद्ध का करुणा, दया और अहिंसा का संदेश शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए अति आवश्यक है, बुद्ध ने अत्यधिक विरासत और अत्यधिक त्याग के बीच मध्य मार्ग अपनाने पर जोर दिया, जो संतुलन और संतोष जनक जीवन जीने की कला सिखाता है। बुद्ध ने आत्मनिर्भर बनने की बात कही जो व्यक्ति को अंधविश्वास से दूर रखकर तर्क और अनुभव पर आधारित ज्ञान विकसित करने के लिए प्रेरित करता है। महात्मा बुद्ध ने जाति-पाती और ब्रह्म कर्मकांडों के विपरीत मानवीय गुणों और समानता पर जोर दिया, जो आज के सामाजिक असमानता के दौर में महत्वपूर्ण है, या यूं कह सकते हैं कि बुद्ध के शिक्षाएं हमें सिखाती है की सच्ची खुशी और शांति भारी साधनों में नहीं बल्कि मन के भीतर और सही जीवन जीने के तरीके में निहित है। बुद्ध पूर्णिमा महात्मा बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महानिर्वाण की स्मृति में मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 1 मई, दिन शुक्रवार को मनाया जा रहा है। जो महात्मा बुद्ध की 2588 वां जयंती है। बुद्ध की सिख का मूल सार करुणा, अहिंसा मन पर नियंत्रण और वर्तमान में जीना, उन्होंने बताया कि दुखों का कारण हमारी इच्छाएं और इन्हें अष्टांगिक मार्ग सहित दृष्टि संकल्प वाणी प्रेम से पर को जीता जा सकता है बुद्ध बुद्ध से तात्पर्य उसे प्रबुद्ध व्यक्ति से है जिसे सर्वोच्च ज्ञान करना और निर्माण प्राप्त कर लिया बुद्ध आध्यात्मिक गुरु होते जो नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और अपने उपदेशों के माध्यम से दूसरों को मुक्ति की और मार्गदर्शन करते हैं। भगवान बुद्ध किसी धर्यशास्त्री या प्रणालि विचारक नहीं थी बल्कि एक मुक्ति दाता आध्यात्मिक रूप में सिद्ध साधक और निर्वाण के मार्ग के शिक्षक थे, जो घृणा, भ्रम और भय से मुक्ति का मार्ग है, उनका लक्ष्य अधिक प्राणियों को संमभव, सद्भावना और प्रेम पूर्ण दया के साथ जीवन जीने में सहायता करता था, जन्म, ज्ञान प्राप्ति प्रथम उपदेश और मृत्यु इन चार घटनाओं का समूह सब से प्रमुख था, जिसमें जीवन के अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाएं शामिल थी, गौतम बुद्ध द्वारा मांस स्वीकार करने का मुख्य कारण भिक्षाटन के परंपरा पर चुनाव जो मिले वही खाने का सिद्धांत था, वे भोजन के प्रति स्वाद को छोड़ने और गृहस्थी की उदारता को स्वीकार करने पर उन्होंने मांस तब तक खाने की अनुमति दी, जब तक वह भिक्षु के लिए विशेष रूप में न मारा गया हो, बुद्ध कहते थे की भिक्षु को भोजन चुनना नहीं चाहिए, भिक्षा पात्र में जो कुछ आ गया उसे कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करना चाहिए, चाहें वह शाकाहारी हो या मांसाहारी। उन्होंने कहा कि ब्रह्मांड में कुछ भी नष्ट नहीं होता सब कुछ परिवर्तनशील है और उन्होंने तीन सार्वभौमिक सत्यों का उपदेश दिया, बुद्ध के तीन सत्य हैं, निराकारता का सत्य, क्षणभंगुर अस्तित्व का सत्य, और मध्यम मार्ग का सत्य है। गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) बुद्ध धर्म के संस्थापक थे, जिनका जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल के लुंबिनी के राजा शुद्धोधन और रानी महामाया के घर हुआ था, सुखद जीवन को त्याग कर यश, राजपाट, को छोड़कर 29 वर्ष की आयु में ज्ञान की खोज में घर छोड़ दिया और 6 वर्षों की कठोर तपस्या के बाद बिहार के बोध गया में पीपल पेड़ के नीचे बुद्धत्व (ज्ञान) प्राप्त किया, कहा जाता है कि बुद्ध ने गया में ज्ञान प्राप्त करने के पहले चतरा जिले के इटखोरी में