मौन' हुए आर्थिक सुधारों के जनक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह...!!

●बुलंद भारत के शिल्पकार थे मनमोहन सिंह,
●मनमोहन सिंह ने बदल कर रख दी आर्थिक विकास की धारा
●'हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी'
●पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 92 साल की उम्र में निधन
लेखक :- साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
     
देश में आर्थिक सुधारों के जनक पूर्व प्रधानमंत्री और भारत के प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह का 92 साल की उम्र में गुरुवार की रात निधन हो गया। उन्हें रात 8:06 बजे दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) लाया गया था। वे घर पर बेहोश हो गए थे। उन्हें इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया था, जहां रात 9:51 बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन के साथ ही भारत के राजनीतिक रंगमंच का एक नायाब सितारा सदा के लिए डूब गया है। गरीबी की पृष्ठभूमि में पैदा होकर बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश का लगातार 10 साल तक प्रधानमंत्री बने रहने की मनमोहन सिंह के असाधारण सफर ने इस दौरान कई पड़ाव और मंजिलों को छुआ। डॉ. मनमोहन सिंह ने एक अर्थशास्त्री के रूप में अपने जीवन की शुरुआत की थी। 

डॉ. मनमोहन सिंह के 6 ऐतिहासिक लोकप्रिय कार्य :
 
डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में देश के लिए 6 ऐतिहासिक कार्य किये हैं। जून 1991 में वैश्वीकरण और उदारीकरण, जून 2005 में सूचना का अधिकार, सितंबर 2005 में रोजगार गारंटी योजना, मार्च 2006 में अमेरिका से न्यूक्लियर डील, जनवरी 2009 में पहचान के लिए आधार कार्ड और अप्रैल 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून पास किया। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) 2005 में शुरू किए गए इस अधिनियम ने प्रत्येक ग्रामीण परिवार को 100 दिन के वेतन रोजगार की गारंटी दी, जिससे लाखों लोगों की आजीविका में उल्लेखनीय सुधार हुआ और ग्रामीण बुनियादी ढांचे में वृद्धि हुई। डॉ. मनमोहन सिंह की बातें शांत, परंतु गहरी और प्रभावशाली होती हैं। जब वे बोलते हैं, तो पूरी दुनिया ध्यान से सुनती है।
डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म, शिक्षा और पारिवारिक जीवन :

मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को गुरमुख सिंह और अमृत कौर के घर हुआ था। कम उम्र में ही मनमोहन सिंह ने अपनी मां को खो दिया था। उनके पिता का नाम गुरुमुख सिंह और मां का नाम अमृत कौर था। भारत के विभाजन के बाद, उनका परिवार हल्द्वानी, भारत चला आया। मनमोहन सिंह का पालन-पोषण उनकी नानी ने किया था। डॉ. मनमोहन सिंह की शिक्षा की शुरुआत पंजाब से हुई। उन्होंने 1948 में पंजाब यूनिवर्सिटी से मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद 1952 में पंजाब यूनिवर्सिटी से ही अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन और 1954 में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। मनमोहन सिंह की असाधारण प्रतिभा के कारण उन्हें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका भी मिला, जहां उन्होंने 1957 में इकोनॉमिक ट्रिपोस में प्रथम श्रेणी में डिग्री हासिल की। वर्ष 1962 में वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के नफिल्ड कॉलेज गए जहां अर्थशास्त्र में डी.फिल. की उपाधि हासिल की। उनके शोध का विषय “भारत की व्यापार नीतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन” था। डॉ. मनमोहन सिंह एक ऐसा नाम हैं जो भारत के आर्थिक और राजनीतिक इतिहास में सुनहरे अमिट अक्षरों में दर्ज हो गया है। मनमोहन सिंह ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाया। उनकी विशेषज्ञता जल्द अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक पहुंची और UNCTAD सचिवालय में काम किया।

मनमोहन सिंह और गुरशरण कौर की शादी :

