इतिहास की धूल में दबे अतीत के अनमोल रत्नों का खोजी: तुफैल अहमद खां सूरी

● शेरशाह सूरी की वंशपरंपरा से जुड़े पुरातत्त्ववेत्ता, जिनकी जिंदगी इतिहास की खोज और चंडी-मौ में ग्रामीण संग्रहालय के अधूरे सपने के नाम रही
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव, शंखनाद साहित्यिक मंडली

इतिहास केवल राजाओं के शासन, युद्धों की विजय-पराजय और सत्ता परिवर्तन का लेखा-जोखा नहीं है। इतिहास उन सभ्यताओं की स्मृति भी है, जिन्होंने अपने समय में समाज, संस्कृति, कला, स्थापत्य और ज्ञान-विज्ञान की अमूल्य विरासत छोड़ी। दुर्भाग्यवश, हमारी अनेक ऐतिहासिक धरोहरें आज भी उपेक्षा, अज्ञानता और संरक्षण के अभाव में गुमनामी का जीवन जी रही हैं। ऐसे में कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं और महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर अतीत की इन धरोहरों को खोजने, पहचानने और संरक्षित करने का कठिन संकल्प लेते हैं। तुफैल अहमद खां सूरी ऐसी ही शख्सियत हैं, जिनका जीवन इतिहास के प्रति गहरी अनुरक्ति, पुरातात्त्विक जिज्ञासा और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के संघर्ष की कहानी है।
उनकी पहचान केवल इस पारिवारिक परंपरा से नहीं जुड़ी है कि वे शेरशाह सूरी के सोलहवें वंशज बताए जाते हैं, बल्कि उनकी विशिष्टता इस बात में है कि उन्होंने बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों को खोजने और उन्हें जनसामान्य की स्मृति में प्रतिष्ठित करने के लिए निरंतर प्रयास किया। नालंदा की धरती पर प्राचीन मूर्तियों, ऐतिहासिक स्थलों, मकबरों और पुरातात्त्विक अवशेषों के प्रति उनकी दिलचस्पी ने उन्हें एक अलग पहचान दी। चंडी-मौ गांव में ग्रामीण संग्रहालय बनाने का उनका सपना इस बात का प्रमाण है कि उनके लिए इतिहास केवल अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक संपत्ति था।
लेकिन इस जीवन-कथा का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि धरोहरों को बचाने का सपना देखने वाला व्यक्ति स्वयं अपने सपने को बचाने के लिए संघर्ष करता रह गया। चंडी-मौ में संग्रहालय बनाने के लिए अपनी जमा-पूंजी और श्रम लगा देने के बावजूद उनका सपना पूरा नहीं हो सका। उनकी कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह समाज के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है—क्या ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण केवल कुछ जुनूनी व्यक्तियों की जिम्मेदारी है, या यह सरकार, प्रशासन और समाज का साझा दायित्व भी है?
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि :

