राजा बाबू’ ने बदल दी बिहार की शिक्षा की तस्वीर......

*** संकुल शिक्षा प्रणाली के जनक डॉ. रामराज सिंह की कहानी

*** किसान के घर से अमेरिका तक, फिर सत्ता छोड़ गांव-गांव शिक्षा और जनसेवा की अलख
आलेख: राकेश बिहारी शर्मा, शिक्षाविद व साहित्यकार 

जिस व्यक्ति के पास सत्ता थी, उसने सादगी चुनी; जिसके पास विदेश की ऊंची डिग्री थी, उसने गांव के बच्चों को पढ़ाने को अपना धर्म माना; और जिसे राजनीति ने विधायक व मंत्री बनाया, उसने राजनीति को कभी ऐशो-आराम का जरिया नहीं बनने दिया। नालंदा की धरती ने ऐसे ही कर्मयोगी को जन्म दिया था—डॉ. राम राज सिंह,  जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से ‘राजा बाबू’ कहते थे।
आज उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक पूर्व मंत्री या विधायक को याद करना नहीं है। यह उस दौर को याद करना है, जब राजनीति में सादगी, शिक्षा, सामाजिक सरोकार और जनसेवा जैसे शब्द केवल भाषणों का हिस्सा नहीं, बल्कि कुछ जनप्रतिनिधियों के जीवन का हिस्सा हुआ करते थे। बिहार की शिक्षा व्यवस्था में ‘संकुल शिक्षा प्रणाली’ की पहल से जुड़ा डॉ. राम राज सिंह का नाम इसी विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।

किसान परिवार का बेटा, बना शिक्षा का बड़ा चेहरा:

डॉ. राम राज सिंह का जन्म 2 अक्टूबर 1921 को नालंदा जिले के चंडी प्रखंड के बोधिविगहा गांव में किसान रामविसुन महतो के घर हुआ। गांव से सटे महमदपुर प्राथमिक विद्यालय से उनकी प्रारंभिक शिक्षा शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने नालंदा कॉलेज से मैट्रिक और पटना विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा हासिल की। महज 21 वर्ष की उम्र में उनका विवाह सुमित्रा देवी से हुआ। उनके दो पुत्र—अनिल सिंह और सुनील कुमार सिंह—और दो पुत्रियां हुईं। ज्येष्ठ पुत्र अनिल सिंह ने आगे चलकर अपने पिता की सामाजिक और राजनीतिक विरासत को संभालने का प्रयास किया।

आजादी की लड़ाई से अमेरिका तक का सफर:

देश जब स्वतंत्रता आंदोलन की आग में तप रहा था, तब डॉ. राम राज सिंह भी इससे अछूते नहीं रहे। 1946 में वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। आंदोलन के दौरान पुलिस की नजरों से बचते हुए वे लाहौर पहुंचे और वहां क्रिश्चियन कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1950 में वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए और 1955 में वाशिंगटन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। उनके व्यक्तित्व और कार्यों की सराहना विदेशी विद्वान डॉ. राबर्ट जे. थियोडोरेट ने भी की थी।
अमेरिका से लौटने के बाद जमशेदपुर स्थित अमेरिकी कंपनी ‘काईजर्स इंजीनियर्स’ में उन्हें फोरमैन की नौकरी मिली। लेकिन समाज के वंचित, दलित और शोषित वर्ग की पीड़ा ने उन्हें बेचैन किया। अंततः उन्होंने नौकरी की राह छोड़ सामाजिक और राजनीतिक सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाया।

लोहिया-जेपी की विचारधारा से विधानसभा तक:

