बाकीपुर उपचुनाव: अति पिछड़ा वर्ग की मौन क्रांति, नीतिगत विश्वासघात और ढहता चुनावी तिलिस्म.....

लेखक: कुणाल किशोर साहनी 

​बिहार के राजनीतिक इतिहास में कुछ चुनाव केवल संख्याबल या सीटों के फेरबदल के लिए नहीं जाने जाते, बल्कि वे सामाजिक चेतना, नीतिगत विसंगतियों और व्यवस्थागत उपेक्षा के विरुद्ध उठे जनआक्रोश के ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। पटना की हृदयस्थली माने जाने वाले बाकीपुर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव परिणाम भी समकालीन राजनीति में ठीक इसी प्रकार का एक गहरा संरचनात्मक विस्फोट बनकर उभरा है। दशकों से जिसे सत्ताधारी दल का एक ऐसा अभेद्य दुर्ग माना जाता रहा जहाँ चुनाव लड़ने से पहले ही परिणाम तय मान लिए जाते थे, उस क्षेत्र में मतदाताओं ने पारंपरिक राजनीतिक गणित, घिसे-पिटे सामाजिक फॉर्मूलों और सत्ता की आत्ममुग्धता को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। यह जनादेश किसी एक दल की सामान्य हार या दूसरे की अप्रत्याशित जीत भर नहीं है, बल्कि यह बिहार के सबसे बड़े, सबसे मेहनतकश किंतु सबसे अधिक उपेक्षित सामाजिक समूह यानी अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के दशकों से सुलगते असंतोष का खुला उद्घोष है।
​इस राजनीतिक भूचाल के पीछे दशकों से जमा हो रहे बारूद के ढेर और उस पर गिरी चिंगारी को समझने के लिए भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि रहीम का यह कालजयी दोहा सबसे सटीक मुहावरा प्रस्तुत करता है:
​रहिमन जिह्वा बाबरी, कहि गई सरग पताल।
आपू तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥
​अर्थात अनियंत्रित वाणी बिना नफा-नुकसान सोचे अहंकार में बड़ी-बड़ी बातें बोलकर सुरक्षित अंतर्मुखी हो जाती है, लेकिन उसका सारा खामियाजा पूरे अस्तित्व और नेतृत्व को भुगतना पड़ता है। बाकीपुर में बयानों के दंभ, जनसांख्यिकी के मिथक और अति पिछड़ों की हकमारी ने मिलकर ठीक यही स्थिति उत्पन्न की है।
​राष्ट्रीय पृष्ठभूमि और युवा चेतना का उग्र ज्वार
​इस राजनीतिक परिवर्तन की ज़मीन केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं के भीतर पनप रही गहरी व्यवस्था विरोधी भावना भी सक्रिय थी। जब प्रतियोगी परीक्षाओं में निरंतर होती गड़बड़ियों, पेपर लीक की अनसुलझी त्रासदियों और रोजगार के सिकुड़ते अवसरों के बीच न्यायपालिका और सत्ता प्रतिष्ठानों की ओर से युवाओं की पीड़ा को संवेदनहीनता से देखा गया, तो शिक्षित किंतु बेरोजगार पीढ़ी के भीतर आत्मसम्मान की एक नई ज्वाला धधक उठी। युवाओं के आक्रोश को जब असंवेदनशील उपमाओं से नवाजा गया, तो डिजिटल स्पेस से लेकर सड़कों तक एक अभूतपूर्व असंतोष का निर्माण हुआ।
​इस सामाजिक पृष्ठभूमि में बिहार का वह शिक्षित युवा वर्ग, जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपनी जवानी खपा रहा था, स्वयं को ठगा हुआ महसूस करने लगा। राजधानी के विभिन्न लॉजों, कोचिंग संस्थानों और हॉस्टलों में रहकर दिन-रात मेहनत करने वाले छात्रों में यह भावना घर कर गई कि वर्तमान व्यवस्था उनके भविष्य के प्रति पूरी तरह उदासीन है। इस युवा आक्रोश ने चुनाव के दौरान पारंपरिक जातिगत निष्ठाओं को तोड़कर सत्ता के सामने एक तीखा सवाल खड़ा कर दिया। जब युवा वर्ग ने देखा कि नीतिगत बदलाव केवल काग़ज़ों तक सीमित हैं और नियुक्तियों के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है, तो उसने चुनावी समर में मूक रहकर भी व्यवस्था को निर्णायक चोट पहुँचाने का मन बना लिया।
​सत्ता का दंभ और स्वाभिमान पर सीधा प्रहार
