शेरशाह सूरी की 481वीं पुण्यतिथि पर विशेष .....।।
शेरशाह सूरी की 481वीं पुण्यतिथि पर विशेष ,....
शेरशाह सूरी एक शानदार रणनीतिकार, उन्होंने खुद को सक्षम सेनापति के साथ ही एक प्रतिभाशाली प्रशासक भी साबित किया। ये अपने पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने नयी नगरीय और सैन्य प्रशासन की स्थापना की।
शेरशाह सूरी का जन्म, परिवार :
पंजाब के होशियारपुर शहर में बजवाड़ा नामक स्थान पर 1486 को शेरशाह सूरी का जन्म हुआ था। उनका असली नाम फरीद खां था और उनके दादा इब्राहिम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे। बचपन में शेरशाह को उनकी सौतेली मां बहुत सताती थी, जिस कारण उन्होंने घर छोड़कर जौनपुर से पढ़ाई की थी।
शेरशाह का ताल्लुक अफगानों की सूर जाति से था। उसके दादा इब्राहिम सूर 1542 में भारत आए थे जिनके बेटे और शेर शाह के पिता हसन सूर ने बिहार के सासाराम में अपने कड़ी मेहनत से एक छोटी सी जागीरदारी हासिल कर ली थी। वहीं फरीद खान उर्फ़ शेरशाह सूरी का जन्म हुआ था। शेरशाह का असली नाम फरीद खान था इसके पिता हसन खान की चार बीवियां थी पहली बीवी से ही फरीद खान उर्फ शेरशाह सूरी का जन्म हुआ था। शेरशाह सूरी सासाराम से बिहार के गवर्नर बहार खान लोहानी उर्फ़ मोहम्मद शाह लोहानी उर्फ़ बहादुर खान लोहानी के यहाँ 1522 में बिहारशरीफ में बहार खान लोहानी के पुत्र को पढ़ाने के लिए आए थे। बहार खान लोहानी का भग्नावशेष महल आज भी बिहारशरीफ में मौजूद है।
फरीद खान से शेर खान नाम भी इसी धरती ने दिया। पूरे विश्व को शिक्षा देने वाली नालंदा की धरती ने उन्हें सिर्फ पनाह ही नहीं दी, बल्कि प्रशासनिक गुर भी सिखाये। इसकी बदौलत ही भारतवर्ष के गिने-चुने प्रसिद्ध शासकों में उनका नाम शुमार किया जाता है। उस वक्त बिहार (वर्तमान बिहारशरीफ) राजाओं की राजधानी हुआ करता था। जाना की मस्जिद के दर्शन करने विश्वभर के लोग आज भी आते हैं। बाहर से आने वाले जायरीन भी मामूली शख्स फरीद को शेरशाह बनाने वाली धरती की चर्चा करना नहीं भूलते हैं।
बाबर की सेना में सिपाही :
साल 1518 में शेरशाह सूरी, बाबर के साथ चंदेरी के अभियान में गया था। बाबर की सेना में रहने के दौरान शेरशाह ने हिंदुस्तान की गद्दी पर बैठने का सपना संजो लिया था। बाद में बिहार के एक छोटे सरगना जलाल खां के दरबार में शेरशाह को उपनेता का काम मिल गया। वहीं बाबर के निधन के बाद हुमायूं बंगाल को जीतना चाहता था। जिसके बीच में शेरशाह सूरी का क्षेत्र पड़ता था। ऐसे में हुमायूं ने शेरशाह से लड़ने का मन बना लिया और तब तक बिहार के अलावा बंगाल पर भी सूरी का नियंत्रण हो चुका था।
साल 1537 में हुमायूं ने बंगाल जीतने के लिए सूरी पर हमला कर दिया। दोनों ओर की सेनाएं चौसा में एक दूसरे के सामने थीं। लड़ाई शुरू होने से पहले शेरशाह ने हुमायूं के पास एक दूत भेजा और उस दूत ने दोनों के बीत समझौता करवा दिया। इस समझौते में यह सुनिश्चित हुआ कि मुगल शासन के झंडे के नीचे बिहार और बंगाल पर शेरशाह सूरी का शासन रहेगा।
शेरशाह ने हुमायूं को हराया :
वहीं 17 मई 1540 को एक बार फिर हुमायूं और शेरशाह की सेनाएं आमने-सामने आ गईं। हुमायूं की सेना में 40 हजार से ज्यादा सैनिक थे और शेरशाह की सेना में 15 हजार सिपाही थे। एक महीने तक दोनों सेनाएं बिना लड़े एक-दूसरे के आमने-सामने थीं। शेरशाह की सेना पर इसका असर नहीं हुआ, लेकिन हुमायूं की सेना का राशन-पानी खत्म होने लगा।
