कर्मयोगी और क्रांतिकारी ब्रह्मदेव पटेल (बी.डी.पटेल)....
● संघर्ष, विचार और जनप्रतिबद्धता की एक दीर्घ यात्रा
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव, शंखनाद साहित्यिक मंडली
भूमिका : इतिहास के अनलिखे पन्नों की तलाश
इतिहास केवल राजाओं, शासकों, युद्धों और सत्ता-परिवर्तनों का दस्तावेज नहीं है। इतिहास उन करोड़ों मनुष्यों के संघर्षों, सपनों, त्याग और प्रतिरोध का भी नाम है, जिनकी आवाज अक्सर सत्ता और व्यवस्था के शोर में दब जाती है। इतिहास वह भी है जो समाज ने सहा है; वह भी है जिसके लिए हमारे महापुरुषों और जननायकों ने संघर्ष किया; और वह भी है जिसे लिखे जाने की प्रतीक्षा में पीढ़ियाँ गुजर गईं। इसीलिए अपने इतिहास को जानना केवल अतीत को जानना नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने की प्रक्रिया है। किसी समाज के महापुरुषों के जीवन-संघर्ष का अध्ययन उसकी सामूहिक स्मृति को जीवित रखता है।
ब्रह्मदेव पटेल का जीवन इसी अर्थ में महत्वपूर्ण है। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं था। वह छात्र आंदोलन, किसान-मजदूर संघर्ष, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकार, आपातकाल-विरोधी आंदोलन, अंतरराष्ट्रीय मैत्री और सामाजिक संगठन निर्माण से जुड़ी एक लंबी यात्रा थी। 13 नवंबर 2025 को उनके निधन के साथ एक सक्रिय सार्वजनिक जीवन का अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उनके संघर्षों और विचारों से जुड़े प्रश्न आज भी हमारे सामने उपस्थित हैं। समकालीन सार्वजनिक स्रोतों में भी उन्हें जेपी आंदोलन के सेनानी और सामाजिक संगठनों से जुड़े सक्रिय व्यक्तित्व के रूप में दर्ज किया गया है। 2025 में प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट ने उन्हें जेपी आंदोलन से जुड़े वरिष्ठ सेनानी के रूप में उल्लेखित किया था।
1. जन्मभूमि से संघर्षभूमि तक
ब्रह्मदेव पटेल का जन्म 14 जनवरी 1953 को नालंदा जिले के नगरनौसा प्रखंड क्षेत्र के ग्राम हाजीपुर, पोस्ट-कोरारी में किसान परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय सुखलाल सिंह थे। ग्रामीण परिवेश में जन्म लेने वाले ब्रह्मदेव पटेल ने जीवन के प्रारंभिक दिनों में ही सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को निकट से देखा। किसान परिवार का परिवेश उन्हें श्रम, संघर्ष और सामूहिक जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ता गया। बाल्यावस्था से ही उनकी बौद्धिक क्षमता और सामाजिक प्रश्नों के प्रति जिज्ञासा उल्लेखनीय थी। शिक्षा के प्रति उनकी रुचि ने आगे चलकर उन्हें व्यापक वैचारिक संसार से जोड़ा। उन्होंने आई.एससी., बी.ए. ऑनर्स, एम.ए. और एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उनके राजनीतिक जीवन में भी दिखाई देती है। वे केवल आंदोलनकारी नहीं थे, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों को वैचारिक धरातल पर समझने का प्रयास करने वाले व्यक्ति भी थे।
2. छात्र जीवन में संघर्ष की शुरुआत
ब्रह्मदेव पटेल का सार्वजनिक जीवन बहुत कम उम्र में संघर्ष की राह पर आगे बढ़ा। 9 अगस्त 1965 को उन्होंने स्कूली छात्रों के साथ विधानसभा घेराव में सक्रिय भागीदारी की। इसके बाद 1966 के तत्कालीन मुख्यमंत्री के.बी. सहाय के विरुद्ध जनआंदोलन में भी वे सक्रिय रहे। इस आंदोलन के दौरान उन्हें अन्य छात्र नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया और बांकीपुर सेंट्रल जेल में रखा गया। आपके विवरण के अनुसार उस समूह में बाद में बिहार के मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद भी शामिल थे। इस प्रकार छात्र जीवन ही उनके लिए सामाजिक प्रश्नों को समझने और प्रतिरोध की राजनीति से जुड़ने का पहला बड़ा विद्यालय बना। उनकी राजनीतिक चेतना किसी एक घटना का परिणाम नहीं थी। यह धीरे-धीरे विकसित हुई—शिक्षा, छात्र आंदोलन, सामाजिक विषमता और उस समय के व्यापक राजनीतिक वातावरण के बीच।
