गयाजी पितृपक्ष मेला : पितृऋण, पुत्रधर्म और सनातन स्मृति का महापर्व

लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा

भूमिका : जहाँ स्मृतियाँ पिंड का आकार लेती हैं
भारत केवल पर्व-त्योहारों का देश नहीं है; यह स्मृतियों को संस्कार में और संस्कारों को जीवन-दर्शन में बदल देने वाली सभ्यता का देश है। यहाँ मनुष्य का संबंध केवल अपने वर्तमान से नहीं, बल्कि अतीत की उन अनगिनत पीढ़ियों से भी माना जाता है, जिनके श्रम, त्याग, संस्कार और जीवन-संघर्षों ने वर्तमान पीढ़ी के लिए जीवन की भूमि तैयार की है। इसी गहन कृतज्ञता-बोध का नाम है-पितृपक्ष।
पितृपक्ष में व्यक्ति अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करता है, उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करता है तथा यह स्वीकार करता है कि मनुष्य अकेला नहीं है; उसके अस्तित्व के पीछे एक पूरी वंश-परंपरा खड़ी है। बिहार का गयाजी इस भाव को सबसे विराट और जीवंत रूप प्रदान करता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष के दौरान गयाजी देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का आध्यात्मिक केंद्र बन जाता है। बिहार पर्यटन के अनुसार गयाजी में पिंडदान के लिए 48 प्रमुख वेदियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, पंचतीर्थ और सीता कुण्ड प्रमुख हैं।
यहाँ आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल एक धार्मिक कर्मकांड पूरा करने नहीं आता। वह अपने साथ लेकर आता है—अपने पिता की स्मृति, माता की ममता, दादा-दादी की कहानियाँ, अपने कुल की परंपरा और उन चेहरों की अनकही यादें, जिन्हें समय ने भले ही हमसे दूर कर दिया हो, किंतु स्मृति ने आज भी हमारे भीतर जीवित रखा है। इसीलिए गयाजी का पितृपक्ष मेला वस्तुतः मृत्यु का नहीं, स्मृति और निरंतरता का उत्सव है।

पितृपक्ष : श्रद्धा से स्मृति तक :
‘श्राद्ध’ शब्द की मूल चेतना ही ‘श्रद्धा’ से जुड़ी है। अर्थात् अपने पूर्वजों के प्रति विश्वास, सम्मान, कृतज्ञता और आत्मीयता का भाव। भारतीय परंपरा में पितरों के प्रति यह सम्मान कोई आकस्मिक धार्मिक विधान नहीं है; यह उस सामाजिक दर्शन का हिस्सा है जिसमें मनुष्य स्वयं को परिवार, कुल, समाज और प्रकृति की व्यापक श्रृंखला का एक अंग मानता है।
बिहार पर्यटन और भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार पितृपक्ष 16 दिनों की वह अवधि है जिसमें पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। गयाजी में फल्गु नदी के तट और विष्णुपद मंदिर सहित अनेक पवित्र स्थलों पर इन अनुष्ठानों की परंपरा चली आ रही है।
पितृपक्ष में सामान्यतः मांगलिक उत्सवों से विरत होकर मनुष्य अपने भीतर की ओर लौटता है। विवाह, गृहप्रवेश जैसे उत्सव जहाँ जीवन की नवीन शुरुआत के प्रतीक हैं, वहीं पितृपक्ष हमें अपने जीवन की उस जड़ की ओर देखने का अवसर देता है, जहाँ से हमारी यात्रा आरंभ हुई। एक ओर नवजीवन का उत्सव है, दूसरी ओर पूर्वजों की स्मृति का अनुशीलन। यही भारतीय जीवन-दर्शन का अद्भुत संतुलन है।

गयाजी : जहाँ फल्गु के तट पर उतरती है पीढ़ियों की स्मृति :

