समाजसेविका लक्ष्मी देवी : आदर्श नारी और जेपी आंदोलन की साहसी सहयोगी...।।
“आजीवन जनहित, समाजसेवा और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित एक साहसी महिला”
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
भारतीय समाज और इतिहास में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों तक महिलाओं ने साहस, त्याग और संघर्ष का परिचय दिया। फिर भी अनेक ऐसी महिलाओं का योगदान इतिहास के पन्नों में पर्याप्त स्थान नहीं पा सका, जिन्होंने अपने परिवार, समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नालंदा जिले के बबुरबन्ना गाँव की समाजसेविका लक्ष्मी देवी ऐसी ही एक साहसी, शिक्षित और सामाजिक रूप से सक्रिय महिला थीं। उन्होंने अपने जीवन को जनहित, समाजसेवा, गांधीवादी मूल्यों तथा सामाजिक न्याय के कार्यों के लिए समर्पित किया। विशेष रूप से वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति के दौर में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
लक्ष्मी देवी का जन्म 4 सितंबर 1940 को नालंदा जिले के मकसूसपुर (चमर विगहा) गाँव में हुआ था। उनके पिता स्वर्गीय हरिहर सिंह राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे।
परिवार में शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता था। उपलब्ध पारिवारिक विवरण के अनुसार, हरिहर सिंह जी ने अपने पुत्रों के साथ-साथ पुत्रियों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया। इसी वातावरण का प्रभाव लक्ष्मी देवी के व्यक्तित्व पर पड़ा और वे शिक्षित, जागरूक तथा आधुनिक विचारों वाली महिला के रूप में विकसित हुईं।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा मकसूसपुर (चमर विगहा) में हुई। इसके बाद उन्होंने उच्च विद्यालय लारणपुर से मैट्रिक तथा नालंदा कॉलेज से इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की।
उनके जीवन में शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास का माध्यम नहीं रही, बल्कि आगे चलकर सामाजिक जागरूकता और महिला सशक्तीकरण का आधार भी बनी।
विवाह और पारिवारिक जीवन :
19 जुलाई 1961 को लक्ष्मी देवी का विवाह नालंदा जिले के बबुरबन्ना गाँव के सम्पन्न किसान स्वर्गीय लाल बिहारी सिंह के छोटे पुत्र स्वर्गीय शिव नारायण प्रसाद के साथ हुआ।
शिव नारायण प्रसाद सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय व्यक्ति थे। विवाह के बाद लक्ष्मी देवी ने न केवल पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन किया, बल्कि अपने पति के सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों में भी उनका साथ दिया।
उनके दो पुत्र- शैलेन्द्र कुमार उर्फ पप्पू यादव तथा सतीश कुमार उर्फ पिक्कू यादव और तीन पुत्रियाँ—प्रेमलता कुमारी, रश्मि कुमारी तथा पल्लवी कुमारी हैं।
जेपी आंदोलन और सम्पूर्ण क्रांति में भूमिका :
वर्ष 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में सम्पूर्ण क्रांति का व्यापक आंदोलन प्रारंभ हुआ। इस आंदोलन में विद्यार्थियों, युवाओं, किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की बड़ी भागीदारी रही।
इसी दौर में स्वर्गीय शिव नारायण प्रसाद और लक्ष्मी देवी ने भी जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उपलब्ध स्थानीय एवं पारिवारिक विवरण के अनुसार, लक्ष्मी देवी ने अपने पति के साथ आंदोलन को मजबूती प्रदान की और भूमिगत जेपी सेनानियों की सहायता की।
बताया जाता है कि उन्होंने भूमिगत कार्यकर्ताओं को अपने घर तथा आश्रम में आश्रय दिया, उनके लिए भोजन की व्यवस्था की, गुप्त संदेश पहुँचाने में सहयोग किया तथा उन्हें पुलिस की निगरानी और गिरफ्तारी से बचाने में सहायता की।
उस समय भूमिगत कार्यकर्ताओं को अपने घर में आश्रय देना अत्यंत जोखिमपूर्ण कार्य था। पुलिस की निगरानी के बीच किसी आंदोलनकारी को छिपाना परिवार के लिए भी खतरा पैदा कर सकता था। ऐसे समय में लक्ष्मी देवी का साहस और विश्वास उनके सामाजिक एवं राजनीतिक समर्पण को दर्शाता है।
उनका योगदान केवल अपने पति का साथ देने तक सीमित नहीं था। उन्होंने स्वयं भी आंदोलन के सामाजिक पक्ष में सक्रिय भागीदारी निभाई और महिलाओं को जागरूक करने का प्रयास किया।
महिला जागरूकता और महिला उत्थान :
लक्ष्मी देवी महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता और आत्मनिर्भरता को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार मानती थीं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने नालंदा में जेपी के मिशन से जुड़ी “महिला चरखा समिति” को सक्रिय बनाने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण सहयोग किया। महिलाओं को संगठित करना, उन्हें सामाजिक रूप से जागरूक करना तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित करना उनके सामाजिक कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उनका मानना था कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब महिलाओं को भी शिक्षा, सम्मान और निर्णय लेने का अधिकार मिले।