मनमोहन सिंह ने 14 सितंबर 1958 को इतिहास की प्रोफेसर और लेखिका गुरशरण कौर से विवाह किया था। गुरशरण कौर इतिहास की जानी-मानी प्रोफेसर थीं। 1957 में केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब डॉ. मनमोहन सिंह भारत लौटे तो उनके परिवार ने उनकी शादी के लिए रिश्ते देखना शुरू किया और एक समृद्ध परिवार से प्रस्ताव आया। लड़की एजुकेटेड नहीं थी। मनमोहन सिंह ने दहेज लेने से इंकार करते हुए ये स्पष्ट किया "मुझे दहेज नहीं एक पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए।" इस बीच गुरशरण कौर की बड़ी बहन बसंत ने मनमोहन सिंह के बारे में सुना और उनके लिए रिश्ता लेकर आईं। उनकी पहली मुलाकात छत पर हुई, जहां गुरशरण कौर सफेद सलवार-कुर्ते में दिखाई दीं। इतिहास में एमए कर रही गुरशरण को देखकर मनमोहन सिंह ने तुरंत 'हां' कर दी और इस तरह उनके रिश्ते की शुरुआत हुई। गुरशरण कौर मनमोहन सिंह की पत्नी हैं। गुरशरण, एक इतिहास की प्रोफेसर रह चुकी हैं। मनमोहन सिंह और गुरशरण की शादी साल 1958 में हुई थी। गुरशरण का जन्म 13 सितंबर को साल 1937 में ब्रिटिश भारत के जालंधर में हुआ था। उनका पैतृक गांव झेलम जिले, पंजाब, ब्रिटिश भारत का धक्कम था, जो अब पाकिस्तान में है। उनके माता-पिता का नाम सरदार छत्तर सिंह कोहली और सरदारनी भागवंती कौर हैं। उनके पिता सरदार छत्तर सिंह जी बर्मा शैल में एक कर्मचारी थे। गुरशरण की प्राथमिक शिक्षा गुरु नानक कन्या पाठशाला में हुई थी। इसके बाद पटियाला कॉलेज और अमृतसर के खालसा कॉलेज से डिग्री पूरी की। इसके अलावा, गुरशरण को दिल्ली के सिख समुदायों के साथ कीर्तन करने के लिए जाना जाता है। वे ऑल इंडिया रेडियो पर कई कीर्तन और गाने गाया करती थीं। गुरशरण अपने पूरे जीवन में मनमोहन सिंह के प्रति एक समर्पित पत्नी के रूप में जानी गई हैं। मनमोहन सिंह की ओपन हार्ट सर्जरी के दौरान, वे रोजाना गुरुद्वारे जाकर प्रार्थना करती थीं। मनमोहन सिंह की पत्नी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल में भी उनका लंच खुद तैयार करके और पैक करके दिया करती थीं।

मनमोहन सिंह ने देश के कई महत्वपूर्ण पदों पर किया था काम :

1970 और 1980 के दशक के दौरान मनमोहन सिंह ने भारत सरकार में कई प्रमुख पदों पर कार्य किया, जैसे कि मुख्य आर्थिक सलाहकार (1972-1976), रिजर्व बैंक के गवर्नर (1982-1985) और योजना आयोग के प्रमुख (1985-1987)। 1972 में, सिंह वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बने और 1976 में वे वित्त मंत्रालय में सचिव। 1980-1982 में वे योजना आयोग में थे, और 1982 में, उन्हें तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के अधीन भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया गया और 1985 तक इस पद पर रहे। वे 1985 से 1987 तक योजना आयोग (भारत) के उपाध्यक्ष बने। योजना आयोग में अपने कार्यकाल के बाद, वे 1987 से नवंबर 1990 तक जिनेवा, स्विट्जरलैंड में मुख्यालय वाले एक स्वतंत्र आर्थिक नीति थिंक टैंक, साउथ कमीशन के महासचिव थे। मनमोहन सिंह सिंह नवंबर 1990 में जिनेवा से भारत लौट आए और चंद्रशेखर के कार्यकाल के दौरान आर्थिक मामलों पर भारत के प्रधान मंत्री के सलाहकार के रूप में पद संभाला। मार्च 1991 में, वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष बने। इसके बाद वह साल 1995, 2001, 2007, 2013 और 2019 में राज्यसभा के लिए चुने गए। 33 साल तक राज्यसभा के सदस्य रहने के बाद 3 अप्रैल, 2024 को सदन से रिटायर हुए। 1998 से 2004 तक जब भाजपा सत्ता में थी, तब वही राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। 1999 में उन्होंने दक्षिणी दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा के विजय कुमार मल्होत्रा से हार गए। 1991 से 1996 तक प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री रहे। 2004 से लेकर 2014 तक 10 साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे। 2009 में मिली जीत के बाद वे जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने, जिन्हें 5 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार पीएम बनने का मौका मिला।

मनमोहन सिंह की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी :

डॉ. मनमोहन सिंह जी देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री रहे जिनकी कोई सघन राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी। राज्यसभा के सदस्य रहते हुए संप्रग की गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने की उनकी कामयाबी इसका प्रमाण है। वस्तुत: भारतीय राजनीति में मनमोहन सिंह के उदय का श्रेय कांग्रेस के दो बड़े नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को जाता है।

डॉ. मनमोहन सिंह को एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के खिताब मिला :