डॉ. राम राज सिंह स्वतंत्रता आंदोलन के साथ समाजवादी आंदोलन से भी जुड़े रहे। लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं से उनके वैचारिक संबंध रहे।
वर्ष 1962 में चंडी विधानसभा क्षेत्र से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में वे पहली बार विधायक बने। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और 1967, 1968, 1971 तथा 1980 में भी चंडी से निर्वाचित हुए। वर्ष 1980 की उनकी जीत विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उनकी राजनीति का आधार केवल चुनाव नहीं था। जनसंपर्क, सहज व्यवहार और लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता ने उन्हें जनता के बीच अलग पहचान दी।

1973 में शिक्षा मंत्री बने, तो शुरू हुई नई पहल:

डॉ. राम राज सिंह के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था 1973 में बिहार का शिक्षा मंत्री बनना। उन्होंने शिक्षा को महज विद्यालय की चारदीवारी या सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं माना। उनका विश्वास था कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है। इसी सोच से जुड़ी उनकी चर्चित पहल थी—‘संकुल शिक्षा प्रणाली’। इस व्यवस्था का उद्देश्य आसपास के विद्यालयों के शिक्षकों, संसाधनों और शैक्षणिक सुविधाओं को आपस में जोड़कर उनका बेहतर उपयोग करना था, ताकि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के बच्चों को भी बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सके।
उनका मानना था कि यदि प्राथमिक शिक्षा की नींव मजबूत नहीं होगी तो भविष्य में सामाजिक समस्याएं और गंभीर होंगी। इसी कारण उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में संसाधनों के बेहतर उपयोग और विकेंद्रीकरण पर जोर दिया। शिक्षा संसाधनों को लेकर तत्कालीन प्रशासनिक स्तर पर मतभेद भी सामने आए। कहा जाता है कि उन्होंने ग्रामीण बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता देने के पक्ष में दृढ़ता से अपनी बात रखी। उनके शिक्षा संबंधी विचारों का प्रभाव बिहार से बाहर भी पड़ा और शिक्षा के विकेंद्रीकरण तथा विद्यालयी संसाधनों के बेहतर उपयोग पर चर्चा हुई। 

मंत्री थे, मगर ठाठ-बाट से दूर:

डॉ. राम राज सिंह की पहचान केवल शिक्षा सुधारक के रूप में नहीं, बल्कि उनकी सादगी के कारण भी थी। वे सत्ता को सुविधा और वैभव का साधन नहीं, जनसेवा की जिम्मेदारी मानते थे। उनका रहन-सहन सामान्य गृहस्थ जैसा था और गांव से उनका गहरा लगाव था। बताया जाता है कि भुंजा जैसे सामान्य ग्रामीण भोजन के वे विशेष शौकीन थे। निजी कार्यों में सरकारी वाहन अथवा सरकारी संसाधनों के उपयोग से बचने की उनकी प्रवृत्ति उनके सार्वजनिक जीवन की सादगी और नैतिकता को दर्शाती थी।
जब शिक्षा मंत्री खुद बन गए शिक्षक!
डॉ. राम राज सिंह के लिए शिक्षा सिर्फ सरकारी आदेशों का विषय नहीं थी। वे जानना चाहते थे कि सरकार की नीतियां स्कूल और बच्चों तक वास्तव में पहुंच भी रही हैं या नहीं। इसीलिए उनके बारे में अनेक प्रसंग मिलते हैं कि वे बिना पूर्व सूचना के ग्रामीण और सुदूर प्राथमिक विद्यालयों का निरीक्षण करने पहुंच जाते थे।
एक प्रसंग के अनुसार, नालंदा के एक ग्रामीण विद्यालय में निरीक्षण के दौरान उन्होंने देखा कि शिक्षक बच्चों को गणित का एक सूत्र समझाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। उन्होंने शिक्षक को डांटने के बजाय खुद ब्लैकबोर्ड संभाला और बच्चों को सरल तरीके से पाठ समझाया। जाते समय उन्होंने शिक्षक को बच्चों को पढ़ाना साधना बताते हुए कठिनाई होने पर मार्गदर्शन लेने की बात कही। यह प्रसंग उनके शिक्षा-दर्शन की एक खास तस्वीर सामने रखता है—गलती पर केवल सजा नहीं, सुधार का अवसर।

