रवीन्द्रनाथ टैगोर की 165 वीं जयंती पर विशेष .....
●रवीन्द्रनाथ टैगोर स्त्री स्वतंत्रता के समर्थक थे
●रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय एकता के अद्भुत कवि थे
●साहित्य, संगीत व कला के गुरु थे रविंद्र नाथ टैगोर
●भारतीय साहित्याकाश में ध्रुवतारे की तरह चमके थे रविंद्रनाथ टैगोर
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
आज 7 मई को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कवि, उपन्यासकार, नाटककार, चित्रकार, और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती है। बंगला और अंग्रेजी साहित्य के माध्यम से भारत को विश्व रंगमंच पर अमिट स्थान दिलाने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 को कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री देवेन्द्रनाथ तथा माता का नाम शारदादेवी था। बचपन से ही काव्य में रुचि रखने वाले इस प्रतिभाशाली बालक को देखकर कौन कह सकता था कि एक दिन विश्वविख्यात नोबेल पुरस्कार जीतकर यह कवि भारत का नाम दुनिया में उज्जवल करेगा।वे ऐसे मानवतावादी विचारक थे, जिन्होंने साहित्य, संगीत, कला और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अपनी अनूठी प्रतिभा का परिचय दिया।
रवीन्द्रनाथ के परिवार में प्रायः सभी लोग विद्वान थे। इसका प्रभाव उन पर भी पड़ा। उन्होंने लेखन की प्रायः सभी विधाओं में साहित्य की रचना की। एक ओर वे कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि में सिद्धहस्त थे, तो दूसरी ओर वे उच्च कोटि के चित्रकार, संगीतकार, दार्शनिक व शिक्षाशास्त्री भी थे। उन्होंने अपनी सभी कविताओं को शास्त्रीय संगीत में निबद्ध भी किया है। सोनार तरी, पुरवी, दि साइकिल ऑफ स्प्रिंग, दि ईवनिंग सॉंग्स और मॉर्निंग सॉंग्स उनकी प्रसिद्ध रचनायें हैं। उनके लेखन का विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ है तथा आज भी लगातार उन पर काम हो रहा है। उन्होंने गीतांजली का लेखन किया था। 13 नवंबर, 1913 को उन्हें उनकी रचना ‘गीतांजलि’ के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत और पूरे एशिया में साहित्य में नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। सही शब्दों में, वे एक ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं, जिन्होंने अपने प्रकाश से समस्त विश्व को आलोकित किया। उन्होंने ही अपनी कविता के माध्यम से बताया कि तुम्हारी कोई नहीं सुनता तो अकेले चलते चला। साथ उन्होंने बताया कि भारत कैसे विभिन्न जातियों का देश बन गया। कविता में बताया कि पहले आर्य आए, तीनी आए, मुगल आए और फिर अंग्रेज भी आए। भारत में विभिन्न जातियों के लोग आकर बस गए।
रवींद्र नाथ अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे। बचपन में उन्हें प्यार से रबी बुलाया जाता था। आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी, सोलह साल की उम्र में उन्होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था। दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्र नाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था। रवीन्द्रनाथ टैगोर के काव्य पक्ष के साथ ही उनका कहानीकार पक्ष भी बहुत प्रभावित करता है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर मानवीय भावनाओं के चितेरे कवि ही नहीं वरन् एक संवेदनशील कथाकार भी थे। टैगोर की कहानियों में तत्कालीन समाज, मानव प्रकृति व प्रवृत्ति, एवं मानव मनोविज्ञान अपने समग्र रूप में उभर कर आया है। उनके दादाजी द्वारकानाथ ठाकुर राजा राम मोहन राय के सामाजिक प्रबोधन के कामों में शामिल थे। और उनके पिता महर्षि देवेद्रनाथ ने बंगाल मे ब्रह्मो समाज की स्थापना करने वाले लोगों मे से एक है। रवींद्रनाथ के भाई भी विभिन्न प्रकार की कलाओं में माहिर थे। जतिंद्रनाथ संगीत मे, सत्येंद्रनाथ भारत के पहले भारतीय आय सी एस अफसर थे। रवींद्रनाथ का क्रम अपने भाई-बहनों में चौदहवाँ नंबर था। रवींद्रनाथ की पहचान संपूर्ण विश्व में साहित्यिक के रूप मे ज्यादा है। उनके साहित्य के क्षेत्र के चार चरण माने जाते हैं। उसमें 1878 से 1890 यह पहला चरण जोकि अपरिपक्वता का था। इस चरण के दौरान उन्होंने कविता, नाटक, पंत्रसंग्रह मिला कर पच्चीस किताबें प्रकाशित की है। रवींद्रनाथ ने मैथिली, बंगाली, संस्कृत, और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया था। मैथिली में विद्यापति कवि के प्रभाव के कारण वैष्णव कवि की शैली में मैथिली में भानुसिंह ठाकुर पदावली यह गीत संग्रह भानुसिंह छद्म नाम लेकर लिखा है। शेक्सपीयर के मॅक्बेथ नाम के नाटक का बंगला अनुवाद किया है। इन सभी विधाओं में साहित्यिक परिपूर्णता का अभाव था। लेकिन भविष्य के प्रगति की झलक मिलती है। वह उस समय के प्रतिष्ठित कवि और साहित्यिक मायकेल मधुसूदन दत्त और बंकिमचन्द्र के प्रभाव से मुक्त होने की कोशिश कर रहे थे।