2004 के आम चुनाव के बाद जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया तो उनके सामने एक ऐसे नेता को यह जिम्मेदारी सौंपने की चुनौती थी जो न केवल इस पद के योग्य हो बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की सर्वोच्चता के लिए कोई खतरा भी न हो। प्रणव मुखर्जी और अर्जुन सिंह जैसे दिग्गजों की दावेदारी के बीच सोनिया ने तब मनमोहन सिंह पर भरोसा किया और प्रधानमंत्री के रूप में अपने संपूर्ण कार्यकाल में उन्होंने इस भरोसे को कोई आंच नहीं आने दी। यही कारण है कि राजनीतिक इतिहास में उन्हें एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के खिताब से भी जाना जाता है।

मनमोहन सिंह ने बदल कर रख दी आर्थिक विकास की धारा :

राजनीति में मनमोहन सिंह का आगमन परिस्थिति जन्य चुनौतियों का परिणाम रहा जब नरसिंह राव ने 1991 में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली तब देश लगभग कंगाली के मुहाने पर था। भारत का अधिकांश सोना विदेश में गिरवी रखा जा चुका था और कर्ज का डिफाल्टर बनने की नौबत थी । ऐसे में राव ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर आइजी पटेल को पहले वित्तमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया मगर उन्होंने इनकार कर दिया तब मनमोहन सिंह को भारत को आर्थिक संकट से निकालने की पेशकश की। इस चुनौती को मनमोहन सिंह ने न केवल स्वीकार किया बल्कि लगभग पांच दशक पुरानी भारत की आर्थिक विकास की धारा को ही पूरी तरह बदल दिया। हालांकि तब भी विपक्ष ने उन पर आक्रमणों की बौछार की मगर नरसिंह राव के योगदान को भी इसलिए नहीं भूला जाएगा क्योंकि उन्होंने अपने वित्तमंत्री रहे मनमोहन सिंह पर लगातार पांच साल तक विश्वास किया।
मनमोहन सिंह 1999 में हार गए थे लोकसभा चुनाव :

देश की राजनीति में मनमोहन सिंह ने निसंदेह अजातशत्रु के तौर पर एक लंबी लकीर खींच दी है लेकिन चुनावी राजनीति में उनका पहला और एकमात्र दांव नाकाम रहा था। 1999 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली से कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार बनाया मगर भाजपा के विजय कुमार मलहोत्रा से वे चुनाव हार गए। हालांकि यह चुनावी पराजय उनके राजनीतिक शिखर की मंजिल में कभी बाधा नहीं बनी। वस्तुत: मनमोहन सिंह का जाना आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास की एक अपूरणीय क्षति है इसमें संदेह नहीं।

मनमोहन सिंह ने काम करके दिया अपनी आलोचना का जवाब :

मनमोहन सिंह को उनके राजनीतिक विरोधी कई बार कठपुतली और कमजोर बताने से परहेज नहीं करते थे। लेकिन मृदुभाषी और संयम की मर्यादा का अनूठा उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने इसका प्रतिवाद करने की बजाय अपने कार्यों से इसका माकूल जवाब दिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2008 में अमेरिका के साथ परमाणु समझौते का उनका फैसला रहा जब वामपंथी दलों के समर्थन वापसी की धमकी-दबाव में न आते हुए इसे सिरे चढ़ाया। वामपंथी दलों ने समर्थन वापस ले लिया तो सोनिया गांधी के साथ मिलकर समाजवादी पार्टी का समर्थन जुटाकर न केवल सरकार बचाई बल्कि ऐतिहासिक परमाणु समझौते को मुकाम तक पहुंचाया। भले ही राजनीति में मनमोहन सिंह की इंट्री करीब 60 साल की उम्र में हुई मगर उनकी सियासी दूरदर्शिता और गहराई का पता इससे चलता है कि जब जम्मू-कश्मीर में पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की जटिल पहल हुई थी तो सोनिया गांधी ने अहमद पटेल के साथ मनमोहन सिंह को भेजा था। इसके बाद ही 2004 के आम चुनाव से एक साल पूर्व उन्हें राज्यसभा में नेता विपक्ष बनाया।

डॉ. मनमोहन सिंह की तीन महान बेटियां :