ऐसे में सैनिकों ने बिना लड़े हुमायूं का साथ छोड़ना शुरूकर दिया और देखते-देखते शेरशाह सूरी ने बिना युद्ध के जीत हासिल कर ली। इसके बाद शेरशाह ने हुमायूं को लाहौर खदेड़कर आगरा की सत्ता पर कब्जा कर लिया। आगरा से शेरशाह सूरी ने 5 सालों तक हिंदुस्तान पर शासन किया था।
शेरशाह ने प्राचीन 'उत्तरापथ' का पुनरुद्धार और विस्तार किया :
16वीं शताब्दी में शेरशाह सूरी ने मौर्य काल के प्राचीन 'उत्तरापथ' का पुनरुद्धार और विस्तार करवाकर इसे एक नया स्वरूप दिया था। जो जीटी रोड़ के नाम से जाना गया उसने अपने शासनकाल (1540-1545) में शेरशाह सूरी ने इसे 'सड़क-ए-आजम' या 'बादशाही सड़क' का नाम दिया था। यह मार्ग आधुनिक बांग्लादेश के चटगांव (सोनारगांव) से शुरू होकर दिल्ली और लाहौर होते हुए अफगानिस्तान के काबुल तक जाता था। इस मार्ग पर यात्रियों और व्यापारियों की सुविधा के लिए उसने लगभग 1,700 सरायें बनवाईं और हर दो मील पर 'कोस मीनार' (दूरी मापने के पत्थर) लगवाए थे। 1839 में, ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड ऑकलैंड ने इसका नाम बदलकर 'ग्रैंड ट्रंक रोड' (GT Road) कर दिया। प्राचीन काल में चंद्रगुप्त मौर्य के समय इस मार्ग को 'उत्तरापथ' कहा जाता था।
शेरशाह और आधुनिक ग्रैंड ट्रंक रोड :
आधुनिक काल में आज की ग्रैंड ट्रंक रोड बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान से गुज़रते हुए, इन्हीं ऐतिहासिक मार्गों के कुछ हिस्सों का अनुसरण करती है। कई देशों में इस सड़क को उन्नत करके राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेस-वे में बदल दिया गया है। इसका निर्माण क्रमिक रूप से हुआ—प्राचीन मार्गों को मौर्यों के अधीन औपचारिक रूप दिया गया, शेर शाह सूरी द्वारा उनका बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण और व्यवस्थितीकरण किया गया, मुगलों द्वारा उनका रखरखाव किया गया, तथा अंग्रेजों और औपनिवेशिक-पश्चात राज्यों द्वारा उनका आधुनिकीकरण किया गया।
शेरशाह का मुद्रा प्रणाली:
शेरशाह सूरी ने चांदी का रुपया (₹) और तांबे का दाम चलाया, जो मुगल काल और ब्रिटिश काल तक प्रचलन में रहा।
शेरशाह का राजस्व प्रणाली:
शेरशाह सूरी ने भूमि की पैमाइश करवाकर उपज का एक निश्चित हिस्सा कर के रूप में लेने की वैज्ञानिक प्रणाली लागू की। इसमें उनके राजस्व मंत्री टोडरमल का बड़ा योगदान था। न्याय व्यवस्था: वे एक कठोर और निष्पक्ष न्यायप्रिय शासक थे। उनके शासन में अपराध नगण्य थे।
जनता का ध्यान रखने वाले बादशाह :
शेख़ रिज़ोउल्लाह मुश्तक़ी अपनी किताब 'वकियत -ए- मुश्तक़ी' में लिखते हैं, "शेरशाह अपने लोगों के लिए पिता के समान थे। असामाजिक तत्वों के प्रति वो काफ़ी सख़्त थे लेकिन दबे-कुचले लोगों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के प्रति उनके मन में बहुत दया और प्यार था। उन्होंने हर दिन भूखे लोगों के खाने के लिए 500 तोले सोने को बेचने से मिलने वाली रकम तय कर दी थी।" उन्होंने ये नियम बना दिया था कि वो जहाँ कहीं भी रुके हों, वहाँ के हर व्यक्ति को खाना उपलब्ध कराया जाएगा। सभी को आदेश था कि शाही बावर्चीख़ाने में आने वाले हर शख्स को खाना खिला कर भेजा जाए। वहाँ हज़ारों लोगों को रोज़ खाना खिलाया जाता था।"
