महामना चौधरी महाराज सिंह भारती : विचारों की वह मशाल, जो आज भी जल रही है....।
●महामना चौधरी महाराज सिंह भारती की 31वीं पुण्यतिथि पर विशेष :
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा
महासचिव, साहित्यिक मंडली ‘शंखनाद’
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन केवल घटनाओं का सिलसिला नहीं होता, बल्कि वह अपने समय की जड़ता को चुनौती देने वाली एक वैचारिक यात्रा बन जाता है। चौधरी महाराज सिंह भारती ऐसा ही एक नाम है। वे समाज सुधारक थे, वैज्ञानिक चिंतक थे, किसान हितों के पैरोकार थे, निर्भीक राजनेता थे और सबसे बढ़कर ऐसे मानवतावादी विचारक थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए समर्पित कर दिया।
आज जब समाज एक ओर आधुनिक विज्ञान और तकनीक की ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर अंधविश्वास, जातीय भेदभाव, सामाजिक असमानता और रूढ़िवादी सोच के प्रश्न हमारे सामने अब भी मौजूद हैं, तब महाराज सिंह भारती का चिंतन और भी प्रासंगिक दिखाई देता है। उनकी 31वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल किसी महापुरुष को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उन प्रश्नों को फिर से सामने लाना है, जिनके समाधान के लिए उन्होंने अपना जीवन खपा दिया।
संघर्ष और संवेदना से निर्मित व्यक्तित्व :
चौधरी महाराज सिंह भारती का जन्म 1 नवंबर 1918 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के अरनावली ग्राम में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम निध राम भारती तथा माता का नाम श्रीमती चरण कौर था। उन्होंने देव नागरी कॉलेज, मेरठ से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की।
विद्यार्थी जीवन से ही उनके व्यक्तित्व में स्वतंत्र चिंतन, तार्किकता और सामाजिक संवेदनशीलता के गुण दिखाई देने लगे थे। उस समय समाज जाति और छुआछूत की कठोर दीवारों से घिरा हुआ था, लेकिन भारती जी ने इन सामाजिक वर्जनाओं को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया। गरीब और दलित समाज के बच्चों के साथ खेलना, बैठना और भोजन करना उनके लिए असामान्य नहीं था।
किसी भी विषय पर अपनी बात निर्भीकता और तर्क के साथ रखना उनकी विशेषता थी। उनके सहपाठी उन्हें स्नेहपूर्वक ‘सच्चा भारतीय’ कहकर पुकारते थे। यही ‘भारती’ संबोधन आगे चलकर उनके व्यक्तित्व और नाम का स्थायी हिस्सा बन गया।
स्वतंत्रता आंदोलन से संसद तक :
भारती जी राजनीतिक रूप से अत्यंत सक्रिय और प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का उपकरण माना।
उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन से जुड़कर राजनीतिक जीवन को आगे बढ़ाया। 1958 में वे मेरठ से विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए। इसके बाद 1967 में लोकसभा के लिए निर्वाचित होकर संसद पहुंचे।
उनकी राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता थी—सादगी। चुनाव प्रचार के लिए बैलगाड़ी और खटारा जीप का इस्तेमाल करने वाला यह नेता सत्ता के गलियारों में पहुंचकर भी आम आदमी से दूर नहीं हुआ। उनकी जीवनशैली में न तो राजनीतिक आडंबर था और न ही वैभव का प्रदर्शन।
उनके लिए राजनीति का अर्थ था—जनता के प्रश्नों को समझना, उनके बीच जाना और व्यवस्था में आवश्यक परिवर्तन के लिए संघर्ष करना।
सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण थे सिद्धांत :
डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ रहते हुए भारती जी ने समाजवादी विचारधारा को निकट से समझा। समय के साथ कुछ सैद्धांतिक मतभेदों के कारण उन्होंने समाजवादी पार्टी से अलग राह अपनाई। लेकिन उन्होंने अपने वैचारिक संघर्ष को विराम नहीं दिया।
बाद में वे महामना रामस्वरूप वर्मा के निकट आए। दोनों ने मिलकर अर्जक संघ तथा शोषित समाज दल के वैचारिक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों की वैचारिक मित्रता सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में विशेष महत्व रखती है।
