पटना का ऐतिहासिक खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी की कहानी ....।।
● खुदा बख्श ने पुस्तक प्रेमी पूर्वज के विराशत को सम्हाला
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
पटना के महान शिक्षाविद् खान बहादुर मौलवी खुदा बख्श ने अपने पुस्तक प्रेमी पिता, मौलवी मोहम्मद बख्श की वसीयत और विरासत को पूरी निष्ठा से संभाला और उसे एक वैश्विक धरोहर में बदल दिया।
खान बहादुर मौलवी खुदा बख्श खान बिहार के एक प्रसिद्ध भारतीय अधिवक्ता, न्यायाधीश, इतिहासकार और प्रख्यात् विद्वान थे। उन्हें पटना में स्थित ऐतिहासिक खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना करने के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपने पिता के सपनों और वसीयत को पूरा करते हुए, खुदा बख्श ने अपने निजी पुस्तकालय और 1,400 विरासत में मिली पांडुलिपियों को मिलाकर 29 अक्टूबर 1891 को पटना में 'ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी' की स्थापना की थी। खुदा बख्श ने अपनी वकालत की भारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा दुर्लभ पुस्तकों और पांडुलिपियों को खरीदने में खर्च किया करते थे। उन्होंने अपनी इस बेशकीमती धरोहर को कभी पटना से बाहर नहीं जाने दिया और इसे आम जनता के लिए समर्पित कर दिया।
मौलवी खुदा बख्श खान का प्रारंभिक जीवन :
खुदा बख्श का जन्म 2 अगस्त 1842 को बिहार के सीवान जिले के उखाई गांव में हुआ था। उनके पूर्वज मुगल बादशाह आलमगीर औरंगजेब की सेवा में थे और राज्य के बहीखाते तथा अभिलेख लिखने का काम करते थे। उनके पिता, मौलवी मोहम्मद बख्श, पटना में एक प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध वकील और बड़े पुस्तक प्रेमी थे। खुदा बख्श ने 1859 में पटना हाई स्कूल से बहुत अच्छे अंकों के साथ मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद उनके पिता ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता भेज दिया था। कोलकाता में खुदा बख्श का स्वास्थ्य खराब रहने लगा और वे वहां खुद को ढाल नहीं सके। अंततः उन्होंने 1868 में कानून (वकालत) की शिक्षा पूरी की। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पटना में वकालत शुरू की और बहुत कम समय में एक बेहद सफल और प्रसिद्ध वकील बन गए।
खुदा बख्श लाइब्रेरी का आम जनता के लिए समर्पित :
पिता की मृत्यु के बाद खुदा बख्श ने अपनी मेहनत और कमाई से इस संग्रह को और बढ़ाया। उन्होंने अपने दुर्लभ पांडुलिपियों के निजी संग्रह को ट्रस्ट के माध्यम से 29 अक्टूबर 1891 को आम जनता के लिए समर्पित कर दिया। जो बहुत बड़ी इमारत नही थी। लेकिन इस लाइब्रेरी के पास जो किताबों का जो संग्रह था, उसकी ख्याति दूर दूर तक थी, और उसी चीज़ ने इसके स्थापना के 12 साल बाद, यानी जनवरी 1903 में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्ज़न को पटना में गंगा किनारे स्थित इस लाइब्रेरी का दौरा करने पर मजबूर कर दिया।
मौलवी खुदा बख्श खान न केवल एक विख्यात विद्वान थे, बल्कि एक समाज सुधारक भी थे। खुदा बख्श ने अपना सारा जीवन, धन-संपत्ति पुस्तकों के संग्रहण और संरक्षण में समर्पित कर दिया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि आज पुस्तकालय में मौजूद 2,000 से अधिक पांडुलिपियों के विशाल संग्रह में उनके प्रयासों की झलक मिलती है। इनमें से कुछ पांडुलिपियां दुर्लभ हैं और शोधकर्ताओं एवं इतिहासकारों द्वारा इनकी बहुत खोज की जाती है। विभिन्न देशों के विद्वान अरबी, फारसी और अन्य भाषाओं की पांडुलिपियों पर शोध करने के लिए पुस्तकालय में आते रहते हैं।