गयाजी की धार्मिक प्रतिष्ठा अत्यंत प्राचीन है। रामायण और महाभारत से जुड़ी परंपराएँ गया को पितृकर्म की पवित्र भूमि के रूप में स्मरण करती हैं। लोकमान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी यहाँ अपने पिता दशरथ के लिए पिंडदान किया था। गयाजी की धार्मिक परंपरा में सीता पिंडदान की कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। बिहार पर्यटन की आधिकारिक सामग्री इन परंपराओं का उल्लेख करती है। गयाजी की पवित्रता केवल आख्यानों तक सीमित नहीं है। फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अक्षयवट इसकी धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान के प्रमुख केंद्र हैं। विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न माने जाने वाले पवित्र पदचिह्न प्रतिष्ठित हैं। वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण अठारहवीं शताब्दी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया था। फल्गु के तट पर बैठा हुआ व्यक्ति जब अपने पितरों के नाम से पिंड अर्पित करता है, तो वह वस्तुतः एक अदृश्य संवाद करता है—अपने अतीत के साथ। वह संवाद शब्दों में नहीं होता। वह संवाद जल, तिल, कुश, पिंड और अश्रुओं की भाषा में होता है।

पुत्र और पितृऋण : भारतीय चिंतन की एक महत्वपूर्ण अवधारणा :

भारतीय परिवार-व्यवस्था में पुत्र को परंपरागत रूप से वंश की निरंतरता और पितृकर्म के निर्वाह से जोड़ा गया है। इसी संदर्भ में संस्कृत परंपरा में ‘पुत्र’ की व्युत्पत्ति को उस संतान के रूप में समझाया गया है जो पिता को ‘पु’ नामक नरक से उबारती है। यह व्युत्पत्ति धार्मिक-सांस्कृतिक व्याख्या है, आधुनिक जैविक या सामाजिक परिभाषा नहीं। वास्तव में भारतीय परंपरा में पुत्रधर्म का मूल केवल जन्म-संबंध नहीं, बल्कि कर्तव्य और संस्कार है। जीते-जी माता-पिता की सेवा करना, उनके वचनों का सम्मान करना, परिवार की मर्यादा को बनाए रखना और उनके देहावसान के बाद पितृकर्म करना—इन सभी को पुत्रधर्म की व्यापक अवधारणा में देखा गया है। इसीलिए हमारे लोकजीवन में कहा गया-“संतान वही, जो संस्कारों की ज्योति को आगे ले जाए।”
आज के समय में ‘पुत्र’ शब्द को केवल पुरुष संतान तक सीमित करके देखना इस परंपरा की मूल नैतिक भावना को संकुचित कर देना होगा। भारतीय धार्मिक परंपराओं में परिस्थितियों के अनुसार अन्य निकट संबंधियों द्वारा भी श्राद्ध-पिंडदान करने की मान्यताएँ मिलती हैं। इसलिए मूल प्रश्न केवल यह नहीं कि कर्म कौन कर रहा है; मूल प्रश्न यह है कि श्रद्धा और उत्तरदायित्व के साथ कौन अपने पूर्वजों को स्मरण कर रहा है।

मनुस्मृति और पुत्र की अवधारणा :

धर्मशास्त्रीय साहित्य में पुत्र के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति में बारह प्रकार के पुत्रों का वर्णन है—औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम, गूढ़ोत्पन्न, अपविद्ध, कानीन, सहोढ़, क्रीत, पुनर्भव, स्वयंदत्त और शौद्र/पारशव आदि के पाठांतर विभिन्न संस्करणों में मिलते हैं। यह सूची अपने समय की सामाजिक और पारिवारिक संरचना को समझने में महत्वपूर्ण है। इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में पुत्र की अवधारणा केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं थी; उसके सामाजिक, पारिवारिक और उत्तराधिकार संबंधी अनेक आयाम थे। महाभारत में भी पुत्र और पितृकर्म का संबंध अनेक प्रसंगों में दिखाई देता है। गया जाकर श्राद्ध और पिंडदान करने की लोक-आस्था ने इस विचार को जनमानस में और अधिक गहरा किया। लेकिन इन सभी परंपराओं का आधुनिक अर्थ निकालते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्राचीन सामाजिक विधान अपने समय और संदर्भ में बने थे। आज उनका मूल्यांकन समानता, मानवीय गरिमा और पारिवारिक उत्तरदायित्व के आधुनिक दृष्टिकोण के साथ किया जाना चाहिए।

पितृपक्ष और पुत्र : रक्त से अधिक संस्कार का संबंध :