3. छात्र आंदोलन और एस.एफ.आई. की भूमिका
1960 के दशक के अंतिम वर्षों में बिहार सहित देशभर में छात्र राजनीति सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन की महत्वपूर्ण शक्ति बन रही थी। 1969 में त्रिवेंद्रम में आयोजित छात्र नेताओं के सम्मेलन में बिहार से 17 छात्र नेताओं ने भाग लिया और इसी दौर में एस.एफ.आई. के गठन की प्रक्रिया में ब्रह्मदेव पटेल को केंद्रीय समिति से जोड़ा गया।
1970 में रांची में एस.एफ.आई. बिहार सम्मेलन में वे उपाध्यक्ष बने और 1971 में मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। इसी दौर में वे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की राजनीति से भी जुड़े। 1972 में सी.पी.एम. पटना के मंत्री के रूप में उनकी भूमिका का उल्लेख उनके उपलब्ध जीवन-वृत्त में मिलता है। इस चरण में उनके सामने राजनीति केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं थी। किसान, मजदूर, गरीब, दलित, पिछड़े, अतिपिछड़े और अल्पसंख्यक समुदायों की समस्याओं से जुड़ना उनके राजनीतिक कर्म का प्रमुख हिस्सा बनता गया।
4. वैचारिक मतभेद और नई राजनीतिक दिशा
राजनीतिक जीवन में विचारधारा जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है व्यक्ति का अपने विचारों के प्रति ईमानदार रहना। ब्रह्मदेव पटेल के जीवन में भी ऐसा दौर आया जब वे अपने तत्कालीन राजनीतिक संगठन से वैचारिक मतभेद के कारण अलग हुए। मासस से संबंधित एक ऐतिहासिक विवरण में ब्रह्मदेव पटेल का नाम उन नेताओं में मिलता है जो सीपीएम से अलग होने के बाद उस धारा से जुड़े। इसी स्रोत में बाद में इंडियन पीपुल्स फ्रंट के गठन और बिहार में उसके विस्तार से जुड़े उनके योगदान का उल्लेख है। यह तथ्य उनके राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाता है—संगठन उनके लिए साधन था, विचार और जनहित अंतिम उद्देश्य।
5. छात्र संघर्ष से जनसंघर्ष तक
10 दिसंबर 1973 को विधानसभा घेराव का एक बड़ा आंदोलन हुआ। आपके विवरण के अनुसार इस आंदोलन में मगध विश्वविद्यालय के छात्रों का नेतृत्व ब्रह्मदेव पटेल ने किया और इसमें लगभग 20 हजार छात्रों की भागीदारी हुई।
1974 का वर्ष भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण था। बिहार का छात्र आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन में बदल रहा था और जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व उसे व्यापक दिशा दे रहा था। ब्रह्मदेव पटेल इस दौर के सक्रिय आंदोलनकारियों में थे। उनका संघर्ष केवल छात्र समस्याओं तक सीमित नहीं रहा। बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार, शिक्षा, किसानों और मजदूरों के सवाल उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख मुद्दे बने।
6. आपातकाल और भूमिगत संघर्ष
25 जून 1975 की रात आपातकाल की घोषणा भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक थी। ब्रह्मदेव पटेल ने आपातकाल के दौरान भूमिगत रहकर लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में संघर्ष किया। 1976 में जेपी स्मारक के निकट आपातकाल के विरोध में प्रदर्शन हुआ, जिसमें उनके नेतृत्व में अनेक आंदोलनकारी गिरफ्तार हुए। उनके ऊपर डीआईआर और मीसा जैसी कठोर धाराओं के तहत कार्रवाई की गई और आंदोलनकारियों को जेल भेजा गया। यह दौर उनके जीवन का कठिन अध्याय था।
जेल किसी आंदोलनकारी के लिए केवल चारदीवारी नहीं होती। वह उसके विश्वास की परीक्षा भी होती है। कठिन परिस्थितियों में विचारों पर कायम रहना ही किसी आंदोलनकारी के चरित्र की कसौटी बनता है। ब्रह्मदेव पटेल का सार्वजनिक जीवन इसी कसौटी पर आगे बढ़ता दिखाई देता है।
