डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह एवं डॉ. विश्राम प्रसाद की पुस्तक ‘तंत्रवाद की दार्शनिक भूमि’ का लोकार्पण....


●तंत्रशास्त्र के दार्शनिक आधारों और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने में सहायक होगी पुस्तक
बिहारशरीफ, 25 अक्टूबर 2026 :  भारतीय दर्शन, अध्यात्म और तंत्रशास्त्र को लेकर प्रचलित धारणाओं के बीच उनके मूल दार्शनिक आधारों की पड़ताल करने वाली पुस्तक ‘तंत्रवाद की दार्शनिक भूमि’ का रविवार को बिहारशरीफ के मोगलकुआँ स्थित सागर निकेतन के सभागार में लोकार्पण किया गया। बिहार के चर्चित इतिहासविद्, पुरातत्त्ववेत्ता एवं साहित्यकार प्रोफेसर (डॉ.) लक्ष्मीकांत सिंह और प्रोफेसर (डॉ.) विश्राम प्रसाद द्वारा लिखित इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह में विद्वानों, साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों ने शोधपरक लेखन को भारतीय ज्ञान-परंपरा की गहरी समझ विकसित करने का सशक्त माध्यम बताया।
शंखनाद साहित्यिक मंडली के तत्वावधान में आयोजित समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता मगध मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के प्रोफेसर डॉ. राजीव रंजन ने की, जबकि मंच संचालन चर्चित शायर नवनीत कृष्ण ने किया।
पुस्तक का लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि किसान कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर डॉ. देबांशु कुमार, विशिष्ट अतिथि मगही शोध एवं विकास संस्थान के निदेशक धनंजय श्रोत्रिय, पुस्तक के सहलेखक प्रोफेसर डॉ. विश्राम प्रसाद तथा शंखनाद साहित्यिक मंडली के महासचिव एवं शिक्षाविद् आर.बी. शर्मा ने संयुक्त रूप से किया।
इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत करते हुए तथा पुस्तक का परिचय प्रस्तुत करते हुए साहित्यकार एवं शिक्षाविद् राकेश बिहारी शर्मा ने कहा कि ‘तंत्रवाद की दार्शनिक भूमि’ तंत्रशास्त्र पर आधारित एक अत्यंत दुर्लभ और अनूठी कृति है। इसमें विभिन्न धार्मिक संप्रदायों में प्रचलित तांत्रिक विद्याओं का संकलन और विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक विभिन्न पंथों की तांत्रिक पद्धतियों को एक स्थान पर संकलित करते हुए उनका तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करती है और तंत्रवाद के मूल तत्त्वों को समझने का अवसर प्रदान करती है।
समारोह के मुख्य अतिथि किसान कॉलेज के प्राचार्य डॉ. देबांशु कुमार ने कहा कि डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह पालि भाषा के शिक्षक होने के साथ-साथ इतिहास, भूगोल, पुरातत्त्व और साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में अपने शोधपरक लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कहा कि उदंतपुरी वज्रयान संप्रदाय की ऐतिहासिक तांत्रिक भूमि रही है। ऐसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षेत्र में इस कृति का लोकार्पण अपने आप में विशेष महत्त्व रखता है। उन्होंने लेखकद्वय डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह और डॉ. विश्राम प्रसाद को बधाई देते हुए आशा व्यक्त की कि यह पुस्तक पाठकों, शोधार्थियों और भारतीय दर्शन के अध्येताओं को तंत्रवाद के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य की गंभीरता समझने तथा इस विषय पर नए विमर्श विकसित करने के लिए प्रेरित करेगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. राजीव रंजन ने कहा कि साहित्य ज्ञान और सामाजिक नैतिकता की नींव है। शोधकर्ताओं एवं साहित्यकारों की रचनाओं में बेहतर भविष्य की संभावनाएँ निहित होती हैं। हमारा अनुसंधान, विज्ञान और इतिहास जितना अधिक शोधपरक एवं उत्कृष्ट होगा, देश और समाज का विकास भी उतना ही बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि समाज में फैले निराधार पाखंड और भ्रांतियों को उजागर करने तथा उन्हें दूर करने का मार्ग शोधपरक साहित्य प्रशस्त करता है। उन्होंने इस पुस्तक को अनुसंधान-आधारित महत्त्वपूर्ण कृति बताया।