​बाकीपुर विधानसभा क्षेत्र का सामाजिक और बौद्धिक स्वरूप बिहार के अन्य सामान्य विधानसभा क्षेत्रों से सर्वथा भिन्न है। यह वह इलाका है जहाँ मुख्यमंत्री आवास, राजभवन, राज्य सचिवालय, पटना उच्च न्यायालय और वरिष्ठ प्रशासनिक व न्यायिक अधिकारियों के आवास स्थित हैं। बोरिंग रोड, श्रीकृष्णपुरी, फ्रेज़र रोड और बेली रोड जैसे इलाके राज्य के प्रबुद्ध वर्ग, विचारकों, वकीलों, डॉक्टरों और प्राध्यापकों के केंद्र हैं।
​ऐसे प्रबुद्ध क्षेत्र में जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से यह सार्वजनिक संदेश दिया गया कि यह सीट उनका तीन दशकों का ऐसा पुश्तैनी गढ़ है जहाँ किसी भी अनजाने या अक्षम चेहरे को भी मैदान में उतार दिया जाए तो जनता उसे अपनी मजबूरी समझकर जिता देगी, तो इस बयान ने मतदाताओं के लोकतांत्रिक स्वाभिमान को झकझोर दिया। इस दंभ भरी टिप्पणी ने प्रबुद्ध नागरिकों और आम जनता दोनों को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या राजनीतिक दल उन्हें मात्र बंधुआ वोट बैंक समझते हैं? स्थानीय स्तर पर इस बयान को मतदाताओं की गरिमा और विवेक पर सीधा हमला माना गया। जन सुराज और अन्य वैकल्पिक ताकतों ने जब इसे आत्मसम्मान का मुद्दा बनाकर जनता के बीच रखा, तो सत्ता पक्ष की ओर से दी जाने वाली तमाम सफाई केवल लकीर पीटने जैसी साबित हुईं।
​काग़ज़ी आंकड़ों का तिलिस्म और पलायन की अनदेखी
​दशकों से चुनाव प्रबंधकों का यह दावा रहा है कि वे वैज्ञानिक डेटा और मजबूत सामाजिक समीकरणों के आधार पर रणनीति बनाते हैं। बाकीपुर में भी दशकों पुराने उस आंकड़े को ब्रह्मवाक्य मान लिया गया जिसके अनुसार सवर्ण समाज को 35 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग (अनुसूची-2) को 29 प्रतिशत, अति पिछड़ा वर्ग को 17 प्रतिशत और अन्य वर्गों को 19 प्रतिशत में बांटकर देखा जाता था। पार्टी प्रबंधकों को अटूट विश्वास था कि सवर्ण, वैश्य और अति पिछड़ा वर्ग का एक हिस्सा मिलकर ऐसा अजेय कोर वोट बैंक तैयार करता है जिसे भेद पाना असंभव है।
​परंतु यह पूरा गणित ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर, बंद कमरों में तैयार किए गए स्थिर और भ्रामक आंकड़ों पर आधारित था। वर्ष 2000 के बाद आई सूचना प्रौद्योगिकी और कॉरपोरेट क्रांति ने पटना के उच्च और मध्यम वर्गीय समाज की संरचना को पूरी तरह बदल दिया था:
​सवर्ण वर्ग का महानगरों में विस्थापन: बाकीपुर के संपन्न और सवर्ण परिवारों की नई पीढ़ी का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, मुंबई, नोएडा और गुरुग्राम जैसे महानगरों में बस चुका है।
​प्रवासी मतदाताओं की राजनीतिक उदासीनता: 1990 और 2000 के दशक में यह वर्ग चुनावी अभियानों में भाग लेने या सरकार बदलने के नाम पर मतदान के दिन पटना आता था। किंतु लंबे समय तक एक ही गठबंधन की सत्ता रहने के बाद इस वर्ग में राजनीतिक तत्परता समाप्त हो गई। उनके नाम केवल मतदाता सूचियों में शोभा बढ़ाते रहे, जबकि वास्तविक मतदान के दिन बूथों से उनकी भौतिक उपस्थिति नदारद रही। यही कारण रहा कि बाकीपुर में समग्र मतदान प्रतिशत लगातार गिरता रहा।
​मतदाता सूची और बीएलओ का पक्षपात: स्थानीय बूथ लेवल अधिकारियों और पार्टी एजेंटों ने पुरानी सूचियों को दुरुस्त करने के बजाय प्रवासी मतदाताओं के नाम सूचियों में बनाए रखे, जिससे काग़ज़ों पर सवर्ण आबादी अधिक और ज़मीनी तौर पर मौजूद श्रमजीवी आबादी कम दिखती रही।
​जनसांख्यिकी का वास्तविक सच: अति पिछड़ा वर्ग बना सबसे बड़ी ताकत
​जब ज़मीनी स्तर पर स्वतंत्र सर्वेक्षणों और वास्तविक मैपिंग के जरिए बाकीपुर के 3.69 लाख से अधिक मतदाताओं की पड़ताल की गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। पलायन के प्रभाव को हटाने के बाद बाकीपुर का वास्तविक सामाजिक ढांचा पूरी तरह बदल चुका था:
​सवर्ण वर्ग की वास्तविक उपस्थिति: काग़ज़ों पर 35 प्रतिशत दिखने वाला यह वर्ग वास्तविक धरातल पर केवल 21 प्रतिशत के आसपास सिमटा हुआ था। व्यापक पलायन के कारण मतदान के दिन बूथ पर उनकी वास्तविक उपस्थिति मात्र 10 प्रतिशत के करीब रह जाती थी, जिससे उनका प्रभावी वोट शेयर बेहद सीमित हो गया।
​अति पिछड़ा वर्ग (EBC) का विराट विस्तार: बाकीपुर की वास्तविक आबादी में अति पिछड़ा वर्ग लगभग 32 प्रतिशत (करीब 1,20,000 मतदाता) के साथ सबसे बड़ा और निर्णायक सामाजिक समूह बनकर उभरा। इसमें अकेले चंद्रवंशी समाज के 52,000 से अधिक मतदाता शामिल हैं, जबकि शेष 68,000 मतदाता अन्य दर्जनों अति पिछड़ी जातियों से आते हैं।
​पिछड़ा वर्ग (अनुसूची-2): यादव, वैश्य, कुर्मी और कोईरी समाज की कुल उपस्थिति लगभग 28 प्रतिशत दर्ज की गई।
​दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय: अनुसूचित जाति 10 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय 9 प्रतिशत की स्थिर हिस्सेदारी के साथ मौजूद रहे।
​इस प्रकार बाकीपुर वस्तुतः सवर्ण बहुल क्षेत्र न रहकर अति पिछड़ा और श्रमजीवी बहुल क्षेत्र में तब्दील हो चुका था, जिसे राजनीतिक दल अपनी आंखों पर बंधी अहंकार की पट्टी के कारण देख पाने में असमर्थ रहे।
​अति पिछड़ा वर्ग: पटना की आर्थिक रीढ़, किंतु राजनीतिक रूप से बेगाना
​बाकीपुर की भौगोलिक और आर्थिक संरचना का सबसे बड़ा सच यह है कि राजधानी का संपूर्ण दैनिक जीवन इसी अति पिछड़े श्रमजीवी वर्ग के कंधों पर टिका हुआ है। सुबह 4 बजे से शुरू होकर देर रात तक चलने वाले शहर के आर्थिक पहिये को यही समाज गति देता है:
​बोरिंग रोड, कंकड़बाग और फ्रेज़र रोड के चौराहों पर फल, सब्ज़ी और मछली बेचने वाले छोटे दुकानदार।
​मीठापुर और जीपीओ गोलंबर से लेकर आशियाना तक चलने वाले ई-रिक्शा, ऑटो और टोटो चालक।
​14-14 घंटे किराए की बाइक दौड़ाकर शहरवासियों के घरों तक सामान पहुँचाने वाले डिलीवरी कर्मी।
​बाज़ारों, मॉल और निजी दुकानों में बेहद कम मासिक मानदेय पर काम करने वाले सेल्समैन और कामगार।
​राजधानी के निर्माण कार्यों में पसीना बहाने वाले राजमिस्त्री और दैनिक मज़दूर।
​यह विशाल श्रम शक्ति संख्याबल में बाकीपुर की वास्तविक धड़कन थी। विडंबना यह रही कि राजनीतिक दल दशकों तक इनके वोटों को अपनी जागीर समझते रहे, लेकिन जब नीति-निर्माण, सम्मान, बुनियादी अधिकारों और टिकट बंटवारे की बात आई, तो इन्हें पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया।
​आरक्षण में हकमारी और नीतिगत विश्वासघात की पीड़ा
​बाकीपुर के अति पिछड़ा वर्ग का पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था से मोहभंग किसी एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन दशकों से चला आ रहा गहरा नीतिगत विश्वासघात है। इस आक्रोश की मुख्य जड़ें निम्नलिखित नीतिगत विसंगतियों में निहित हैं:
​आरक्षण के भीतर असंतुलन: अति पिछड़ा वर्ग को दिए गए 18 प्रतिशत आरक्षण के कोटे में अपेक्षाकृत अधिक सक्षम और साधन-संपन्न जातियों को शामिल कर दिए जाने से मूल अति पिछड़ों के हक पर डाका पड़ गया। उच्च शिक्षा, तकनीकी संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मूल ईबीसी के हिस्से के अधिकांश अवसरों पर इन संपन्न जातियों का वर्चस्व स्थापित हो गया। हालिया प्रशासनिक और शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के परिणामों में जब यह अंतर खुलकर सामने आया कि मूल अति पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नगण्य रह गया है, तो इस समाज के शिक्षित युवाओं में भारी हताशा फैल गई।