आज भी सार्वजनिक अभिलेखों और समाचार रिपोर्टों में उनका नाम जेपी सेनानियों के साथ दर्ज मिलता है। 2019 की एक रिपोर्ट में उन्हें जेपी आंदोलन के नेताओं के साथ प्रस्तावित सम्मेलन में आमंत्रित प्रमुख सेनानियों में शामिल किया गया था।
7. मुंगेरीलाल आयोग और सामाजिक न्याय का सवाल
14 मार्च 1978 को छात्र-युवा सवालों तथा मुंगेरीलाल आयोग को लागू करने की मांग को लेकर बिहार विधानसभा घेराव हुआ। ब्रह्मदेव पटेल के नेतृत्व में लगभग 200 आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर भागलपुर सेंट्रल जेल भेजा गया।
तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के कार्यकाल में लगभग तीन महीने बाद उन्हें तथा अन्य आंदोलनकारियों को बिना शर्त रिहा किया गया।
मुंगेरीलाल आयोग का प्रश्न उस समय सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़ा हुआ महत्वपूर्ण प्रश्न था। बिहार में पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व और सामाजिक अवसरों का सवाल धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ रहा था। ब्रह्मदेव पटेल की राजनीति में सामाजिक न्याय का प्रश्न इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
8. अंतरराष्ट्रीय मंच पर बिहार के छात्र आंदोलन की आवाज
1978 में क्यूबा में आयोजित साम्राज्यवाद-विरोधी अंतरराष्ट्रीय छात्र-युवा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करने की बात उनके जीवन-वृत्त में दर्ज है। इस सम्मेलन में 142 देशों के लगभग 20 हजार छात्र नेताओं ने भाग लिया था और भारत की ओर से ब्रह्मदेव पटेल सहित अन्य भारतीय प्रतिनिधि उपस्थित थे। यह उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अध्याय था। एक ग्रामीण किसान परिवार से निकलकर राष्ट्रीय छात्र राजनीति और फिर अंतरराष्ट्रीय युवा मंच तक पहुंचना उनके व्यक्तित्व की वैचारिक यात्रा का विस्तार बताता है। उनकी दृष्टि में सामाजिक परिवर्तन केवल स्थानीय प्रश्न नहीं था। वे उसे व्यापक वैश्विक संदर्भ में भी देखते थे।
9. चुनावी राजनीति में प्रवेश
1980 में ब्रह्मदेव पटेल ने चंडी विधानसभा और बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से एम.सी.सी. के टिकट पर चुनाव लड़ा। दोनों स्थानों पर वे तीसरे स्थान पर रहे। चुनावी राजनीति उनके लिए सत्ता प्राप्ति का अंतिम लक्ष्य नहीं बनी। चुनाव उनके लिए जनता के बीच राजनीतिक विचार रखने का एक माध्यम भी था। 1981 में क्रांतिकारियों का देशभक्त मोर्चा बना और उन्हें उसमें सचिव की जिम्मेदारी मिली। इसके बाद 1982 में दिल्ली में इंडियन पीपुल्स फ्रंट (IPF) के गठन के दौर में वे राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय हुए। ऐतिहासिक विवरण में भी 1982 में आईपीएफ के गठन तथा ब्रह्मदेव पटेल सहित बिहार के कुछ जननेताओं के उसके साथ जुड़ने का उल्लेख मिलता है।
10. इंडियन पीपुल्स फ्रंट और पूर्णकालिक जनसंघर्ष
आईपीएफ में ब्रह्मदेव पटेल राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और पटना के सचिव बने तथा लगभग 12 वर्षों तक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में संगठनात्मक और जनआंदोलन संबंधी जिम्मेदारियां निभाईं। यह उनके जीवन का अत्यंत सक्रिय दौर था। पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता का जीवन सामान्य अर्थों में सुविधापूर्ण जीवन नहीं होता। इसमें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की जगह संगठन, आंदोलन, यात्रा, बैठक, जनसंपर्क और संघर्ष प्राथमिक हो जाते हैं। उनके जीवन में जेल यात्राएं भी इसी संघर्ष का हिस्सा रहीं। 1989 में उन्होंने चंडी विधानसभा क्षेत्र से आईपीएफ के टिकट पर चुनाव लड़ा और तीसरे स्थान पर रहे। 1991 में बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से भी उन्होंने चुनाव लड़ा और तीसरे स्थान पर रहे। चुनावी परिणाम चाहे जो रहे हों, उनकी सक्रियता ने उन्हें बिहार के जनांदोलनों के बीच एक पहचान दी।