हमारे लोकजीवन में एक पुत्र से सबसे बड़ी अपेक्षा यह रही है कि वह परिवार की प्रतिष्ठा, संस्कार और मानवीय मूल्यों को आगे बढ़ाए। वह केवल ‘कुल का वाहक’ न बने, बल्कि कुल के संस्कारों का संवाहक बने। किसी घर की वास्तविक समृद्धि उसकी संपत्ति में नहीं, उसकी संतानों के संस्कार में दिखाई देती है। इसलिए यह कहना अधिक समीचीन होगा कि- पुत्र वह नहीं जो केवल वंश बढ़ाए; पुत्र वह है जो वंश के मूल्यों को बढ़ाए। आज जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, प्रवास बढ़ रहा है और जीवन की गति पहले से कहीं अधिक तेज हो गई है, तब पितृपक्ष हमें ठहरकर अपने अतीत को देखने का अवसर देता है। हम अपने बच्चों से पूछ सकते हैं— हमारे दादा कौन थे? हमारी दादी कैसी थीं? हमारे पूर्वज कहाँ से आए थे? उन्होंने किन कठिनाइयों का सामना किया? उन्होंने हमारे लिए क्या छोड़ा? इन प्रश्नों के उत्तर ही किसी परिवार की मौखिक इतिहास-परंपरा बनाते हैं।

जीवित्पुत्रिका : मातृ-तपस्या का लोकपर्व :

पितृपक्ष के आसपास आने वाला जीवित्पुत्रिका अथवा जिउतिया व्रत भी संतान और परिवार के प्रति भारतीय भाव-जगत की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश तथा नेपाल के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित यह व्रत मुख्यतः माताएँ अपनी संतान के दीर्घ जीवन, स्वास्थ्य और मंगल की कामना से करती हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार यह व्रत तीन दिनों की परंपरा से जुड़ा है और इसमें निर्जल उपवास, पूजा तथा पारंपरिक आहार की लोकपरंपराएँ शामिल हैं। इस व्रत की कथा जीमूतवाहन से जुड़ी है—त्याग, करुणा और परोपकार की कथा। लोकविश्वास ने इस कथा को मातृत्व की आकांक्षा के साथ जोड़कर इसे एक व्यापक लोकपर्व का स्वरूप प्रदान किया। जिउतिया का मूल संदेश केवल पुत्र की दीर्घायु की कामना नहीं है। इसके भीतर माता की वह तपस्या छिपी है, जो अपनी संतान के लिए स्वयं कष्ट सहने को भी तैयार रहती है। इस अर्थ में पितृपक्ष का यह काल हमें परिवार के दो छोरों से जोड़ता है- पितरों की स्मृति और संतानों के भविष्य से। एक ओर हम उन लोगों को याद करते हैं जो हमें छोड़कर जा चुके हैं, दूसरी ओर आने वाली पीढ़ी के लिए मंगल की कामना करते हैं। यही तो जीवन की निरंतरता है।

लोकभोजन में भी छिपी है संस्कृति :

जिउतिया और अन्य लोकपर्वों से जुड़े खाद्य पदार्थ भी केवल भोजन नहीं होते। वे किसी समाज की जलवायु, कृषि, स्थानीय वनस्पतियों और पारिवारिक परंपराओं के दस्तावेज होते हैं। मड़ुआ की रोटी, विभिन्न प्रकार के साग, स्थानीय सब्जियाँ और पारंपरिक व्यंजन पीढ़ियों से चले आ रहे ग्रामीण जीवन की स्मृति को संजोए हुए हैं। आज जब बाजार-आधारित भोजन संस्कृति तेजी से पारंपरिक खान-पान को विस्थापित कर रही है, तब ऐसे पर्व हमें यह याद दिलाते हैं कि भोजन भी संस्कृति की भाषा है। किस खेत में क्या उपजा, किस मौसम में क्या खाया गया, किस पर्व पर कौन-सा पकवान बना—इन सबके भीतर एक समाज का पूरा सांस्कृतिक इतिहास छिपा रहता है।

गयाजी का मेला : धर्म के साथ लोकजीवन का विराट समागम :