सामाजिक सद्भाव के लिए खुद मैदान में उतरते थे:

कबीर और गांधी के विचारों से प्रभावित डॉ. राम राज सिंह सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों के पक्षधर माने जाते थे। एक प्रसंग के अनुसार, चंडी क्षेत्र में दो समुदायों के बीच तनाव पैदा होने पर वे स्वयं लोगों के बीच पहुंचे। दोनों पक्षों से संवाद किया और स्थिति को शांत करने का प्रयास किया। उनका मानना था कि किसी भी संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान समाज के बच्चों और उनके भविष्य को होता है।
उनके लिए नेता का काम केवल नीतियां बनाना नहीं, बल्कि यह देखना भी था कि वे नीतियां जमीन पर किस रूप में उतर रही हैं।
ग्रामीण बच्चों के लिए उच्च शिक्षा का सपना:
डॉ. राम राज सिंह मानते थे कि ग्रामीण समाज के वास्तविक उत्थान की कुंजी शिक्षा में है। विशेषकर उच्च शिक्षा के अवसर गांवों और पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचाना उनके प्रमुख उद्देश्यों में था। उनके इसी सपने को आगे बढ़ाने का प्रयास उनके ज्येष्ठ पुत्र अनिल सिंह ने किया। वर्ष 1983 में उनके द्वारा महाविद्यालय, चंडी की आधारशिला रखे जाने की बात कही जाती है।
इसका उद्देश्य नालंदा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र-छात्राओं को अपने क्षेत्र में ही उच्च शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना था। यह पहल डॉ. राम राज सिंह के उस सपने की निरंतरता के रूप में देखी जाती है, जिसमें शिक्षा को ग्रामीण विकास और सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम माना गया था।

4 दिसंबर 1982: अचानक थम गई ‘राजा बाबू’ की यात्रा:

4 दिसंबर 1982 को लोकप्रिय विधायक और जननेता डॉ. राम राज सिंह का आकस्मिक निधन हो गया। एक ऐसे व्यक्ति की जीवन-यात्रा अचानक समाप्त हो गई, जिसने किसान परिवार से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, लाहौर और अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल की, राजनीति में आया, विधायक और शिक्षा मंत्री बना और फिर अपनी पहचान सादगी तथा जनसेवा से बनाई। उनके निधन पर उनके अनन्य मित्र और पूर्व मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र ने उन्हें कांग्रेस पार्टी का प्रबल समर्थक और बड़ा राजनेता बताते हुए शोक व्यक्त किया था।
नाम नहीं, एक विचार हैं डॉ. राम राज सिंह:
डॉ. राम राज सिंह का जीवन यह संदेश देता है कि किसी व्यक्ति की महानता केवल उसके पद में नहीं, बल्कि उसके कर्म और समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता में होती है। उन्होंने राजनीति को जनसेवा से जोड़ा, शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना, ग्रामीण बच्चों के लिए बेहतर शैक्षणिक अवसरों की पैरवी की और सत्ता में रहते हुए भी सादगी को जीवन का आधार बनाए रखा।
नालंदा की धरती से निकला यह व्यक्तित्व आज भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उनकी कहानी केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह उस सवाल से भी जुड़ी है कि क्या शिक्षा सचमुच समाज के अंतिम बच्चे तक पहुंच रही है और क्या सार्वजनिक जीवन अब भी जनसेवा की कसौटी पर खरा उतर सकता है? डॉ. राम राज सिंह की जयंती इसी सवाल को फिर सामने लाती है। ‘राजा बाबू’ चले गए, लेकिन शिक्षा, सादगी, सामाजिक समरसता और जनसेवा की उनकी विरासत आज भी जीवित है।

ऐसे महान शिक्षाविद्, जननेता और समाजसेवी को जयंती पर शत-शत नमन।

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