पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु की 112 वीं जयंती पर विशेष ...//
●भारतीय साम्यवाद के प्रकाश स्तंभ थे ज्योति बसु
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
बंगाल का लौह पुरुष कॉमरेड ज्योति बसु भारत के प्रमुख राजनीतिज्ञों और पश्चिम बंगाल के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों में से एक थे। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में जनसेवा, लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रशासनिक दक्षता का परिचय दिया। उनके नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में अनेक महत्वपूर्ण नीतियाँ लागू की गईं, जिनका राज्य की राजनीति और प्रशासन पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा। भारतीय राजनीति में उनका योगदान आज भी उल्लेखनीय माना जाता है।
ज्योति बसु का जन्म,शिक्षा और पारिवारिक जीवन :
कॉमरेड ज्योति दा के नाम से पुकारे जाने वाले ज्योतिरेंद्र बसु का जन्म कलकत्ता के बंगाली कायस्थ परिवार में 8 जुलाई 1914 को हुआ था। डॉक्टर पिता निशिकांत बसु और गृहणी मां हेमलता बसु की तीसरी और सबसे छोटी संतान के रूप में उनका बचपन बंगाल प्रांत के ढाका जिले के बार्दी में गुजरा, लेकिन स्कूली पढ़ाई कोलकाता में हुई। ज्योति बसु का वास्तविक नाम ज्योतिरेंद्र नाथ बसु था। पर जब उनके पिता उनका एडमीशन कराने कोलकाता के लोरेटो स्कूल में ले गए तो उन्होने कहा कि ये नाम काफी बड़ा है तो पिता ने उनका नाम छोटा करके ज्योति बसु करा दिया। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर स्कूल और प्रेसिडेंसी कॉलेज से पूरी की। इसके बाद 1935 में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन चले गए, जहाँ वे प्रसिद्ध राजनीतिक सिद्धांतकार हेरोल्ड लास्की के संपर्क में आए और मार्क्सवादी विचारधारा से प्रेरित हुए। 1940 में भारत लौटने पर वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) में शामिल हो गए।
ज्योति बसु पढ़ाई के दौरान जाना क्रांति के बारे में :
बसु की स्कूली शिक्षा 1920 में शुरू हुई जहां धरमतला, कोलकाता के लोरेटो स्कूल से उन्होंने 1921 में सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश लिया। इस बीच करीब 10 साल तक वहां किराए के घर में रहने के बाद उनके माता पिता हिंदुस्तान पार्क के अपने घर में शिफ्ट हो गए। जहां बसु ने पहली बार क्रांतिकारियों के बारे में सुना और मशहूर बंगाली लेखक शरतचंद्र कर प्रतिबंधित पुस्तक पत्थर देबी पढ़ी। बसु ने स्नातक शिक्षा हिंदू कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रेजी ऑनर्स किया।
ज्योति बसु का पहला विरोध :
जब ज्योति बसु शिक्षा प्राप्त कर रहे थे तब कोलकाता क्रांति की आग में सुलग रहा था। उन्हीं दिनों चट्टग्राम आर्मस गोदाम के मामले में क्रांतिकारी और अंग्रेजी शासन आमने सामने खड़े थे। जिस दिन सेना के द्वारा निहत्थे क्रांतिकारियों पर हमला किया गया उस दिन ज्योति बसु ने अपना पहला विद्रोह दिखाया और वो स्कूल नहीं गए। उस दिन वो खादी पहन कर सुभाष चंद्र बोस का भाषण सुनने ऑक्ट्रलानी मान्युमेंट मैदान पहुंच गए। इसके बाद उस छोटी सी उम्र में वो अंग्रेजी सिपाहियों के सामने खड़े तो नहीं हो सके पर भागने की बजाय उन्होंने तेज चलते हुए घर आना ठीक समझा ताकि उन्हें कायर ना समझा जाए। 1935 में बसु कानून के उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड रवाना हो गए, जहां हिटलर की सेना के विरोध में वे रूस के फासीवाद के विरोध में चलाए जा संघर्ष से काफी प्रभावित हुए। वहीं ग्रेट ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के संपर्क में आने के बाद उन्होंने राजनैतिक क्षेत्र में कदम रखा। हेरॉल्ड लेस्की की प्रेरित करने वाली स्पीच सुनने के बाद वे उन्होंने छात्रों की प्राग्रेसिव फोर्स नाम की संस्था ज्वाइन कर ली।
ज्योति बसु का ट्रेड यूनियन से जुड़ाव :
जब सीपीआई ने 1944 में इन्हें रेलवे कर्मचारियों के बीच काम करने के लिए कहा तो ज्योति बसु ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में संलग्न हुए। बी.एन. रेलवे कर्मचारी संघ और बी.डी रेल रोड कर्मचारी संघ के विलय होने के बाद ज्योति बसु संघ के महासचिव बने। 1946 में उन्होंने बंगाल विधानसभा के लिए हुंमायु कबीर के विरुद्ध चुनाव लड़ा और आठ वोटों से जीत हासिल की। हांलाकि यह हर वोट का मूल्य 200 वोट के बराबर था, इस तरह उनकी जीत का अंतर 1600 वोट का रहा। बाद में दंगों के दौरान उन्होंने शांति स्थापित करने का बेहद संवेदनशील कार्य किया और वे बेलियाघाट जाकर महात्मा गांधी से भी मिले।