तुफैल अहमद खां सूरी का जन्म 1 जुलाई 1961 को बिहारशरीफ के लहेरी मोहल्ले में अनिफ साहब के किराये के मकान में संचालित एक क्लिनिक में हुआ। उनके नाना खान साहेब हकीम यूसुफ हसन खां प्रतिष्ठित हकीम होने के साथ बहुभाषाविद भी बताए जाते हैं। उनके पिता हकीम अब्दुल गफ्फार खां सूरी और माता शमीमा खानम थीं। परिवार की सांस्कृतिक परंपरा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और बौद्धिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परिवार की वंशपरंपरा के अनुसार, तुफैल अहमद खां सूरी स्वयं को शेरशाह सूरी का सोलहवां वंशज बताते हैं। उनके पूर्वज हबीब खां सूरी मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल में बिहार, बंगाल और उड़ीसा के गवर्नर रहे बताए जाते हैं। उनकी पत्नी बीबी रसूलन थीं। पारिवारिक विवरण के अनुसार, हबीब खां सूरी ने बिहारशरीफ की बड़ी दरगाह के तालाब, ईदगाह, पक्के तालाब और मस्जिद जैसे निर्माण कार्यों में योगदान दिया था। बड़ी दरगाह के पश्चिम-दक्षिणी हिस्से में स्थित उनका मकबरा आज भी इस परिवार की ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़ा हुआ है। परिवार के सदस्य आज भी इसी परिसर में दफन किए जाते हैं।
इस वंशावली में हबीब खां सूरी के बाद कबीर खां सूरी, नसीर खां सूरी, महमूद खां सूरी, बुनियाद खां सूरी, आबिद अली खां सूरी, दाऊद खां सूरी, शमशेर अली खां सूरी, मौलवी इलाही बख्श खां सूरी, मुख्तार याकूब खां सूरी और हकीम अब्दुल गफ्फार खां सूरी के नाम आते हैं। इस प्रकार यह परिवार अपनी पीढ़ियों के माध्यम से एक लंबी ऐतिहासिक परंपरा को संजोए हुए है। हालांकि, इस वंशावली और संबंधित ऐतिहासिक पदों की स्वतंत्र अभिलेखीय पुष्टि के लिए दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है।
हकीम अब्दुल गफ्फार खां सूरी और शमीमा खानम के सात पुत्र तथा दो पुत्रियां थीं। सात पुत्रों में सुहैल अहमद खां सूरी, तुफैल अहमद खां सूरी, फुजैल अहमद खां सूरी, शफाअत अहमद खां सूरी, शुजाअत अहमद खां सूरी, इफ्तेखार अहमद खां सूरी और जुल्फकार अहमद खां सूरी शामिल हैं। उनकी दो पुत्रियां मुसर्रत खानम सूरी और अजमत खानम सूरी थीं। तुफैल अहमद खां सूरी अपने पिता के मझले पुत्र हैं।
उनका विवाह गया जिले के डुमरिया के जमींदार शराफत करीम खां की पुत्री हसमत तारा से हुआ। उनके चार पुत्र—डॉ. कफील खां सूरी, कुमैल खां सूरी, इंजीनियर आसिफ खां सूरी और इंजीनियर माज खां सूरी—तथा तीन पुत्रियां शहला नाज सूरी, सनौबर सूरी और निलोफर सूरी हैं।

नाना की विरासत: शिक्षा और सामाजिक सद्भाव की परंपरा :

तुफैल अहमद खां सूरी के व्यक्तित्व की पृष्ठभूमि में उनके नाना खान साहेब हकीम यूसुफ हसन खां का उल्लेख विशेष महत्व रखता है। पारिवारिक विवरण के अनुसार, उन्होंने 1933 में बिहार टाउन हाई स्कूल, बिहारशरीफ की स्थापना की नींव रखी थी। शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उस दौर में महत्वपूर्ण थी, जब आधुनिक शिक्षा का प्रसार सामाजिक परिवर्तन का एक प्रमुख माध्यम बन रहा था।
राजगीर में हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद को सुलझाने में उनकी भूमिका की चर्चा भी मिलती है। बताया जाता है कि ब्रह्मकुंड स्थित ईदगाह तक पहुंचने के लिए अलग-अलग रास्तों की व्यवस्था कर उन्होंने दोनों समुदायों के बीच तनाव कम करने का प्रयास किया। इस योगदान से प्रसन्न होकर अंग्रेजी शासन ने उन्हें ‘खान साहेब’ की उपाधि प्रदान की थी।
इन प्रसंगों का महत्व केवल एक परिवार की प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं है। वे शिक्षा, सामाजिक सद्भाव और संवाद की उस परंपरा की ओर संकेत करते हैं, जिसमें सार्वजनिक जीवन की सार्थकता समाज को जोड़ने और ज्ञान के प्रसार में निहित होती है। तुफैल अहमद खां सूरी की ऐतिहासिक अभिरुचि को इसी व्यापक सांस्कृतिक परिवेश में समझा जा सकता है।
शिक्षा: इतिहास की ओर बढ़ते कदम :

तुफैल अहमद खां सूरी की प्रारंभिक शिक्षा रोहतास जिले के नासरीगंज स्थित पिपरडी प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने बिहारशरीफ के बिहार टाउन हाई स्कूल में अध्ययन किया। इंटरमीडिएट और स्नातक की शिक्षा उन्होंने सरदार पटेल मेमोरियल कॉलेज, उदंतपुरी, बिहारशरीफ से प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने हैदराबाद स्थित मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी से इतिहास विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की।
इतिहास के प्रति उनका आकर्षण केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रहा। ऐतिहासिक स्थलों को देखना, पुरानी इमारतों की बनावट को समझना, बिखरी हुई मूर्तियों की पहचान करना और स्थानीय लोगों से अतीत से जुड़ी जानकारियां जुटाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा बना। इतिहास उनके लिए बीते समय की घटनाओं को याद करने का माध्यम भर नहीं था, बल्कि वर्तमान समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का रास्ता था।