भी गहन तपस्या की थी, जब उनकी मौसी उन्हें खोजते हुए वहाँ पहुंची तब गौतम वापस लौटने को तैयार नहीं हुए थे, तब मौसी ने यह कहते हुए वहां से लौट गई और कहा कि इतखोया मेरे लाल को जो आज इटखोरी के नाम से जाना जाता है, यह स्थल तीन धर्म का संगम स्थल, जैन धर्म तीर्थंकर शीतल नाथ जी की जन्मभूमि है, इस स्थान को आज लोग सनातन धर्म, जैन धर्म और बुद्ध धर्म की संगमा स्थल मानकर चलते हैं, बुद्ध ने अहिंसा करुणा और मध्यमा मार्ग का संदेश (शिक्षा) दी, इनका निर्माण 80 वर्ष की आयु में 483 ईसा पूर्व कुशीनगर में हुआ था, बुद्ध ने कहा था कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए इंसान दो ही गलतियां कर सकता है, पहली गलती रास्ता पूरा तय नहीं करना और दूसरी गलती है चलने की शुरूआत ही नहीं करना, उन्होंने कहा था जीवन वह नहीं है जो हमें मिला है, जीवन वह है जो हम बनाते हैं, वह यही बताते थे कि दूसरों को समझना बेशक बुद्धिमानी हो सकती है लेकिन खुद को समझना ही जिंदगी का असली ज्ञान है।
बुद्ध भगवान बुद्ध धर्म के संस्थापक और भगवान महावीर जैन धर्म के 24 वे तीर्थंकर थे, दोनों ही छठी शताब्दी ईसा पूर्व के महान समाज सुधारक और आध्यात्मिक गुरु थे, यद्यपि दोनों ने अहिंसा और सदाचार पर जोर दिया, लेकिन उनकी विचारधाराओं में मूलभूत अंतर है, महावीर आत्मा में अस्तित्व में पूर्ण विकास विश्वास करते हैं, वहीं बुद्ध धर्म बना था बात अनाथ अनात्मवाद में विश्वास करते हैं महावीर मोक्ष के लिए कठोर तपस्या, शरीर को कष्ट देने और निग्रन्य (बंधन रहित) जीवन की आवश्यकता मानते हैं, जबकि बुद्ध कठोर तपस्या के विरोधी थी, उन्होंने मध्य मार्ग पर ध्यान को मोक्ष का साधन बताया था, महावीर अहिंसा के प्रति अत्यंत कठोर हैं वही बुद्ध अहिंसा के समर्थक लेकिन महावीर की तरह तपस्या में इतनी कटरता नहीं है, बुद्ध मध्यम मार्ग के अनुरूप अहिंसा को अपनाया महावीर ने कर्म को एक भौतिक पदार्थ माना, वही बुद्ध ने कर्म को मानसिक चेतना और इच्छा पूर्णता से जोड़ते है, महावीर वेदों की प्रामाणिकता और ईश्वर के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारते हैं, वहीं बुद्ध वेदों और ईश्वर के विषय में मौन है, उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को न तो नकारा है और नहीं स्वीकार किया है, महावीर जन्म के आधार पर वर्ण व्यवस्था के विरोधी थे, वही बुद्ध वर्ण व्यवस्था के प्रबल विरोधी तो थे, संघ सेवा के सभी वर्षों का सम्मान करते थे, हिंदू धर्म ईश्वर (ब्रह्म) और आत्मा के अस्तित्व को मानता है, जबकि बौद्ध धर्म इन्हें स्वीकार करता है, नश्वर शरीर से परे अनात्म और निर्वाण पर ध्यान केंद्रित करता है, हिंदू धर्म का अंतिम लक्ष्य मोक्ष (ईश्वर में विलीन होना) है, बौद्ध धर्म का लक्ष्य निर्वाण (दुख और पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्ति) प्राप्त करना है, बुद्ध ने अपना पहला संदेश सारनाथ में दिया विश्व के विभिन्न देशों में 65% से ज्यादा बौद्ध धर्म का अनुसरण करने वाले लोग रहते हैं। जिनमें चीन में सर्वाधिक बुद्ध को मानने वाले निवास करते हैं, इसके अतिरिक्त जिन देशों में बौद्ध धर्म को बहुत संख्या या अधिकाधिक धर्म का दर्जा प्राप्त है उनमें थाईलैंड, कंबोडिया, भूटान, श्रीलंका लाओस और मंगोलिया प्रमुख हैं, हालांकि बुद्ध संस्कृति का प्रभाव चीन, जापान, वियतनाम, कोरिया, और ताइवान सहित 20 से अधिक देश में काफी ज्यादा है, 99% बौद्ध आबादी एशिया प्रशांत क्षेत्र में निवास करती है।
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