ज्योति बसु की पहली राजनैतिक जेल यात्रा :
1948 में 28 फरवरी से 6 मार्च तक मोहम्मद अली पार्क में कम्युनिस्ट पार्टी का दूसरा अधिवेशन आयोजित किया गया। जहां सत्ताधारी पार्टी का विरोघ करने के कारण कम्युनिस्ट पार्टी को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। जिसके बाद 26 मार्च को ज्योति बसु को उनके घर से गिर फ्तार करके प्रेसिडेंसी जेल भेज दिया गया। ये उनकी पहली जेल यात्रा थी।
राजनीतिक सफर और उपलब्धियां सीपीआई (एम) का गठन:
ज्योति बसु भारतीय वामपंथी आंदोलन के आधार स्तंभ थे। 1964 में जब सीपीआई का विभाजन हुआ, तब ज्योति बसु सीपीआई (एम) के संस्थापक सदस्यों में से एक बने। वे 1977 से 2000 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। उनके नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य में ऐतिहासिक भूमि सुधार लागू किए और त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था स्थापित कर लाखों किसानों को सशक्त बनाया। 1996 के आम चुनावों के बाद उन्हें संयुक्त मोर्चा द्वारा भारत के प्रधानमंत्री का पद सौंपा जा रहा था, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व ने उन्हें इस पद को स्वीकार करने से रोक दिया, जिसे बाद में ज्योति बसु ने खुद एक "ऐतिहासिक भूल" माना।
ज्योति बसु ने नक्सवाद का खात्मा किया :
1980 के दशक में पश्चिम बंगाल में ही नकस्लवाद का उदय हुआ था वह स्थायी रूप ले सकता था लेकिन ज्योति बसु और उनकी सरकार का ही कमाल था कि उन्होंने उसे नलक्स प्रदेश नहीं बनने दिया। दूसरी ओर उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कि हर गांव और शहर के लोग वामपंथ और ज्योति बसु से जुड़ सके। नहीं तो आज बंगाल का हाल छत्तीसगढ़ की तरह होता जहां नक्सवलवाद बहुत गहरी पैठ बना लिया था।
मुख्यमंत्री के रूप में विरासत :
ज्योति बसु 1977 से 2000 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे कुल 23 वर्ष। यह अवधि भारतीय राज्य राजनीति में सबसे लंबे कार्यकालों में से एक है। उनके नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार ने भूमि सुधार, पंचायती राज को मजबूत करने, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने बंगाल को औद्योगिक और कृषि आधार पर स्थिरता दी, हालांकि बाद के वर्षों में उद्योगों के पलायन की आलोचना भी हुई। वे एक अनुभवी संसदीय नेता, कुशल प्रशासक और वाम विचारधारा के प्रखर समर्थक थे। पूरे देश में उनकी छवि एक सौम्य लेकिन दृढ़ नेता की थी, जो गठबंधन राजनीति को अच्छी तरह समझते थे।
ज्योति बसु का सेवानिवृत्ति और निधन :
वर्ष 2000 में ज्योति बसु ने मुख्यमंत्री पद से सेवानिवृत्ति लेते हुए अपनी जिम्मेदारी बुद्धदेव भट्टाचार्य को सौंपी। इसके बाद उनकी सेहत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी। 2008 में उन्हें पार्टी के पोलितब्यूरो से हटा दिया गया, लेकिन वे मृत्यु तक पार्टी की केंद्रीय समिति के विशेष आमंत्रित सदस्य बने रहे।
17 जनवरी य, 2010 को ज्योति बसु का निधन हो गया। उनके फैसले चाहे लोकप्रिय रहे हों या विवादास्पद, यह निश्चित है कि वे हमेशा कड़े और प्रभावशाली रहे। उनकी दृढ़ता और स्पष्टता के कारण उन्हें "बंगाल का लौह पुरुष" कहा जाता है।
ज्योति बसु का अंतिम दिनों की विचारधारा :
अपने जीवन के अंतिम दिनों तक ज्योति बसु समाजवादी विचारधारा और गरीबों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध रहे। उन्होंने अपने हर फैसले में गरीबों के उत्थान और समानता को प्राथमिकता दी। उनकी राजनीतिक विरासत में उनकी कठोरता और दृढ़ नीतियों का महत्वपूर्ण स्थान है। ज्योति बसु का योगदान केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ा। एक दृढ़ प्रशासक और दूरदर्शी नेता के रूप में, उन्होंने विकास और समानता के अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किए। उनकी नीतियों और नेतृत्व ने न केवल वामपंथ को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि आम जनता के जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें - शंखनाद