11. भारत-चीन मैत्री संघ : अंतरराष्ट्रीय मैत्री का नया अध्याय
ब्रह्मदेव पटेल के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारत-चीन मैत्री संघ से जुड़ा रहा। 1992 में भारत-चीन मैत्री संघ के बिहार प्रदेश सम्मेलन में उन्हें महामंत्री बनाया गया और 1993 में दिल्ली में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी मिली। यह भूमिका उनके व्यक्तित्व के एक दूसरे आयाम को सामने लाती है। एक ओर वे सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों के आंदोलनों से जुड़े थे, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मैत्री और जन-से-जन संबंधों के पक्षधर संगठन में राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभा रहे थे। उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं था; उसमें जनता के बीच संवाद, शांति और अंतरराष्ट्रीय समझ भी शामिल थी।
12. सामाजिक चेतना और कुर्मी महाचेतना रैली
12 फरवरी 1994 को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित सामाजिक कुर्मी महाचेतना रैली उनके सामाजिक संगठनात्मक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव थी। इस रैली में दस लाख से अधिक लोगों की भागीदारी हुई और ब्रह्मदेव पटेल आयोजक समिति से जुड़े थे। इतने बड़े सामाजिक आयोजन का उद्देश्य केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, संगठन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों को सामने लाना भी था। बाद के वर्षों में बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी का प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण होता गया।
13. समता पार्टी से जुड़ाव और अलगाव
19 जनवरी 1995 को ब्रह्मदेव पटेल की अध्यक्षता वाले क्रांतिकारी पीपुल्स फ्रंट के समता पार्टी में विलय का उल्लेख उनके जीवन-वृत्त में मिलता है। उस समय समता पार्टी के प्रमुख नेताओं में जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी जैसे नेता शामिल थे। ब्रह्मदेव पटेल को हिलसा विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बने। बाद में चुनाव स्थगित हुआ और उपचुनाव में उम्मीदवार चयन को लेकर परिस्थितियां बदल गईं। इसके बाद वे समता पार्टी से अलग हो गए। उनकी राजनीति में संगठनात्मक जुड़ाव के साथ-साथ अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान भी उनमें महत्वपूर्ण थी।
14. जनता दल और सामाजिक संगठन
1996 से 2004 तक वे जनता दल से सक्रिय रूप से जुड़े रहे और प्रदेश महासचिव की जिम्मेदारी निभाई। 2002 में वे पटेल सेवा संघ, बिहार के सचिव चुने गए और लगभग पांच वर्षों तक इस पद पर रहकर सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। 2003 में कुर्मी-कोईरी समाज के प्रदेश स्तरीय सम्मेलन का आयोजन शहीद जगदेव कक्ष, पटना में किया गया। आपके विवरण के अनुसार इसी क्रम में कुर्मी-कोईरी (लव-कुश) चेतना मंच का गठन हुआ और ब्रह्मदेव पटेल को सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनाया गया। इस दौर में उनकी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र सामाजिक संगठन और सामुदायिक चेतना था। उनकी राजनीति में सामाजिक पहचान और व्यापक सामाजिक न्याय के प्रश्न एक-दूसरे से अलग नहीं थे।
15. राष्ट्रपति भवन में बिहार के किसानों की आवाज