रिज़ो उल्लाह मुश्तकी आगे लिखते हैं, "शेरशाह ने कभी भी अत्याचार करने वाले का साथ नहीं दिया, चाहे वो उनके नज़दीकी रिश्तेदार ही क्यों न हों। दो-तिहाई रात गुज़र जाने के बाद उनके नौकर उन्हें जगा देते थे। उसके बाद वो चार घंटे तक यानि फ़ज्र की नमाज़ तक देश के हालात के बारे में रिपोर्ट सुना करते थे। वो बिना वजह ख़ून बहाए जाने और क्रूरता के सख़्त ख़िलाफ़ थे।"
शेरशाह का प्रशासन बहुत चुस्त था। जिस किसी भी इलाके में अपराध होते थे अधिकारियों को प्रभावित लोगों को हरजाना देने के लिए कहा जाता था। अब्बास ख़ाँ सरवानी लिखते हैं, "ग्राम प्रमुख यानि 'मुक़द्दम' का काम गाँव के हिसाब-किताब को सँभालने से कहीं अधिक था। अगर गाँव में कोई अपराध होता था तो इसके लिए उसको ज़िम्मेदार ठहराया जाता था। डकैती या यात्रियों की हत्या होने पर उसकी ज़िम्मेदारी होती थी कि वो दोषियों को पकड़े और लूटा गया सामान बरामद करे।"
किसानों का ख़ास ख़याल :
शेरशाह की दयालुता के और भी कई किस्से मशहूर हैं। अब्बास सरवानी लिखते हैं, "शेरशाह की गिनती हमेशा सबसे दयालु विजेताओं में की जाएगी। इस बात के विवरण मिलते हैं कि जब वो हुमायूं की हार के बाद आगरा पहुंचे तो कई मुग़ल रानियों और महिलाएं बाहर आकर उनके सामने सिर झुकाने लगीं तो उनकी आँखों में आँसू आ गए।"
"उन्होंने हमेशा इस बात का भी ख़याल रखा कि उनकी सेना के पैरों तले लोगों के खेत न रौंदे जाएं। अगर किसी वजह से उनकी सेना की वजह से खेतों को नुकसान पहुंचता था तो वो अपने अमीर भेज कर किसान को तुरंत नुकसान का मुआवज़ा दिलवाते थे।"
शेरशाह ने धार्मिक सौहार्द पर ज़ोर दिया :
अपने सैनिकों के साथ भी उनका व्यवहार बहुत अच्छा रहता था। और उनके सैनिक उनके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते थे। मशहूर इतिहासकार एचजी कीन अपनी किताब 'मेमॉएर्स ऑफ़ द रेसेज़ ऑफ़ द नॉर्थ वेस्ट फ़्रन्टियर' में लिखते हैं, "वो पहले मुस्लिम शासक थे जिन्होंने हमेशा अपनी प्रजा का भला चाहा।" "अपने छोटे से करियर में उन्होंने लोगों के बीच धार्मिक सौहार्द स्थापित करने पर बहुत ज़ोर लगाया। शेरशाह के शासन में हिंदुओं को महत्वपूर्ण पदों पर रखा जाता था। उनके सबसे प्रिय जनरल ब्रह्मजीत गौड़ थे जिन्हें उन्होंने चौसा और बिलग्राम की लड़ाई के बाद हुमायूं का पीछा करने भेजा था। उन्होंने पहली बार ये सोचा कि सरकार को हमेशा अपनी प्रजा के बीच लोकप्रिय होना चाहिए। बाद की किसी भी सरकार ने जिसमें अंग्रेज़ भी शामिल हैं, ये समझने की बुद्धिमानी नहीं दिखाई।"
शेरशाह की सरकार उन पर ही केंद्रित थी :
शेरशाह की सरकार मूलरूप से एक व्यक्ति की सरकार थी। अब्बास सरवानी लिखते हैं, "शेरशाह अपने राज्य के सभी अंगों, ख़ासकर वित्तीय मामलों को ख़ुद देखते थे। रोज़ उनका हर मंत्री उन कामों का विवरण उन्हें देता था जो उसने किया है और जो वो करने वाला है। शेरशाह के मंत्री उनके सचिव की तरह काम करते थे। नीतिगत मामलों के सारे तार ख़ुद शेरशाह के हाथों में होते थे।"