पुरातात्त्विक खोजों में योगदान :

तुफैल अहमद खां सूरी का नाम बिहार के कई ऐतिहासिक स्थलों की खोज और पहचान के प्रयासों से जुड़ा है। उनके कार्यक्षेत्र में चंडी-मौ, राजगीर, केसरिया, पूर्वी चंपारण और सासाराम जैसे स्थानों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्त्ववेत्ता के. के. मुहम्मद के साथ भी विभिन्न स्थलों पर काम किया। उनके कार्यों के विवरण में बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पुरातात्त्विक गतिविधियों से जुड़े रहने की बात भी आती है।
पुरातत्त्व का वास्तविक महत्व केवल जमीन के भीतर से प्राचीन वस्तुएं निकालने में नहीं है। किसी स्थल की ऐतिहासिक पहचान स्थापित करना, उसकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि समझना, अवशेषों का महत्व सामने लाना और उनके संरक्षण की आवश्यकता के प्रति लोगों को जागरूक करना भी इस कार्य का अभिन्न हिस्सा है। तुफैल अहमद खां सूरी की रुचि इसी व्यापक उद्देश्य से जुड़ी दिखाई देती है।
नालंदा जैसे ऐतिहासिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता का महत्व विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए। यह क्षेत्र प्राचीन शिक्षा, बौद्ध परंपरा, धार्मिक सह-अस्तित्व, स्थापत्य और मध्यकालीन इतिहास की अनेक परतों को अपने भीतर समेटे हुए है। यहां गांवों, पुराने धार्मिक स्थलों, मकबरों और उपेक्षित अवशेषों में इतिहास की ऐसी सामग्री मिल सकती है, जो व्यापक शोध के लिए महत्वपूर्ण हो। स्थानीय इतिहास के प्रति उनकी संवेदनशीलता ने ऐसी धरोहरों को देखने का एक अलग दृष्टिकोण प्रदान किया।
हालांकि, उनके नाम से जुड़े प्रत्येक पुरातात्त्विक अन्वेषण, खोज और सरकारी पदस्थापन का विस्तृत विवरण उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर संकलित किया जाना चाहिए, ताकि उनके योगदान का प्रमाणिक और व्यवस्थित दस्तावेज तैयार हो सके।
चंडी-मौ: जहां एक मुसलमान इतिहास-प्रेमी के नाम पर होती है पूजा :

तुफैल अहमद खां सूरी के जीवन का सबसे अनोखा और चर्चित प्रसंग नालंदा जिले के चंडी-मौ गांव से जुड़ा है। यहां एक मंदिर में अन्य प्रतिमाओं के साथ एक पत्थर ‘सूरी बाबा’ के नाम से पूजे जाने की बात सामने आई। बताया जाता है कि यह प्रतीक पत्थर तुफैल अहमद खां सूरी से जुड़ा है, जो इस गांव में भारत का पहला ग्रामीण संग्रहालय स्थापित करने का सपना लेकर पहुंचे थे।
किसी जीवित व्यक्ति के नाम से जुड़े प्रतीक का मंदिर में पूजे जाने का प्रसंग पहली नजर में असाधारण लगता है। लेकिन इसके पीछे की स्थानीय मान्यताओं, सामाजिक स्मृतियों और घटनाक्रम को समझना आवश्यक है। इस प्रसंग का महत्व केवल धार्मिक पहचान में नहीं, बल्कि उस सामाजिक प्रभाव में भी निहित है, जो किसी व्यक्ति के कार्यों के कारण स्थानीय समुदाय के बीच विकसित हो सकता है।
शंखनाद साहित्यिक मंडली के सदस्यों ने इस अनूठे प्रसंग की पड़ताल करने के लिए गांव का दौरा किया था। तत्कालीन जिला भू-अर्जन पदाधिकारी सुबोध कुमार सिंह, सूचना एवं जनसंपर्क पदाधिकारी लालबाबू सिंह और शंखनाद के महासचिव राकेश बिहारी शर्मा इस यात्रा में शामिल थे। गांव पहुंचकर सदस्यों ने मंदिर के दरवाजे पर अन्य मूर्तियों के साथ ‘सूरी बाबा’ के नाम से पूजे जाने वाले पत्थर को देखा।
इस अनुभव ने तुफैल अहमद खां सूरी के व्यक्तित्व के एक दूसरे पक्ष को सामने रखा। वे केवल ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी रखने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक ऐसे स्वप्नद्रष्टा भी थे, जिन्होंने ग्रामीण समाज में इतिहास और पुरातत्त्व के प्रति चेतना पैदा करने का प्रयास किया।