30 मई 2003 को ब्रह्मदेव पटेल के नेतृत्व में चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में मुलाकात का उल्लेख आपके जीवन-वृत्त में है। इस मुलाकात में बिहार के विकास और किसानों की समस्याओं से संबंधित मुद्दे उठाए गए थे। यह घटना उनके सार्वजनिक जीवन के उस पक्ष को सामने लाती है जिसमें आंदोलन केवल सड़क तक सीमित नहीं था। वे संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मंचों तक जनता के सवालों को पहुंचाने का प्रयास भी करते थे।
16. पत्रकारिता और वैचारिक लेखन
ब्रह्मदेव पटेल का व्यक्तित्व केवल राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों तक सीमित नहीं था। वे 1973-74 में ‘अपनी आवाज’ तथा 1975-76 में ‘जनरूचि’ पटना दैनिक के संपादकीय मंडल से जुड़े रहे। इसके अलावा वे ‘शम्बूक’ मासिक पत्रिका की प्रबंध समिति के सदस्य रहे और 2008-09 में ‘बिहार की आवाज’ के संपादक पद पर भी कार्य किया।
पत्रकारिता उनके लिए सूचना का व्यवसाय नहीं बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप का माध्यम रही होगी—जहाँ समाज के उन प्रश्नों को आवाज दी जा सके जो मुख्यधारा की राजनीति में अक्सर हाशिये पर चले जाते हैं। एक सामाजिक कार्यकर्ता का पत्रकार बनना और पत्रकार का सामाजिक आंदोलन से जुड़े रहना—दोनों भूमिकाएं उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व में परस्पर जुड़ी दिखाई देती हैं।
17. जेपी आंदोलन की स्मृति को जीवित रखने का प्रयास
ब्रह्मदेव पटेल के जीवन का अंतिम चरण भी उनके पुराने संघर्षों से अलग नहीं था। वे जेपी सेनानी के रूप में सार्वजनिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहे। 2021 की एक सार्वजनिक रिपोर्ट में भी उनका नाम पटना में आयोजित जेपी सेनानियों के कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख लोगों में दर्ज है। 2025 में प्रकाशित रिपोर्टों में भी उन्हें जेपी सेनानी और सामाजिक संगठनों से जुड़े सक्रिय व्यक्तित्व के रूप में उल्लेखित किया गया। यह तथ्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनेक आंदोलनकारी समय बीतने के साथ सार्वजनिक जीवन से दूर हो जाते हैं। ब्रह्मदेव पटेल इसके विपरीत अपने आंदोलन की स्मृति और उससे जुड़े सामाजिक प्रश्नों को अंतिम वर्षों तक सार्वजनिक विमर्श में बनाए रखने का प्रयास करते रहे।
18. जेपी सेनानियों के लिए संवेदनशीलता
2017 में उनके नेतृत्व में जेपी सेनानियों से सहयोग के रूप में एकत्रित 5 लाख 50 हजार रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष में दिए जाने का उल्लेख आपके जीवन-वृत्त में मिलता है। यह प्रसंग उनके जीवन में सामूहिकता की भावना को दिखाता है। आंदोलन से जुड़े लोगों ने जो कुछ समाज से पाया, उसे समाज को वापस देने की भावना उनके कार्यों में दिखाई देती है। यही कारण है कि उन्हें केवल राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित करना होगा।
19. अंतिम वर्षों में भी सक्रियता
जीवन के अंतिम वर्षों में भी ब्रह्मदेव पटेल सक्रिय रहे। 27 अप्रैल 2025 को भारतीय लव-कुश मंच और सम्पूर्ण क्रांति मोर्चा का संयुक्त प्रांतीय सम्मेलन पटेल सेवा सदन, पटना में उनके नेतृत्व में की गई। 2025 की सार्वजनिक रिपोर्टों में भी उन्हें विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय जेपी सेनानी के रूप में दर्ज किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि उम्र बढ़ने के बावजूद सार्वजनिक प्रश्नों से उनका संबंध समाप्त नहीं हुआ था।
20. विचारधारा : समानता और सामाजिक न्याय
ब्रह्मदेव पटेल के सार्वजनिक जीवन को समझने के लिए उनके वैचारिक आधार को समझना आवश्यक है। वे उन राजनीतिक परंपराओं से जुड़े रहे जिनमें आर्थिक और सामाजिक विषमता को लोकतंत्र की बड़ी चुनौती माना जाता है। उनके जीवन की विभिन्न राजनीतिक यात्राओं के बावजूद कुछ मूल प्रश्न लगातार उनके साथ बने रहे—गरीबों का सवाल, किसानों का सवाल, पिछड़ों और वंचितों का सवाल तथा लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल।