1890 से 1913 यह रवींद्रनाथ के साहित्य का दुसरा चरण जिसमें वह साहित्य के क्षेत्र के शिखर पर पहुँच गए थे। और इसी कालखंड को रवींद्र युग के रूप में जाना जाता है। इन चौबीस साल में उनासी किताबें प्रकाशित की है। जिसमें गीतांजलि यह कविता संग्रह, चोखेर बाली, नौकाडुबी, गोरा जैसे उपन्यास और प्राचीन साहित्य, आधुनिक साहित्य, लोक साहित्य यह समीक्षा ग्रंथ, शारदोत्सव, प्रायश्चित, राजा, अचलायतन इन नाटकों के अलावा जीवन स्मृती यह संस्मरण ग्रंथ के अलावा इसी चरण में उन्होंने कथा लेखन की शुरुआत की है। इन कथाओं में अपने जमींदारी के अध्यात्मिक भावो का दर्शन मिलता है। और इस भाव में लिखी हुई कविताओं ने यूरोप के रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था।
अपने जीवन में उन्होंने एक हजार कविताएं, आठ उपन्यास, आठ कहानी संग्रह और विभिन्न विषयों पर अनेक लेख लिखे। इतना ही नहीं रवींद्रनाथ टैगोर संगीतप्रेमी थे और उन्होंने अपने जीवन में 2000 से अधिक गीतों की रचना की। उनके लिखे दो गीत आज भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बांग्ला’ उनकी ही रचनाएँ हैं। गांधी जी उन्हें सम्मानपूर्वक ‘गुरुदेव’ कहकर पुकारते थे। भारतीय साहित्य को विश्व पटल पर सम्मान दिलाने वाले गुरुदेव के विचार व उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। जरूरत इस बात की है कि हम गुरुदेव के विचारों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ें।
गुरुदेव भारतीय साहित्य के बड़े रचनाकार थें। राष्ट्रीय आंदोलन में वह गांधी के साथ रहे। उन्होंने शांति निकेतन की स्थापना की। कला व संगीत के बड़े कलाकार शांति निकेतन से निकले। संगीत के क्षेत्र में गुरुदेव का योगदान अविष्मरणीय है। रवि बाबू ने जिस भारत की परिकल्पना की थी। उसमें विचलन आ रहा है। आज के दौर में रविन्द्र नाथ टैगोर व उनके विचार प्रासंगिक हैं। रविन्द्र नाथ टैगोर, शरद चंद व प्रेमचंद भारतीय साहित्य जगत के मूर्धन्य रचनाकार हैं। तीनों का नाम बड़े सम्मान व आदर के साथ लिया जाता है।
रविंद्रनाथ टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से ऊंचे स्थान पर रखते थे। गुरुदेव ने कहा था, "जब तक मैं जिंदा हूं मानवता के ऊपर देशभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।" टैगोर गांधी जी का बहुत सम्मान करते थे। लेकिन वे उनसे राष्ट्रीयता, देशभक्ति, सांस्कृतिक विचारों की अदला बदली, तर्कशक्ति जैसे विषयों पर अलग राय रखते थे। हर विषय में टैगोर का दृष्टिकोण परंपरावादी कम और तर्कसंगत ज़्यादा हुआ करता था, जिसका संबंध विश्व कल्याण से होता था। टैगोर ने ही गांधीजी को महात्मा की उपाधि दी थी। जीवन भर साहित्य की सेवा और साधना करते हुए 7 अगस्त 1941 को कोलकाता में ही रवीन्द्रनाथ टैगोर का निधन हो गया।
आज के दौर में इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि महान साहित्यकार टैगोर का जन्मदिन भी हम भूलते जा रहे हैं। जब गुरुदेव का जिक्र साहित्य गोष्ठियों तक में नहीं होता। टैगोर की रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं। उनकी अधिकांश रचनाएं बंगला में है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में टैगोर की रचनाओं का प्रचार प्रसार करने की जरूरत है। टैगोर की रचनाओं का हिन्दी अनुवाद होना चाहिए। तभी आज के युवा भारतीय साहित्य के सुनहरे अतीत से वाकिफ हो सकेंगे।
रविन्द्र बाबू ने लिखा कि भारत की समस्या राजनैतिक नहीं, सामाजिक है। यहां राष्ट्रवाद नहीं के बराबर है। हकीकत तो ये है कि यहां पर पश्चिमी देशों जैसा राष्ट्रवाद पनप ही नहीं सकता, क्योंकि सामाजिक काम में अपनी रूढ़िवादिता और सड़ी गली मान्यताओं का हवाला देने वाले लोग जब राष्ट्रवाद की बात करेंगे तो दुनिया में कौन उनपर यकीन करेगा? भारत को राष्ट्र की संकरी मान्यता छोड़कर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
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