चंडी-मौ में ग्रामीण संग्रहालय का अधूरा सपना :

तुफैल अहमद खां सूरी का सबसे महत्वाकांक्षी सपना चंडी-मौ में एक ग्रामीण संग्रहालय स्थापित करना था। लगभग तीन दशक पहले उन्होंने कल्पना की थी कि गांव में बिखरी पड़ी प्राचीन मूर्तियों, ऐतिहासिक अवशेषों और सांस्कृतिक प्रतीकों को एक स्थान पर सुरक्षित रखा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी ऐतिहासिक विरासत को पहचान सकें।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपनी निजी जमा-पूंजी तक लगा दी। संग्रहालय के लिए भवन तैयार करने की दिशा में काम शुरू हुआ। बिहारशरीफ से चंडी-मौ की लगभग 32 किलोमीटर की दूरी वे साइकिल से तय करते थे। कभी-कभी निर्माण सामग्री जुटाने के लिए नालंदा से साइकिल पर सीमेंट की बोरी लादकर लाते थे। यह श्रम किसी व्यक्तिगत लाभ या आर्थिक प्रतिफल के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसे सांस्कृतिक संस्थान के निर्माण के लिए था, जिसका लाभ पूरे समाज को मिल सकता था।
उनकी योजना केवल एक भवन खड़ा करने तक सीमित नहीं थी। वे गांव और आसपास के क्षेत्रों में घरों तथा अन्य स्थानों पर रखी प्राचीन मूर्तियों की सूची तैयार कर रहे थे। उनके अनुसार, कई ग्रामीण संग्रहालय के लिए मूर्तियां देने को तैयार भी थे। यदि यह योजना साकार होती, तो स्थानीय स्तर पर बिखरी हुई धरोहरों को सुरक्षित रखने, उनके अध्ययन और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बन सकती थी।
लेकिन उनका सपना पूरा नहीं हो सका। उनके विवरण के अनुसार, गांव की सरकारी जमीन को लेकर विवाद और भू-माफियाओं के हस्तक्षेप के कारण उन्हें वहां से हटना पड़ा। इसके साथ ही संग्रहालय की योजना भी बाधित हो गई। इन आरोपों और घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित राजस्व अभिलेखों तथा स्थानीय दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है। फिर भी इस पूरे प्रसंग का मूल प्रश्न अपनी जगह कायम है—यदि किसी व्यक्ति का प्रयास सार्वजनिक विरासत को बचाने के लिए हो, तो क्या प्रशासन और समाज का दायित्व नहीं बनता कि उसे आवश्यक सहयोग और सुरक्षा प्रदान करें?

2015 की मुलाकात: एक खोजी व्यक्तित्व से परिचय :

तुफैल अहमद खां सूरी से शंखनाद के सदस्यों की मुलाकात वर्ष 2015 में हुई थी। इस मुलाकात का माध्यम सुबोध कुमार सिंह बने, जिन्हें सूरी साहब के ऐतिहासिक ज्ञान और कार्यों के बारे में जानकारी मिली थी। वे उन्हें खोजते हुए बिहारशरीफ के कुसुमपुर मोहल्ले स्थित उनके किराये के आवास तक पहुंचे।
इस मुलाकात से जुड़ा अनुराग सिनेमा हॉल का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। सुबोध कुमार सिंह बनौलिया चौक के आसपास काफी देर तक अनुराग सिनेमा हॉल को खोजते रहे, लेकिन उन्हें वह नहीं मिला। अंततः उन्होंने तुफैल अहमद खां सूरी को फोन किया। सूरी साहब कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच गए और उन्होंने सड़क के दाहिनी ओर उस स्थान की ओर संकेत किया, जहां कभी सिनेमा हॉल हुआ करता था।
समय के साथ सिनेमा हॉल ध्वस्त हो चुका था और उसकी जमीन अलग-अलग हिस्सों में बंटकर बिक गई थी। वहां अब कई मकान खड़े थे, लेकिन मोहल्ले की पहचान आज भी अनुराग सिनेमा हॉल के नाम से बनी हुई थी। यह छोटा-सा प्रसंग इतिहास की एक बड़ी सच्चाई उजागर करता है—भवन नष्ट हो सकते हैं, स्थानों का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन समाज की स्मृति में उनके नाम और पहचान लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।
सुधीर नामक पर्यटन डिप्लोमा के एक पूर्व विद्यार्थी ने भी सूरी साहब के ऐतिहासिक ज्ञान का लाभ उठाया था। उन्होंने बिहारशरीफ की पीर पहाड़ी पर स्थित इब्राहिम मलिक बया के मकबरे पर अपनी परियोजना रिपोर्ट तैयार करने में उनसे सहायता प्राप्त की थी। इस अनुभव से उन्हें प्रशंसा मिली। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि स्थानीय इतिहास का जानकार व्यक्ति विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए कितना उपयोगी हो सकता है।