​संविधान की नौवीं अनुसूची पर निष्क्रियता: राज्य में जाति गणना के बाद आरक्षण की सीमा को 65 प्रतिशत तक बढ़ाने का कानून लाया गया, परंतु मजबूत वैधानिक तैयारी न होने के कारण यह न्यायालय में टिक नहीं सका। तमिलनाडु की तर्ज पर इसे संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल कराकर स्थायी सुरक्षा प्रदान करने के लिए केंद्र और राज्य की सत्ता ने कोई ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। इसके परिणामस्वरूप लाखों सरकारी नियुक्तियों में ईबीसी कोटे के हजारों पद सीधे तौर पर न्यायिक उलझनों की भेंट चढ़ गए।
​नेतृत्व और सम्मान का अभाव: बाकीपुर में 1.20 लाख की विशाल आबादी और अकेले चंद्रवंशी समाज के 52 हजार से अधिक वोट होने के बावजूद राजनीतिक दलों ने कभी इस वर्ग से किसी सक्षम व्यक्ति को नेतृत्व का अवसर नहीं दिया। दल हमेशा इन्हें केवल नारे लगाने और झंडा उठाने वाला साधन समझते रहे।
​स्थानीय दबंगई और व्यवस्थागत अपमान: ज़मीनी स्तर पर सत्ता से जुड़े बिचौलियों, ठेकेदारों और स्थानीय नेताओं द्वारा इन मेहनतकश गरीबों, फुटपाथ दुकानदारों और रिक्शा चालकों के साथ लगातार उपेक्षापूर्ण और अपमानजनक व्यवहार किया जाता रहा।
​जन चेतना का उभार और नए राजनीतिक विकल्प की ओर झुकाव
​जब सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद हो गए, आरक्षण का लाभ छिन गया और आर्थिक बदहाली ने ईबीसी समाज के युवाओं को असंगठित क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी पर धकेल दिया, तो उनके भीतर व्यवस्था से हिसाब चुकता करने की भावना जाग उठी।
​बाकीपुर के अति पिछड़ा वर्ग ने इस उपचुनाव में यह स्पष्ट संदेश दिया कि वे अब किसी दल के 'स्थायी पिछलग्गू' नहीं रहेंगे। प्रशांत किशोर के जन सुराज जैसे नए राजनीतिक विकल्पों ने जब ज़मीनी स्तर पर अति पिछड़ों की इस पीड़ा को स्वर दिया, उनकी हिस्सेदारी की बात की और उनके स्वाभिमान को चुनावी विमर्श के केंद्र में स्थापित किया, तो ईबीसी मतदाताओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा पारंपरिक बंधनों को तोड़कर उस दिशा में लामबंद हो गया। यह केवल किसी नए दल के प्रति आकर्षण नहीं था, बल्कि दशकों के अपमान, हकमारी और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध ईबीसी समाज का एक संगठित और मूक राजनीतिक प्रतिकार था।
​निष्कर्ष: बिहार की राजनीति का नया दिशा-निर्देश
​मुख्यधारा के विश्लेषकों द्वारा बाकीपुर के परिणाम को केवल एक सीट का उलटफेर या सतही रूप से 'जातिवाद का अंत' करार देना ज़मीनी हकीकत से आंखें चुराने जैसा है। सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। यह परिणाम वस्तुतः यह साबित करता है कि बिहार की राजनीति में अब अति पिछड़ा वर्ग केवल सत्ता की सीढ़ी बनने को तैयार नहीं है।
​बाकीपुर का जनादेश राज्य के तमाम राजनीतिक दलों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह स्पष्ट करता है कि अब चुनाव केवल पारंपरिक गढ़ों के अहंकार, भावनात्मक नारों और स्थिर जातिगत आंकड़ों के आधार पर नहीं जीते जा सकते। जो भी दल अति पिछड़ा वर्ग के स्वाभिमान की अनदेखी करेगा, उनके आरक्षण की सुरक्षा में विफल रहेगा और उनकी श्रम शक्ति का शोषण कर उन्हें उचित राजनीतिक हिस्सेदारी से वंचित रखेगा, उसका बड़े से बड़ा राजनीतिक दुर्ग भी ढह जाएगा। बाकीपुर ने यह सिद्ध कर दिया है कि लोकतंत्र में मतदाता जागीर नहीं होते और जब मौन रहने वाला अति पिछड़ा समाज जागता है, तो वह दशकों पुरानी राजनीतिक व्यवस्था की दिशा बदलने का सामर्थ्य रखता है।

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