21. संघर्षशील व्यक्तित्व की विशेषताएं
ब्रह्मदेव पटेल के व्यक्तित्व का सबसे प्रमुख पक्ष उनका संघर्षशील स्वभाव था। उन्होंने छात्र जीवन में संघर्ष शुरू किया और जीवन के अंतिम वर्षों तक सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। उनकी दूसरी विशेषता थी—संगठन निर्माण की क्षमता। उन्होंने विभिन्न छात्र, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों में अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाईं। कई संगठनों में पद संभाला और अनेक आंदोलनों में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। तीसरी विशेषता थी—विचारों के प्रति प्रतिबद्धता। राजनीतिक संगठनों में उनका आना-जाना रहा, लेकिन सामाजिक न्याय और जनसरोकार के प्रश्न उनके सार्वजनिक जीवन में निरंतर बने रहे। चौथी विशेषता थी—जनसंपर्क। किसानों से लेकर छात्रों तक, मजदूरों से लेकर सामाजिक संगठनों तक और बिहार से लेकर राष्ट्रीय मंच तक उनका संपर्क रहा।
22. ब्रह्मदेव पटेल और बिहार की राजनीतिक-सामाजिक चेतना
बिहार की राजनीति को केवल विधानसभा और संसद के चुनावों से समझना संभव नहीं है। बिहार का राजनीतिक इतिहास छात्र आंदोलनों, किसान संघर्षों, सामाजिक न्याय के आंदोलनों, जेपी आंदोलन और विभिन्न सामाजिक संगठनों के संघर्षों से भी निर्मित हुआ है। ब्रह्मदेव पटेल इसी व्यापक राजनीतिक-सामाजिक परंपरा के एक प्रतिनिधि व्यक्तित्व थे।
उनकी राजनीतिक यात्रा में कई धाराएं एक साथ दिखाई देती हैं—
छात्र आंदोलन से सामाजिक आंदोलन तक, कम्युनिस्ट राजनीति से जनवादी मोर्चों तक, आईपीएफ से चुनावी राजनीति तक, भारत-चीन मैत्री से सामाजिक संगठन तक, और जेपी आंदोलन की स्मृति से समकालीन जनसरोकार तक। इस बहुआयामी यात्रा के कारण उनका जीवन बिहार के उत्तर-स्वतंत्रता राजनीतिक इतिहास के अध्ययन के लिए उपयोगी सामग्री प्रदान करता है।
23. प्रतिकूल परिस्थितियों में खिलता व्यक्तित्व
ब्रह्मदेव पटेल का जीवन इस विश्वास को पुष्ट करता है कि प्रतिभा केवल सुविधाओं की उपज नहीं होती। कई बार अभाव मनुष्य के भीतर वह जिजीविषा पैदा करता है जो सुविधा में संभव नहीं होती। दृढ़ संकल्प, निरंतर अध्ययन, संगठन क्षमता, सामाजिक संवेदना और संघर्ष करने का साहस—ये वे तत्व हैं जिनसे उनका सार्वजनिक व्यक्तित्व निर्मित हुआ। उनके जीवन से यह संदेश लिया जा सकता है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और व्यक्ति अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार रहे, तो प्रतिकूल परिस्थितियां भी उसकी राह को पूरी तरह रोक नहीं सकतीं।
24. मनुष्य की असली पहचान : समाज के लिए जीना
ब्रह्मदेव पटेल के जीवन को याद करते हुए एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से सामने आता है—मनुष्य के जीवन की सार्थकता क्या है? केवल अपने लिए जीना आसान है। लेकिन समाज के लिए जीना कठिन है। दूसरों के अधिकारों के लिए खड़ा होना कठिन है। किसानों, मजदूरों, गरीबों और वंचितों की आवाज बनने का प्रयास कठिन है। लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जेल जाना कठिन है। और सबसे कठिन है—लंबे जीवन में अपने सार्वजनिक सरोकार को बनाए रखना। ब्रह्मदेव पटेल का जीवन इसी कठिन रास्ते की यात्रा था।
25. 13 नवंबर 2025 : एक संघर्षशील अध्याय का अवसान
13 नवंबर 2025, गुरुवार को कर्मयोगी ब्रह्मदेव पटेल का निधन हुआ। उनके निधन के साथ बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन ने ऐसे व्यक्ति को खो दिया जिसकी पहचान किसी एक दल, संगठन या पद तक सीमित नहीं थी। उनकी पहचान एक छात्र आंदोलनकारी, राजनीतिक कार्यकर्ता, जेपी सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, संगठनकर्ता, लेखक-पत्रकार और भारत-चीन मैत्री के समर्थक सार्वजनिक कार्यकर्ता के रूप में बनी। उनका जीवन लगभग छह दशकों तक फैले सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों का साक्षी रहा। उनके निधन को केवल एक व्यक्ति की मृत्यु के रूप में देखना उनके जीवन की व्यापकता को कम करके देखना होगा। यह एक ऐसी पीढ़ी के क्रमशः विदा होने का भी संकेत है जिसने राजनीति को आंदोलन के रूप में देखा था और आंदोलन को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना था।