इतिहास-संरक्षण के लिए समाज और प्रशासन आगे आएं :

तुफैल अहमद खां सूरी का जीवन हमें बताता है कि ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए केवल पुस्तकीय ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इसके लिए जमीनी स्तर पर काम करने की इच्छाशक्ति, स्थानीय समुदाय का सहयोग, प्रशासनिक संवेदनशीलता और संस्थागत संरक्षण की आवश्यकता होती है।
चंडी-मौ का अधूरा संग्रहालय आज एक विचारणीय प्रश्न बनकर सामने खड़ा है। क्या वहां उपलब्ध भवन, भूमि, अभिलेखों और मूर्तियों से जुड़ी जानकारी का व्यवस्थित सर्वेक्षण नहीं कराया जा सकता? क्या स्थानीय प्रशासन, पुरातत्त्व विभाग, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संगठनों के सहयोग से इस पहल को नए सिरे से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता? यदि संबंधित स्थल और अवशेष संरक्षण के योग्य पाए जाते हैं, तो उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण तथा सुरक्षित प्रदर्शन की व्यवस्था की जा सकती है।
ऐसी पहल तुफैल अहमद खां सूरी के प्रयासों का सम्मान करने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय शोध और ऐतिहासिक चेतना को भी बढ़ावा दे सकती है। इसके लिए तथ्यों की पुष्टि, भूमि की स्थिति का परीक्षण और विशेषज्ञों की सलाह आवश्यक होगी।
निष्कर्ष: व्यक्ति से बड़ा होता है उसका सपना :

तुफैल अहमद खां सूरी की जीवन-यात्रा इतिहास के प्रति अनुराग, खोज की जिज्ञासा और विरासत को बचाने की प्रतिबद्धता का प्रेरक उदाहरण है। शेरशाह सूरी की वंशपरंपरा से जुड़े होने का पारिवारिक गौरव अपनी जगह है, लेकिन उनकी वास्तविक पहचान उन प्रयासों में निहित है, जिनके माध्यम से उन्होंने बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों को खोजने और उनके महत्व को सामने लाने का काम किया।
उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि इतिहास केवल अतीत की वस्तु नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी भी है। यदि आज हम अपने आसपास बिखरी मूर्तियों, पुराने मकबरों, प्राचीन भवनों और स्थानीय परंपराओं की उपेक्षा करते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझना कठिन हो जाएगा।
चंडी-मौ में ग्रामीण संग्रहालय का उनका सपना भले ही अधूरा रह गया, लेकिन उस सपने की प्रासंगिकता समाप्त नहीं हुई है। जरूरत इस बात की है कि उनके प्रयासों का दस्तावेजीकरण हो, उनके द्वारा पहचाने गए स्थलों और अवशेषों की सूची तैयार की जाए तथा योग्य धरोहरों के संरक्षण के लिए ठोस पहल की जाए।
इतिहास के प्रति समर्पित लोगों का सम्मान केवल प्रशस्ति-पत्रों और अभिनंदन समारोहों से पूरा नहीं होता। उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाना ही सच्ची श्रद्धांजलि है। तुफैल अहमद खां सूरी के जीवन और संघर्ष को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए—एक ऐसे व्यक्ति की कहानी के रूप में, जिसने अतीत की धरोहरों को बचाने का सपना देखा और उस सपने को साकार करने के लिए अपनी शक्ति, समय और संसाधन लगा दिए।
तुफैल अहमद खां सूरी की सबसे बड़ी विरासत केवल उनका वंश-इतिहास नहीं, बल्कि इतिहास को समाज की साझा धरोहर मानने की उनकी सोच है। चंडी-मौ का अधूरा संग्रहालय आज भी इस बात की प्रतीक्षा कर रहा है कि कोई उस सपने को फिर से जीवित करे।

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