"सैनिक मामलों पर भी शेरशाह की पूरी पकड़ थी। उनके सैनिक अपने सम्राट के आदेशों का पालन करते थे न कि अपने कमांडिंग अफ़सर का। अपने हर सैनिक का वेतन वो खुद तय करते थे और हर सैनिक को उसकी क्षमता और गुण के आधार पर वेतन दिया जाता था।"
कलिंजर के किले के घेराव के दौरान आग से जले शेरशाह और मृत्यु :
शेरशाह ने वर्ष 1544 में कलिंजर के किले का घेरा डाला। अधिकतर इतिहासकारों का मानना है कि शेरशाह कछवाड़ा से बिना आगरा वापस लौटे सीधे कलिंजर गए। 'सलातिन-ए-अफ़ग़ान' के लेखक अहमद यादगार लिखते हैं, "शेरशाह के कलिंजर जाने का कारण बीर सिंह बुंदेला था जिसे शेरशाह ने अपने दरबार में तलब किया था लेकिन उसने भाग कर कलिंजर के राजा के यहाँ शरण ली थी और उसे उसने शेरशाह को सौंपने से इंकार कर दिया था।"
कलिंजर का किला समुद्र की सतह से 1230 फ़ीट की ऊँचाई पर बना हुआ था। शेरशाह ने किले को घेर कर सुरंगें और ऊँची मीनारें बनवाना शुरू कर दीं। जब सारी तैयारी पूरी हो गई तो तय हुआ कि 22 मई, 1545 को किले पर हमला बोला जाएगा। हमले में भाग लेने के लिए शेरशाह खुद आगे आ गए।शेरशाह का शासन भले ही सिर्फ़ पाँच वर्षों का रहा हो लेकिन शासन करने की बारीकी और क्षमता, मेहनत, न्यायप्रियता, निजी चरित्र के खरेपन, हिंदुओं ओर मुसलमानों को साथ लेकर चलने की भावना, अनुशासनप्रियता और रणनीति बनाने में वो अकबर से कम नहीं थे।
मरने से पहले शेरशाह ने फ़तह किया था किला :
उसी हालत में उन्हें शिविर के बीचों-बीच ले जाया गया वहाँ उनके दरबार के सभी विशिष्ट लोग मौजूद थे। शेरशाह ने उसी जली हुई हालत में अपने एक जनरल ईसा ख़ाँ को तलब किया और आदेश दिया कि उनके ज़िंदा रहते किले पर कब्ज़ा कर लिया जाए। ईसा ख़ाँ ने ये सुनते ही किले पर चारों ओर से हमला बोल दिया।
अब्बास सरवानी लिखते हैं, "शेरशाह के सैनिक चीटियों और टिड्डियों की तरह किले पर टूट पड़े। जब भी शेरशाह को थोड़ा बहुत होश आता वो चिल्ला कर अपने सैनिकों को किले पर कब्ज़ा करने के लिए प्रोत्साहित करते। अगर कोई उन्हें देखने आता तो वो कहते यहाँ अपना वक़्त बरबाद करने के बजाए लड़ने जाओ। उस समय मई का महीना था और वहाँ बहुत गर्म हवा चल रही थी।"
शेरशाह के सैनिकों ने उनके शरीर पर चंदन का लेप और गुलाब जल का छिड़काव किया लेकिन हर घंटे गर्मी बढ़ती ही गई और शेरशाह को कोई आराम नहीं मिला। "दोपहर की नमाज़ के समय शेरशाह की सेना किले में घुसने में कामयाब हो गई। राजा कीरत सिंह ने अपने कुछ समर्थकों के साथ एक घर में अपने आप को क़ैद कर लिया। उस घर को शेरशाह के सैनिकों ने चारों ओर से घेर लिया।" अब्बास आगे लिखते हैं, "जैसे ही शेरशाह को जीत की ख़बर सुनाई गई, उस तकलीफ़ में भी उनके चेहरे पर ख़ुशी और संतोष के भाव उभर आए। लेकिन कुछ ही क्षणों में उन्होंने अपने आख़िरी शब्द कहे, 'या ख़ुदा, मैं तेरा शुक्रगुज़ार हूँ कि तुमने मेरी इस इच्छा को पूरा किया।' यह कहते ही उनकी आँखें हमेशा के लिए मुंद गईं।"
शेरशाह का मकबरा :
शेरशाह की मौत के पाँचवें दिन उनके दूसरे नंबर के बेटे जलाल ख़ाँ कलिंजर पहुंचे जहाँ उन्हें हिंदुस्तान के बादशाह की गद्दी पर बैठाया गया। शेरशाह को कलिंजर के पास एक जगह लालगढ़ में दफ़ना दिया गया। बाद में उनके पार्थिव शरीर को वहाँ से निकाल कर सासाराम में शेरशाह के मक़बरे में ले जाया गया।
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