पितृपक्ष के दिनों में गयाजी केवल तीर्थ नहीं रहती; वह एक विशाल सांस्कृतिक परिसर में बदल जाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आते हैं। अलग-अलग भाषाएँ सुनाई देती हैं। अलग-अलग वेशभूषाएँ दिखाई देती हैं। कहीं कोई अपने पिता के लिए पिंडदान कर रहा होता है, कहीं कोई अपनी माता को स्मरण कर रहा होता है, कहीं कोई अपने दादा-दादी के नाम तर्पण कर रहा होता है। पंडा समाज की परंपरा, स्थानीय बाजार, पूजा-सामग्री, आवागमन, धर्मशालाएँ, भोजनालय, लोकव्यवसाय और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ—सब मिलकर पितृपक्ष को एक विशाल सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन बना देते हैं। इस दृष्टि से पितृपक्ष मेला धार्मिक पर्यटन से कहीं आगे बढ़कर स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार पर्यटन की आधिकारिक जानकारी भी पितृपक्ष के दौरान गयाजी में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन और प्रशासन द्वारा आवास, चिकित्सा, भोजन तथा यातायात जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख करती है।

 फल्गु : नदी से अधिक एक सांस्कृतिक स्मृति :

फल्गु नदी गयाजी की आत्मा से जुड़ी हुई है। भारतीय संस्कृति में नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं। वे सभ्यता की स्मृतियाँ हैं। उनके किनारे नगर बसे, संस्कार हुए, यात्राएँ हुईं और पीढ़ियाँ गुजरीं। फल्गु के तट पर पिंडदान करते हुए मनुष्य जल को अर्घ्य देता है, पर उसके भीतर वह अपने पूर्वजों की स्मृति को भी प्रवाहित करता है। फल्गु की धारा हमें यह संदेश देती प्रतीत होती है- जीवन बहता रहता है, लेकिन स्मृतियाँ उसके किनारों पर अंकित रहती हैं। इसीलिए गयाजी में पिंडदान का अनुभव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह जाता; वह व्यक्ति के निजी इतिहास और सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति का मिलन बन जाता है।

अक्षयवट : समय के सामने खड़ा एक प्रतीक :

गयाजी का अक्षयवट भी पितृकर्म की परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। ‘अक्षय’ अर्थात जिसका क्षय न हो—यह नाम ही इसे भारतीय दार्शनिक चेतना में एक गहरा प्रतीक बना देता है। मनुष्य नश्वर है। शरीर नश्वर है। सत्ता नश्वर है। समय सब कुछ बदल देता है। फिर भी मनुष्य अपनी स्मृति के माध्यम से अपने प्रियजनों को अक्षय बनाने का प्रयास करता है। अक्षयवट इसी मानवीय आकांक्षा का सांस्कृतिक प्रतीक माना जा सकता है- नश्वर जीवन में अमर स्मृति की खोज।

आस्था और आधुनिकता का संवाद :

आधुनिक विज्ञान ने मृत्यु, शरीर और जीवन के अनेक रहस्यों को समझने की दिशा में अद्भुत प्रगति की है। फिर भी मनुष्य की भावनात्मक दुनिया में मृत्यु आज भी एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर केवल विज्ञान नहीं दे सकता। विज्ञान हमें मृत्यु की जैविक प्रक्रिया समझा सकता है; लेकिन किसी पिता की मृत्यु के बाद पुत्र के मन में उठने वाली रिक्तता का मापन किसी यंत्र से संभव नहीं। यहीं से संस्कार और आस्था की भूमिका प्रारंभ होती है। श्राद्ध और पिंडदान को वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर ‘आत्मा की मुक्ति’ का सिद्ध तथ्य कहना उचित नहीं होगा। यह धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विश्वास का क्षेत्र है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे अनुष्ठान व्यक्ति को शोक से गुजरने, पूर्वजों को स्मरण करने, परिवार को एकत्र करने और अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से पितृपक्ष की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मानवीय और मनो-सांस्कृतिक भूमिका में भी निहित है।

बदलते समय में पितृपक्ष का संदेश :

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल परंपरा को बचाना नहीं, बल्कि परंपरा के भीतर छिपे मूल संदेश को समझना है। यदि पितृपक्ष केवल कर्मकांड बनकर रह गया, तो उसका सांस्कृतिक प्रभाव धीरे-धीरे कम होगा। लेकिन यदि हम इसे माता-पिता के प्रति सम्मान, वृद्धजनों की सेवा, परिवार की स्मृतियों के संरक्षण, पूर्वजों के जीवन-संघर्षों की जानकारी और अगली पीढ़ी के प्रति उत्तरदायित्व से जोड़ें, तो यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक रहेगी। हमें अपने बच्चों को केवल यह नहीं बताना चाहिए कि पिंडदान कैसे किया जाता है; उन्हें यह भी बताना चाहिए कि जिसके नाम से पिंड दिया जा रहा है, उसने परिवार के लिए क्या किया था। तभी श्राद्ध संस्कार बनेगा। तभी पितृपक्ष स्मृति का पर्व बनेगा। तभी परंपरा जीवन से जुड़ेगी।

