विपश्यना केंद्र नालंदा में विपश्यना प्रशिक्षण का सफलता पूर्वक समापन ....!!
●विपश्य ना शिविर में लोगों ने सीखी सांस पर ध्यान केंद्रित करने की कला
●मानसिक तौर पर आदमी को मजबूत बनाती है विपश्युना की साधना
● जीने की कला सिखाती है विपश्यना ध्यान
नालंदा,14 जून 2026 : धम्मा नालंदा विपश्यना केंद्र में दस दिवसीय विपश्यना ध्यान शिविर का आयोजन किया गया। जिसका समापन 14 जून को किया गया।
इस शिविर में आचार्य रूप में रूप में नागपुर के पंचम राव खादीपुरे और जयपुर की प्राचार्या श्रीमती मीनु अग्रवाल जी उपस्थित थे। इनके सानिध्य में दर्जनों विपस्सी साधक और साधिकाओं ने ध्यान शिविर में भाग लिया।
जिसमें नालंदा के विपस्सी साधक श्री दिलीप कुमार एवं बेतिया वेस्ट चंपारण के धम सेवक शेषनाथ जी ने प्रमुखता से भाग लिया।
शिविर के समापन समारोह में आचार्य पंचम राव खादीपुरे ने बताया कि दुनियाभर में ध्यान के कई तरीके प्रचलित हैं और उनमें से एक है विपश्यना ध्यान। वैसे तो लगभग हर ध्यान का लक्ष्य एक ही होता है लेकिन ध्यान की तकनीक और फिलोस्फी उसे अलग बनाती है। उन्होंने बताया - विपश्यना आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की अत्यंत पुरातन साधना-विधि है। जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देखना-समझना विपश्यना है। लगभग २५०० वर्ष पूर्व सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने विलुप्त हुई इस पद्धति का पुन: अनुसंधान कर इसे जीवन जीने की कला, के रूप में सर्वसुलभ बनाया। इस सार्वजनीन साधना-विधि का उद्देश्य विकारों का संपूर्ण निर्मूलन और परिणामतः परमविमुक्ति का उच्च आनंद प्राप्त करना है। महात्मा सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने इसी ध्यान की तकनीक के द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया था। विपश्यना साधना में कोई सांप्रदायिक तत्त्व नहीं है और किसी भी पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति इसे अपना सकता है और इसका उपयोग कर सकता है। विपश्यना के शिविर ऐसे व्यक्ति के लिए खुले हैं, जो ईमानदारी के साथ इस विधि को सीखना चाहे। इसमें कुल, जाति, धर्म अथवा राष्ट्रीयता आड़े नहीं आती। हिन्दू, जैन, मुस्लिम, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, यहूदी तथा अन्य सम्प्रदाय वालों ने बड़ी सफलतापूर्वक विपश्यना का अभ्यास कर रहे हैं। विपश्यना सत्य और वर्तमान पर फोकस करता है। अगर आपको सच के साथ और वर्तमान में जीने की कला सीखनी है, तो आपको विपश्यना ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। इस ध्यान की खास बात है कि यह ध्यान आपको भूत की चिंताओं और भविष्य की आशंकाओं में जीने के बजाय आज के बारे में सोचने के लिए कहता है। यह ध्यान आपको जीवन की सच्चाई से भागने की शिक्षा नहीं देता है, बल्कि उस उसके वास्तविक स्वरूप में स्वीकारने को कहता है।
मौके पर विपस्सी साधक राकेश बिहारी शर्मा ने विपश्यना साधना का अनुभव के बारे में बताते हुए कहा कि साधना करते वक़्त मेरा शरीर और मन बहुत हल्का हो गया और बहुत ही आनंद की अनुभूति होने लगी, जिसका शब्दों में वर्णन करना सम्भव ही नहीं है। साधना के आख़री दिन मंगल मैत्री व साधना के बाद मन में अपार करुणा और प्रेम भर गया। यह भाव बहुत ही आनंद का क्षण होता है। साधना का सबसे अच्छा हिस्सा होता है - मंगल मैत्री। मंगल मैत्री का मतलब है की साधना में मेरे द्वारा कमाए हुए पुण्यों का फल इस संसार के सभी जीवित, मृत, पेड़, पक्षी और निर्जीव सभी को मिले। सबका मंगल हो सबका कल्याण हो। इस संसार में कोई दुःखी ना रहें।
“तेरा मंगल मेरा मंगल सब का मंगल होये रे,
जिस जननी ने जन्म दियां है उसका मंगल होये रे”...।
जहाँ तक मेरे जीवन का सवाल है तो मैं स्पष्टता से कहूँगा की विपश्यना से पहले भी मैं ध्यान और भिन्न-भिन्न विद्याओं में लगा रहा हूँ। अतः दस दिन की विपश्यना मेरे लिए लाभकारी रही मैं और अधिक करुणामय हो गया। करुणा और दया तो पहले ही बहुत थी लेकिन इस साधना के बाद और अधिक प्रवल हो गई है। उन्होंने बताया विपश्यना साधना के बाद सभी विपस्सी साधकों को हर रोज़ घर पर विपश्यना सुबह-शाम दो घंटे विपश्यना करनी चाहिए, पूर्ण लाभ लेने के लिए और विपश्यना को पूरी तरह सीखने के लिए केवल दस दिन का एक शिविर काफ़ी नहीं है। आपको प्रत्येक साल में दस दिन का शिविर और एक-एक दीन का शिविर में भाग लेना अवश्य चाहिए और घर पर भी अभ्यास करते रहना है। इस साधना से प्रत्येक कार्य को करने में ध्यान केंद्रित बना देता है - जैसे खाना ध्यानपूर्वक , चलना , उठना , नहाना यानी प्रत्येक कार्य ध्यान केंद्रित हो जाता है। तो जब मृत्यु आती है तब हम जान रहे होते हैं , हम मृत्यु के साक्षी होते हैं, हम मृत्यु को घटते हुए देख रहे होते हैं। और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं। अतः अभी भी वक़्त है धम्मा नालंदा विपश्यना केंद्र के ध्यान शिविर में जीवन को सफल बनाने के लिए अवश्य पधारें।
मौके पर विपस्सी साधक श्री दिलीप कुमार ने सफलता पूर्वक साधना के लिए विपस्सी साधक और साधिकाओं को शुभकामनायें दी।
इस साधना शिविर में मध्य विद्यालय शाहपुर के प्रधानाध्यापक रामसागर राम, उत्क्रमित मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक धर्मवीर प्रसाद, शिक्षक परशुराम कुमार यादव, विकास कुमार, सत्यम कुमार, सज्जन कुमार अकेला, राजकुमार,सुजीत कुमार अकेला, अरविन्द पंडित, रजीष कुमार सर्वेश कुमार विकास पंडित, प्रो. मधु कुमारी, ज्योति कुमारी, बबिता कुमारी, क्रितिनिधि, जुली कुमारी, दीप्ती पाण्डेय सहित दर्जनों अन्य लोग भी उपस्थित रहे।
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