समारोह के विशिष्ट अतिथि एवं मगही पत्रिका के संपादक धनंजय श्रोत्रिय ने कहा कि ‘तंत्रवाद की दार्शनिक भूमि’ तंत्रशास्त्र के कई बुनियादी तथ्यों से परिचित कराती है। उन्होंने तंत्रशास्त्र के विभिन्न पहलुओं के अध्ययन के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पुस्तक में कुल 315 पृष्ठ हैं। सात भागों में विभाजित इस ग्रंथ में भारत में प्रचलित विभिन्न धार्मिक संप्रदायों की तांत्रिक साधना-पद्धतियों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

पुस्तक के सहलेखक डॉ. विश्राम प्रसाद ने कहा कि यदि मनुष्य के पास पुस्तकें नहीं होतीं, तो उसका व्यक्तित्व और ज्ञान-विकास आज के स्वरूप में संभव नहीं होता। पुस्तकों ने मनुष्य को स्वयं से और अपने समाज से परिचित कराया है। इसलिए मनुष्यता को समझने और उसका परिचय प्राप्त करने के लिए पुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज विद्यार्थियों को ऐसे साहित्य का अध्ययन करना चाहिए, जो उनकी दार्शनिक समझ और तार्किक क्षमता का विस्तार करे। इसके लिए पौराणिक साहित्य के साथ-साथ शोधपरक पुस्तकों का अध्ययन भी जरूरी है।
इस अवसर पर शिक्षक मो. ज़ाहिद हुसैन ने कहा कि इतिहासकार एवं साहित्यकार डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह और डॉ. विश्राम प्रसाद द्वारा लिखित ‘तंत्रवाद की दार्शनिक भूमि’ न केवल तंत्रशास्त्र, बल्कि प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी देने वाली महत्त्वपूर्ण कृति है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक में हिंदू, बौद्ध, जैन और इस्लामी परंपराओं से संबंधित तांत्रिक साधना-पद्धतियों का परिचय प्रस्तुत किया गया है, जो इसे विशिष्ट बनाता है।
प्रोफेसर डॉ. सच्चिदानंद प्रसाद वर्मा ने कहा कि डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह ने इस पुस्तक के माध्यम से इतिहास और भूगोल से संबंधित विभिन्न पहलुओं को सामने लाने का सराहनीय प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि यद्यपि यह पुस्तक आम पाठकों को ध्यान में रखकर लिखी गई है, फिर भी यह गंभीर अध्ययन में रुचि रखने वाले सुधी पाठकों के लिए भी समान रूप से उपयोगी है।
सरदार भाई वीर सिंह ने कहा कि उन्हें पुस्तक को पूरी तरह पढ़ने का अवसर नहीं मिला है, लेकिन इसके कुछ पृष्ठों के अध्ययन से उन्हें लगा कि लेखक डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह और प्रोफेसर (डॉ.) विश्राम प्रसाद ने ‘तंत्रवाद की दार्शनिक भूमि’ के माध्यम से भारतीय तंत्रवाद के इतिहास को प्रस्तुत करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है।
प्रोफेसर डॉ. शकील अहमद अंसारी ने कहा कि तंत्रवाद की दार्शनिक पृष्ठभूमि पर लेखन करना डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह और प्रोफेसर (डॉ.) विश्राम प्रसाद की बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भविष्य में यह पुस्तक संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी सिद्ध होगी और तंत्रवाद के अध्ययन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगी।
समारोह में प्रोफेसर डॉ.कमलेश कुमार, डॉ.सत्यनारायण प्रियदर्शी, साहित्यसेवी धीरज कुमार, अरशद रज़ा, अरुण बिहारी शरण, आनंद बिहारी सहित शहर के अनेक साहित्यप्रेमी, बुद्धिजीवी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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