पुत्र नहीं, संस्कारवान संतान चाहिए :

हमारे समय की एक बड़ी आवश्यकता यह भी है कि पुत्र की अवधारणा को व्यापक मानवीय अर्थ में समझा जाए। आज बेटी भी माता-पिता के प्रति वही प्रेम, सेवा और उत्तरदायित्व निभा सकती है जो पुत्र निभाता है। अनेक परिवारों में बेटियाँ अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार और श्राद्धकर्म तक की जिम्मेदारी निभा रही हैं। इसलिए आधुनिक समाज में पितृधर्म को केवल लिंग के आधार पर सीमित करना उचित नहीं। भारतीय संस्कृति का मूल संदेश ‘कर्तव्य’ है। इसलिए आज आवश्यकता है— पुत्र हो तो संस्कारवान हो, पुत्री हो तो संस्कारवान हो, संतान कोई भी हो—कर्तव्यनिष्ठ हो। क्योंकि अंततः माता-पिता को अपने जीवन की संध्या में संपत्ति से अधिक आवश्यकता होती है-अपनों के स्नेह और सम्मान की।

गयाजी हमें क्या सिखाती है? :

गयाजी की धरती पर जब कोई पुत्र अपने पिता का पिंडदान करता है, तो वह केवल एक धार्मिक कर्म नहीं करता। वह एक क्षण के लिए समय की गति को उलट देता है। वह अपने वर्तमान से अतीत की ओर लौटता है। वह अपने पिता में अपने दादा को खोजता है। दादा में परदादा को। और धीरे-धीरे उस अनंत श्रृंखला को महसूस करता है, जिसका एक छोटा-सा वर्तमान सिरा वह स्वयं है। यही पितृपक्ष की सबसे बड़ी दार्शनिक शिक्षा है— हम अपने पूर्वजों से अलग नहीं हैं। हम उनकी निरंतरता हैं। और जिस प्रकार हमें अपने पूर्वजों से मिला जीवन आगे मिला है, उसी प्रकार हमें आने वाली पीढ़ी को केवल संपत्ति नहीं, बल्कि संस्कार और स्मृतियाँ भी सौंपनी हैं।

उपसंहार : पिंड में समाई पीढ़ियों की कहानी :

गयाजी का पितृपक्ष मेला भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा का जीवंत दस्तावेज है, जहाँ मृत्यु के पार भी संबंधों की स्मृति बनी रहती है। फल्गु के तट पर अर्पित किया गया पिंड केवल आटे, तिल और जल का संयोजन नहीं; वह भावनाओं का प्रतीक है। उसमें किसी पुत्र की आँखों की नमी है, किसी बेटी की स्मृति है, किसी पत्नी की विरह-वेदना है, किसी परिवार की पीढ़ियों पुरानी कथा है। विष्णुपद के चरणचिह्नों के सामने झुका हुआ मनुष्य अपने अहंकार को छोटा और अपनी परंपरा को बड़ा महसूस करता है। अक्षयवट के नीचे खड़ा व्यक्ति नश्वरता के बीच अक्षय स्मृति का अर्थ समझता है। और फल्गु की ओर देखते हुए उसे शायद यह अनुभव होता है कि— नदी बह जाती है, पीढ़ियाँ बदल जाती हैं, चेहरे मिट जाते हैं; लेकिन प्रेम, कृतज्ञता और स्मृति—यदि संस्कार बन जाएँ—तो पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं। इसलिए गयाजी का पितृपक्ष मेला केवल पितरों के लिए किया जाने वाला अनुष्ठान नहीं है। यह अपने अतीत को प्रणाम करने, वर्तमान को समझने और भविष्य को संस्कारित करने का महापर्व है। यह हमें बताता है कि जिस घर में पूर्वजों की स्मृति जीवित रहती है, वहाँ इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं रहता—वह व्यवहार में उतरता है। और जिस संतान के हृदय में माता-पिता के प्रति श्रद्धा, सेवा और कर्तव्य का भाव जीवित है, वही वास्तव में अपने वंश का सच्चा दीपक है।

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