लगभग 200 वर्षों तक भारत के एक विशाल क्षेत्र पर शासन करने के बाद, मुगल साम्राज्य अपनी पकड़ और वैभव खो रहा था। इस समय, उस युग की पुस्तकें और अन्य साहित्यिक दस्तावेज लुप्त होने के कगार पर थे। 1857 की क्रांति के बाद, सुल्तानों, बादशाहों, राजाओं, महाराजाओं और नवाबों की निजी पुस्तकें बिखर गईं। ये अरबी और फारसी भाषा के सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज थे, जिनमें इतिहास का एक बड़ा हिस्सा भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित था। इनमें धर्म, भारतीय इतिहास, राजाओं के प्रामाणिक दस्तावेज और चिकित्सा संबंधी पुस्तकें शामिल थीं, जो संस्कृत, पाली, पश्तो, तुर्की, हिंदी और उर्दू जैसी भाषाओं में लिखी गई थीं। खुदा बख्श खान ने इन बिखरी हुई पुस्तकों को एकत्रित करना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था। बाद में, इस संग्रह को पटना, बिहार स्थित वर्तमान खुदा बख्श प्राच्य पुस्तकालय में संग्रहित किया गया।
इस पुस्तकालय का उद्घाटन तत्कालीन बंगाल के राज्यपाल ने किया था। इसके खुलने के समय पुस्तकालय में लगभग 4000 दुर्लभ पांडुलिपियाँ थीं, लेकिन आज पांडुलिपियों की संख्या 21 हजार से अधिक है और पुस्तकों की संख्या लाखों में है। खुदा बख्श खान जीवन भर दुर्लभ पांडुलिपियां खरीदते रहे। खुदा बख्श ने पांडुलिपियाँ खरीदने के लिए अपने कार्यालय सहायक को 50 रुपये अतिरिक्त दिए थे। हालांकि, बाद में आर्थिक तंगी के दौर में उन्हें स्ट्रोक आ गया और उनका परिवार बिना किसी आमदनी के रह गया। उस समय उन्हें अपनी पांडुलिपियों के लिए कई प्रस्ताव मिले, जिन्हें उन्होंने अपनी गरीबी के बावजूद ठुकरा दिया।
खुदफा बख्श ने पुस्तकालय के लिए वसीयत की :
खुदफा बख्श ने वसीयत की थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, पुस्तकालय से किताबें कभी बाहर नहीं निकाली जानी चाहिए।
यह पुस्तकालय पटना के लोगों के लिए खुदाबख्श खान का एक अनमोल उपहार है।
पटना के अशोक राज पथ पर स्थित खुदा बख्श खान सार्वजनिक पुस्तकालय शहर के प्रमुख स्थलों में से एक है। ज्ञान, साहित्य, फिल्म उद्योग, कलाकार, खेल, शोधकर्ता या राजनीतिक नेता के क्षेत्र से कोई भी व्यक्ति सबसे पहले नालंदा (विश्वविद्यालय) जाता है, उसके बाद खुदा बख्श पुस्तकालय जाता है। पटना विश्वविद्यालय, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय के छात्र और भारत-विदेश के शोधकर्ता इस पुस्तकालय से लाभान्वित होते हैं। पुस्तकालय में दिनभर लोगों की भीड़ रहती है। शोधकर्ताओं के लिए एक अलग वाचनालय भी है। आज सरकार या शिक्षा जगत के लगभग सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी से जुड़े रहे हैं।
खुदा बख्श खान का असली नाम मौलवी खुदा बख्श खान था। वे एक महान समाज सुधारक थे। वे हर वर्ग, विशेषकर महिलाओं की शिक्षा में जागरूकता लाने के लिए अत्यंत गंभीर थे। खुदा बख्श खान का परिवार काफी शिक्षित था और शिक्षा के प्रति उनका गहरा लगाव था। शिक्षा के प्रति इसी रुचि के परिणामस्वरूप, खुदा बख्श खान ने इस पुस्तकालय की स्थापना की। यह खुदा बख्श पुस्तकालय अपने संग्रह के मामले में पूरे उपमहाद्वीप में अद्वितीय है। खुदा बख्श खान के कार्यों का दायरा काफी व्यापक है। उन्होंने न केवल पुस्तकें एकत्र कीं, बल्कि समाज और शिक्षा को बेहतर बनाने का भी प्रयास किया। पुस्तकालय की स्थापना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