मनमोहन सिंह अपने पीछे पत्नी और 3 बेटियों को छोड़ गए हैं। इस समय सबसे बड़ी बेटी उपिंदर सिंह की उम्र 65 साल है। उनके पति विजय तन्खा एक शिक्षाविद और लेखक हैं। उनके दो बच्चे हैं। दमन सिंह 61 साल की हैं। उनके पति अशोक पटनायक सीनियर आईपीएस अफसर थे। उनके एक बेटा है। तीसरी बेटी अमृत सिंह 58 साल की हैं। डॉ. मनमोहन सिंह के परिवार में पत्नी गुरशरण कौर और तीन बेटियां हैं। मनमोहन सिंह की सबसे बड़ी बेटी उपिंदर सिंह इतिहासकार और शिक्षाविद हैं दूसरी बेटी दमन सिंह लेखिका हैं, पिता पर किताब लिख चुकी हैं तीसरी बेटी अमृत मानवाधिकार मामलों से जुड़ी हुई वकील हैं। बड़ी बेटी उपिंदर सिंह पेशे से इतिहासकार ,शिक्षाविद और वर्तमान में अशोका विश्वविद्यालय में संकाय की डीन हैं। उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली और मैकगिल विश्वविद्यालय, मॉन्ट्रियल से डिग्री प्राप्त कीं। उपिंदर सिंह ने प्राचीन भारतीय इतिहास पर महत्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने इस पर कई किताबें लिखी हैं. जिनमें प्राचीन और प्रारंभिक मध्यकालीन भारत का इतिहास और प्राचीन भारत में राजनीतिक हिंसा शामिल हैं। उन्हें हार्वर्ड और कैम्ब्रिज जैसे संस्थानों से प्रतिष्ठित फ़ेलोशिप मिली हैं। उन्हें 2009 में सामाजिक विज्ञान में इन्फोसिस पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दूसरी बेटी दमन सिंह पेशे से लेखिका हैं। दमन सिंह को उनके संस्मरण स्ट्रिक्टली पर्सनल: मनमोहन और गुरशरण के लिए जाना जाता है, जो उनके पिता के प्रधानमंत्री बनने से पहले उनके पारिवारिक जीवन के बारे में जानकारी देती है। दमन सिंह ने पर्यावरण मुद्दों सहित विभिन्न विषयों पर किताबें लिखी हैं। दमन सिंह की शादी आईपीएस अधिकारी अशोक पटनायक से हुई है। तीसरी बेटी हैं अमृत सिंह जोकि पेशे से मानवाधिकार वकील और शिक्षाविद हैं। ये अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (ACLU) में स्टाफ अटॉर्नी और स्टैनफोर्ड लॉ स्कूल में कानून की प्रोफेसर हैं। अमृत सिंह ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर फिर येल लॉ स्कूल से कानून की डिग्री हासिल की है। उन्होंने महत्वपूर्ण कानूनी मामलों पर काम किया। पहले ओपन सोसाइटी इनिशिएटिव के लिए वकील के रूप में काम किया। उनके अनुभव में कई प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्यापन शामिल है। डॉ. मनमोहन सिंह की तीनों बेटियों ने न केवल अपने पिता की विरासत को कायम रखा बल्कि शिक्षा, साहित्य और मानवाधिकार वकालत में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। मनमोहन सिंह की बेटियों ने सार्वजनिक जीवन में अपनी व्यावसायिक उपलब्धियों और व्यक्तिगत दृष्टिकोणों के माध्यम से अपने तरीके से प्रभाव डाला।
महानायक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का निधन : 

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 2006 में दोबारा बाइपास सर्जरी हुई थी। जिसके लिए मुंबई से स्पेशलिस्ट डॉक्टर रमाकांत पांडा को बुलाया गया था। इसके अलावा कोरोना काल में उन्हें कोविड भी हुआ था, जिसके बाद से उन्हें सांस लेने में भी काफी तकलीफ रहती थी। बताया जा रहा है कि गुरुवार को तक़रीबन आठ बजे उन्हें दिल्ली के एम्स इमरजेंसी में भर्ती कराया गया, जहां करीब आधे घंटे बाद उनका निधन हो गया। बता दें वे 1985 से 1987 तक भारतीय योजना आयोग के प्रमुख भी रहे थे। वे गर्वनर बने, वित्तकमंत्री बने और प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। उनकी सबसे खास बात उनकी सादगी में थी। अब 26 दिसंबर 2024 को आर्थिक सुधारों का महानायक हमेशा के लिए सो गया।

डॉ मनमोहन सिंह को मिल चुके हैं कई सम्मान :

देश के विकास को नई दिशा देने वाले आर्थिक नीतियों के शिल्पकार मनमोहन सिंह को कई पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया है। इनमें से अहम है भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण(1987); भारतीय विज्ञान कांग्रेस का जवाहरलाल नेहरू जन्म शताब्दी पुरस्कार (1995); वर्ष के वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी अवार्ड (1993 और 1994); वर्ष के वित्त मंत्री के लिए यूरो मनी अवार्ड (1993), कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (1956) का एडम स्मिथ पुरस्कार; कैम्ब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में विशिष्ट प्रदर्शन के लिए राइट पुरस्कार (1955)। डॉ. सिंह को जापानी निहोन किजई शिम्बुन एवं अन्य संघो द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। डॉ. सिंह को कैंब्रिज एवं ऑक्सफ़ोर्ड तथा अन्य कई विश्वविद्यालयों द्वारा मानद उपाधियां प्रदान की गई हैं।

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