भारती जी ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा इन आंदोलनों के प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण और साहित्य के माध्यम से जनजागरण में लगा दिया। उनके लिए संगठन कोई राजनीतिक सीढ़ी नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम था।
अंधविश्वास के विरुद्ध वैज्ञानिक चेतना :
महाराज सिंह भारती की विचारधारा का केंद्रीय आधार वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। वे सामाजिक जीवन में तर्क, विवेक और प्रमाण को महत्व देते थे। अंधविश्वास, रूढ़िवाद, जातिगत ऊंच-नीच और धार्मिक पाखंड के वे मुखर आलोचक थे।
उनकी मान्यता थी कि यदि समाज को वास्तव में समानतामूलक और न्यायपूर्ण बनाना है तो केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं होगा। सामाजिक चेतना में परिवर्तन भी उतना ही आवश्यक है।
उनका चिंतन इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता था कि मनुष्य को भय, अंधविश्वास और रूढ़ियों से मुक्त करके विवेकशील कैसे बनाया जाए। यही कारण है कि उन्होंने विज्ञान और वैज्ञानिक सोच को आम जनता की भाषा में पहुंचाने का लगातार प्रयास किया।
उनकी वसीयत उनके इसी वैज्ञानिक और तर्कप्रधान दृष्टिकोण की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति थी। उन्होंने मृत्यु के बाद अपने लिए धार्मिक कर्मकांड और उन संबोधनों से बचने की इच्छा व्यक्त की, जिन पर उनका विश्वास नहीं था। उनका जीवन और उनकी वसीयत इस बात के प्रमाण थे कि वे जिस विचार की बात करते थे, उसे अपने निजी जीवन में भी उतारने का प्रयास करते थे।
दुनिया को देखने निकला एक भारतीय चिंतक :
भारती जी का चिंतन केवल स्थानीय या राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं था। सांसद रहते हुए उन्होंने अपने निजी संसाधनों से रूस, जापान, अमेरिका, इजरायल, इंग्लैंड और जर्मनी सहित अनेक देशों की यात्राएं कीं।
इन यात्राओं का उद्देश्य पर्यटन या विलासिता नहीं था। वे विभिन्न देशों की कृषि व्यवस्था, औद्योगिक विकास, सिंचाई, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रगति को समझना चाहते थे।
उनकी यात्राओं की एक विशेषता यह भी थी कि वे स्थानीय जीवन को करीब से देखने में विश्वास रखते थे। किसानों और ग्रामीण परिवारों के बीच रहकर वे उनकी जीवनशैली, समस्याओं और उत्पादन व्यवस्था को समझने का प्रयास करते थे।
भारत लौटकर उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर कृषि और औद्योगिक विकास के संबंध में सरकार को सुझाव दिए। उनका विश्वास था कि भारत की प्रगति का रास्ता गांवों, किसानों, आधुनिक कृषि और वैज्ञानिक तकनीक से होकर गुजरता है।
किसान और कृषि उनके चिंतन के केंद्र में :
भारती जी अखिल भारतीय हिन्द किसान पंचायत के अध्यक्ष भी रहे। कृषि, सिंचाई, किसानों की समस्याएं और ग्रामीण आत्मनिर्भरता उनके प्रमुख सरोकारों में शामिल थे।
वे किसान को केवल वोट बैंक के रूप में देखने के विरुद्ध थे। उनके लिए किसान देश की अर्थव्यवस्था की आधारशिला था। उनका जोर इस बात पर था कि किसान को आधुनिक ज्ञान, वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों और बेहतर सिंचाई व्यवस्था से जोड़ा जाए।
आज जब कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, लागत, बाजार, तकनीक और किसानों की आय जैसे अनेक प्रश्नों से जूझ रहा है, तब कृषि को वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की उनकी सोच विशेष रूप से महत्वपूर्ण प्रतीत होती है।
कलम को बनाया जनजागरण का हथियार :
महाराज सिंह भारती का व्यक्तित्व केवल राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था। वे गंभीर अध्येता और विपुल लेखक भी थे।
धर्म, समाज, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, विज्ञान, कृषि और समाजवाद जैसे विविध विषयों पर उन्होंने लेखन किया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘सृष्टि और प्रलय’, ‘ईश्वर की खोज’, ‘धर्म का धंधा’, ‘भारत का नियोजित दिवाला’, ‘ब्राह्मणवाद की शव परीक्षा’, ‘नारी का उत्थान और पतन’, ‘जाति तोड़ो समाज जोड़ो’, ‘गन्ना-चीनी समस्या और समाधान’ तथा ‘समाजवाद : दर्शन व आचरण’ जैसी पुस्तकें उल्लेखनीय हैं।