निःसंदेह खुदा बख्श खान बिहार के उस महान व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होंने अजीमाबाद के लोगों को एक ऐसी उत्कृष्ट कृति और अनमोल उपहार दिया है, जिसे बनाने में सदियाँ लग जाती हैं। उन्होंने एक पुस्तकालय की स्थापना की, जहाँ अरबी, फारसी और उर्दू के अलावा संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथ भी मौजूद हैं। खुदा बख्श का निधन 3 अगस्त, 1908 को हुआ, और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसी विरासत छोड़ गए जिससे उन्हें लाभ मिल सके।
खुदा बख्श लाइब्रेरी 1934 में नुक़सान और नवनिर्माण :
पिता की मृत्यु के बाद खुदा बख्श ने अपनी मेहनत और कमाई से इस संग्रह को और बढ़ाया। उन्होंने अपने दुर्लभ पांडुलिपियों के निजी संग्रह को ट्रस्ट के माध्यम से आम जनता के लिए समर्पित कर दिया।15 जनवरी 1934 को दोपहर लगभग 2 बजकर 13 मिनट पर बहुत ख़तरनाक भूकंप बिहार में आया था। जिससे काफ़ी जान माल का नुक़सान हुआ था, ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी की इमारत के ऊपरी हिस्से को भी नुक़सान पहुँचा, चूँकि ऊपरी हिस्सों में किताब को नही रखा जाता था, इसलिए किताब को कोई नुक़सान नही पहुँचा। फिर बिहार सरकार ने इमारत का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह से ध्वस्त (ढाह) देने का हुक्म दिया। इस दौरान नीचे की मंज़िल में रखी गई तमाम किताबों को अलमीरा सहीत बग़ल की बिहार यंग मेन इन्स्टिचूट की इमारत में रखा गया। कुछ दिन बाद हुकूमत ने लाइब्रेरी के लिए नई इमारत बनाने का हुक्म जारी किया।
लाइब्रेरी निर्माण के लिए राजस्थानी कारीगर लाये गए थे :
ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी की इमारत की ज़िम्मेदारी उस समय पटना डिविज़न के कार्यकारी अभियंता करीम साहब को दी गई। लाइब्रेरी के लिए इस्लामी वास्तुकला पर बेहतरीन एक अच्छा नक़्शा बना कर बुनियाद रखी गई। लाल और भूरे रंग के पत्थर मंगाएँ गए, और उसे तराशने के लिए राजस्थानी कारीगर आए। एक साल में इमारत बन कर तय्यार हो गई तो बिहार के गवर्नर ख़ुद मुआयना करने आए। किताबों के रखने के लिए लाइब्रेरी में अलमारी कलकत्ता से मंगाई गईं। लाइब्रेरी की लाल रंग की इमारत काफ़ी खूबसूरत लग रही थी। और इस तरह से नई इमारत में लाइब्रेरी शिफ़्ट हुई। अभी कुछ साल गुज़रे ही थे कि दूसरी जंग ए अज़ीम की शुरुआत हो गई। पटना पर हवाई हमले का ख़तरा था, लाल रंग को दूर से देखा जा सकता था, इसलिए जल्दी से उसके उपर भूरे रंग से पोताई की गई। वलीउद्दीन ख़ुदाबख़्श जो उस समय लाइब्रेरी के सेक्रेटेरी थे; ने आनन फ़ानन में जितनी भी नायाब किताबें थीं; उन्हें पटना से दूर अलग अलग जगह शिफ़्ट किया; जहां हवाई हमले का ख़तरा कम हो। जंग ख़त्म होने के बाद सारी किताबों को वापस पटना ला कर लाइब्रेरी में शिफ़्ट किया गया। ये वो दौर था जब लाइब्रेरी की हिफ़ाज़त लोग अपनी जान से अधिक किया करते थे। और आज काल लाइबेरी में स्टाफ़ की कमी इस लेवल पर है कि चीज़ें मिलती ही नहीं हैं, जो बड़ा निराशाजनक है।
पुस्तकालय का वर्तमान खजाना:
इस पुस्तकालय में अरबी, फारसी, उर्दू, संस्कृत और हिंदी में लगभग 21000 दुर्लभ पांडुलिपियां और 2.5 लाख से अधिक मुद्रित पुस्तकें मौजूद हैं। यहाँ तैमूर और उसके वंशजों के इतिहास को दर्शाने वाली भव्य सचित्र पांडुलिपि (तारीख-ए-खानदान-ए-तैमूरिया) और नादिर शाह की तलवार जैसी ऐतिहासिक वस्तुएं सुरक्षित हैं।
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