26. नई पीढ़ी के लिए ब्रह्मदेव पटेल की विरासत
आज की पीढ़ी के सामने परिस्थितियां अलग हैं। तकनीक बदल गई है। राजनीति का स्वरूप बदला है। संचार के साधन बदल गए हैं। लेकिन सामाजिक असमानता, शिक्षा, रोजगार, किसान, मजदूर, लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक न्याय जैसे प्रश्न अभी भी प्रासंगिक हैं। ऐसे समय में ब्रह्मदेव पटेल की विरासत को केवल श्रद्धांजलि के शब्दों में सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा। उनके जीवन का अध्ययन करना होगा। उनके दौर के आंदोलनों को समझना होगा। उनके विचारों से सहमति-असहमति दोनों को लोकतांत्रिक ढंग से परखना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण—उनके जीवन से यह सीखना होगा कि सार्वजनिक जीवन में निष्ठा, संघर्ष और सामाजिक संवेदना का क्या महत्व है।
27. इतिहास लिखने की जिम्मेदारी
हमारे समाज में अनेक ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपना जीवन समाज के लिए खपा दिया, लेकिन उनके जीवन का विस्तृत इतिहास नहीं लिखा गया। कुछ के नाम स्मारकों पर हैं, कुछ के नाम समाचारों में आए, कुछ के नाम आंदोलन की पुरानी सूची में रह गए और कुछ के संघर्ष उनके साथ ही समाप्त हो गए। ब्रह्मदेव पटेल का जीवन इस प्रश्न को सामने लाता है कि क्या हम अपने आंदोलनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और जननेताओं का समुचित दस्तावेज तैयार कर रहे हैं? यदि नहीं, तो आने वाली पीढ़ियां अपने ही इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों से वंचित रह जाएंगी। इसलिए जीवनियां लिखना केवल साहित्यिक कार्य नहीं है। यह सामाजिक स्मृति को सुरक्षित रखने का काम भी है।
28. उपसंहार : संघर्ष की मशाल
ब्रह्मदेव पटेल का जीवन हमें यह बताता है कि संघर्ष हमेशा तत्काल परिणाम नहीं देता। कई बार आंदोलन असफल होते हैं। कई बार चुनाव हारना पड़ता है।
कई बार संगठन बदलते हैं। कई बार विचारधाराओं में मतभेद पैदा होते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन की असली कसौटी केवल सफलता नहीं होती। कसौटी यह भी होती है कि व्यक्ति ने अपने समय के सवालों के साथ कितनी ईमानदारी से खड़ा होना चुना। ब्रह्मदेव पटेल की जीवन-यात्रा को इसी दृष्टि से पढ़ना चाहिए। उन्होंने छात्र जीवन में आंदोलन का रास्ता चुना। किसानों और मजदूरों के बीच काम किया। सामाजिक न्याय के प्रश्न उठाए। आपातकाल का विरोध किया। जेल यात्राएं कीं। जनवादी और सामाजिक संगठनों में काम किया। अंतरराष्ट्रीय मैत्री के मंच पर जिम्मेदारी निभाई। चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया। पत्रकारिता से जुड़े। जेपी आंदोलन की स्मृति को जीवित रखा। और जीवन के अंतिम वर्षों तक सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे। 13 नवंबर 2025 को उनका भौतिक जीवन समाप्त हुआ, लेकिन संघर्ष की वह परंपरा, जिसे उन्होंने अपने जीवन में जिया, समाज के लिए विचार का विषय बनी रह सकती है। मनुष्य शरीर से जाता है, लेकिन उसके कर्म, विचार और संघर्ष समाज की स्मृति में जीवित रह सकते हैं। ब्रह्मदेव पटेल की सबसे बड़ी स्मृति शायद यही है—अपने समय के प्रश्नों से मुंह न मोड़ना और समाज के लिए कुछ करने की कोशिश करते रहना। उनकी स्मृति को विनम्र नमन।
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