शिव नारायण प्रसाद को नैतिक और वैचारिक संबल :
स्वर्गीय शिव नारायण प्रसाद के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में लक्ष्मी देवी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में अपने पति को वैचारिक, नैतिक और पारिवारिक संबल प्रदान किया। जब शिव नारायण प्रसाद ने समाज और किसानों के हित में संघर्ष किया, तब लक्ष्मी देवी उनके साथ खड़ी रहीं। उनके सहयोग ने परिवार और सामाजिक आंदोलन—दोनों स्तरों पर शिव नारायण प्रसाद को मजबूती प्रदान की। इसी कारण उनके जीवन की चर्चा केवल एक समाजसेविका के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी सहधर्मिणी और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी की जाती है, जिसने अपने पति के संघर्ष को अपना संघर्ष समझकर साथ दिया।
किसान और सामाजिक संघर्ष में योगदान :
बबुरबन्ना तथा आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक और किसान आंदोलनों में भी लक्ष्मी देवी की सक्रियता का उल्लेख मिलता है। उस दौर में सामाजिक असमानता, सामंती दबाव तथा वंचित वर्गों के अधिकारों से जुड़े अनेक प्रश्न स्थानीय स्तर पर संघर्ष का विषय थे।
स्थानीय विवरणों के अनुसार, लक्ष्मी देवी ने किसानों तथा समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए चलने वाले संघर्षों में सक्रिय सहयोग किया। वे केवल घरेलू और कृषि संबंधी जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सामाजिक कार्यों में भी आगे बढ़कर भाग लेती थीं।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि ग्रामीण समाज की महिलाएँ भी सामाजिक परिवर्तन और जनआंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
आपातकाल के दौर में साहस :
आपातकाल के दौर में जेपी आंदोलन से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। ऐसे समय में लक्ष्मी देवी ने अपने पति के साथ आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी। उनके बारे में उपलब्ध पारिवारिक विवरण के अनुसार, उन्होंने अपने योगदान के लिए न तो सार्वजनिक प्रशंसा की अपेक्षा की और न ही किसी प्रकार के मुआवजे की इच्छा रखी। उनके लिए समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी व्यक्तिगत लाभ से ऊपर थी।
पति के निधन के बाद परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी :
स्वर्गीय शिव नारायण प्रसाद का निधन 14 अप्रैल 1977 को हुआ था। पति के निधन के बाद लक्ष्मी देवी ने अपने परिवार की जिम्मेदारी दृढ़ता से संभाली। उन्होंने अपने पाँचों बच्चों को शिक्षा दिलाकर उन्हें योग्य और जिम्मेदार नागरिक बनाने का प्रयास किया। उनके बड़े पुत्र शैलेन्द्र कुमार उर्फ पप्पू यादव कृषि कार्य से जुड़े हैं। उनके छोटे पुत्र सतीश कुमार उर्फ पिक्कू यादव पूर्व मुखिया रह चुके हैं और वर्तमान में पैक्स अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं। अपने बच्चों की शिक्षा और सामाजिक विकास के साथ-साथ लक्ष्मी देवी ने समाजसेवा की भावना को भी जीवित रखा।
एक प्रेरणादायी महिला व्यक्तित्व :
लक्ष्मी देवी का जीवन ग्रामीण भारत की उन महिलाओं की कहानी है, जिन्होंने अपने समय की सामाजिक सीमाओं के बावजूद अपनी पहचान बनाई। वे शिक्षित थीं, सामाजिक रूप से जागरूक थीं और जनहित के प्रश्नों पर सक्रियता से कार्य करती थीं। उनके जीवन में शिक्षा, महिला जागरूकता, सामाजिक न्याय, किसान हित, गांधीवादी विचार और जेपी आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। उनका सबसे बड़ा योगदान शायद यही है कि उन्होंने अपने परिवार और समाज—दोनों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया।
निष्कर्ष
बबुरबन्ना की स्वर्गीय लक्ष्मी देवी जी केवल एक गृहिणी नहीं, बल्कि एक सक्रिय समाजसेविका, साहसी महिला और जेपी आंदोलन की सहयोगी के रूप में स्मरण की जाने योग्य हैं। वर्ष 1974 की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान भूमिगत जेपी सेनानियों को आश्रय, भोजन और आवश्यक सहयोग देना, गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान में सहायता करना तथा उन्हें पुलिस से बचाने का प्रयास करना उनके साहस और प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों से नहीं बनता। इतिहास के निर्माण में वे अनगिनत सामान्य लोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिन्होंने कठिन समय में बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा के समाज और देश के लिए अपना योगदान दिया। स्वर्गीय लक्ष्मी देवी का जीवन ऐसी ही एक साहसी महिला की प्रेरणादायी गाथा है—एक ऐसी महिला, जिसने अपने जीवन को परिवार, समाज, महिला जागरूकता, किसान हित और जनसेवा के लिए समर्पित किया।
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