उनके लेखन की खासियत यह थी कि वे कठिन विषयों को आम जनता के बीच ले जाना चाहते थे। विज्ञान उनके लिए केवल प्रयोगशाला की चीज नहीं था; वह सामाजिक मुक्ति का माध्यम भी था।
वे विज्ञान की नई खोजों के प्रति जीवन के अंतिम दिनों तक उत्सुक रहे। विज्ञान संबंधी पत्रिकाओं का अध्ययन उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। उनके लिए ज्ञान कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि निरंतर आगे बढ़ने वाली यात्रा थी।
‘सादा जीवन, उच्च विचार’ का जीवंत उदाहरण :
भारती जी का जीवन उनके विचारों और आचरण के बीच सामंजस्य का उदाहरण था। वे सादगी में विश्वास करते थे। राजनीतिक जीवन में रहते हुए भी उन्होंने व्यक्तिगत वैभव और सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता नहीं दी।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि किसी विचारधारा की वास्तविक शक्ति भाषणों में नहीं, बल्कि उसके अनुयायी के आचरण में दिखाई देती है। वे जिन मूल्यों की बात करते थे—समानता, सादगी, तर्क, वैज्ञानिकता और मानवता—उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी करते थे।
विरासत आज भी जीवित है :
14 सितंबर 1995 को महाराज सिंह भारती का निधन हुआ। भौतिक रूप से वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार आज भी सामाजिक चेतना के क्षेत्र में उपस्थित हैं।
उनकी विरासत किसी एक राजनीतिक दल, संगठन या समुदाय तक सीमित नहीं है। उनकी सबसे बड़ी विरासत वह प्रश्नाकुलता है, जो मनुष्य को हर रूढ़ि और अंधविश्वास पर सवाल उठाना सिखाती है। उनकी सबसे बड़ी विरासत वह वैज्ञानिक दृष्टि है, जो किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करती कि वह परंपरा से चली आ रही है।
आज के समय में जब सूचना की बाढ़ के साथ-साथ भ्रामक धारणाएं भी तेजी से फैल रही हैं, तब विवेक, तर्क और वैज्ञानिक चेतना की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। जाति और सामाजिक असमानता के प्रश्न भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे समय में भारती जी का चिंतन हमें अपने समाज को नए सिरे से देखने की प्रेरणा देता है।
स्मृति को संकल्प में बदलने की जरूरत :
महापुरुषों की पुण्यतिथि केवल माल्यार्पण और श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके विचारों को समझना और उन्हें वर्तमान सामाजिक संदर्भ में लागू करना ही वास्तविक श्रद्धांजलि है।
महाराज सिंह भारती को याद करने का अर्थ है—
अंधविश्वास के स्थान पर विज्ञान को चुनना, भेदभाव के स्थान पर समानता को चुनना, निराशा के स्थान पर तर्क और विवेक को चुनना और व्यक्तिगत स्वार्थ के स्थान पर सामाजिक सरोकार को महत्व देना।
उन्होंने जिस जागरूक, वैज्ञानिक और समानतामूलक समाज का सपना देखा था, वह अभी पूर्ण नहीं हुआ है। इसलिए उनकी स्मृति हमारे लिए अतीत का गौरव भर नहीं, बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी भी है।
चौधरी महाराज सिंह भारती का जीवन हमें बताता है कि परिवर्तन के लिए बड़ी कुर्सी से अधिक बड़ा विचार जरूरी है। उन्होंने सत्ता से अधिक सिद्धांतों को महत्व दिया और सुविधा से अधिक संघर्ष को चुना।
उनकी 31वीं पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके विचारों की मशाल को बुझने न दें—उसे वैज्ञानिक चेतना, सामाजिक समानता और मानवतावाद की रोशनी के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाएं।
महामना चौधरी महाराज सिंह भारती का जीवन समाप्त हुआ, लेकिन उनके प्रश्न आज भी जीवित हैं—और जब तक समाज में अंधविश्वास, असमानता और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष जारी रहेगा, उनके विचार भी प्रासंगिक बने रहेंगे।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
कृपया कमेंट बॉक्स में कोई भी स्पैम लिंक न डालें - शंखनाद