मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर के कुलगीतकार डॉ. शकील अहमद अंसारी....।।
●नालंदा के गौरव डॉ. शकील अहमद अंसारी : संघर्ष से साहित्यिक शिखर तक की प्रेरक यात्रा
●अभावों से उपलब्धियों तक : शिक्षा, संघर्ष और साहित्य-साधना की अनूठी गाथा
लेखक : साहित्यकार एवं शिक्षाविद राकेश बिहारी शर्मा, महासचिव शंखनाद साहित्यिक मंडली
भूमिका : संघर्ष की आँच में तपकर निखरा व्यक्तित्व
मानव-जीवन की सार्थकता केवल सुख-सुविधाओं के अर्जन, पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति और भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होती; उसका वास्तविक महत्त्व संघर्षों के बीच स्वयं को सँवारने, ज्ञान की साधना करने, अपने कर्मक्षेत्र में योगदान देने और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सृजनशीलता को जीवित रखने में निहित होता है। कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी जीवन-यात्रा स्वयं प्रेरणा का स्रोत बन जाती है। अभावों से आरंभ होकर शिक्षा, अध्यापन, शोध और साहित्य-साधना तक पहुँचने वाले ऐसे ही संघर्षशील, कर्मनिष्ठ एवं संवेदनशील व्यक्तित्व हैं—डॉ. शकील अहमद अंसारी, जो नालंदा की गौरवशाली ज्ञानपरंपरा, हिंदी साहित्य के प्रति अनुराग और शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घ योगदान के लिए उल्लेखनीय हैं।
बिहार की ऐतिहासिक भूमि नालंदा प्राचीन काल से ही ज्ञान, दर्शन, शिक्षा और बौद्धिक चेतना की प्रतीक रही है। इसी धरती से संबद्ध डॉ. अंसारी ने आर्थिक अभावों और जीवन की कठिन परिस्थितियों के बीच शिक्षा को अपने व्यक्तित्व-निर्माण का आधार बनाया। उनके जीवन की विशेषता यह है कि उन्होंने कठिनाइयों को अपनी प्रगति की अंतिम सीमा नहीं माना, बल्कि परिश्रम, आत्मविश्वास और धैर्य के सहारे आगे बढ़ने का निरंतर प्रयास किया।
उनकी जीवन-यात्रा में एक ओर आर्थिक संघर्षों से जूझते विद्यार्थी का धैर्य है, तो दूसरी ओर ज्ञानदान के प्रति समर्पित शिक्षक की कर्मनिष्ठा; एक ओर शोधार्थी की बौद्धिक जिज्ञासा है, तो दूसरी ओर कवि की संवेदनशीलता और सृजनशीलता। लगभग सैंतीस वर्षों तक अध्यापन के क्षेत्र में सक्रिय रहने वाले डॉ. अंसारी ने सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य-साधना का मार्ग नहीं छोड़ा। वर्ष 2022 में मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर के कुलगीत की रचना उनके जीवन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बनी। दुर्भाग्यवश, वर्ष 2023 में हुई गोलीबारी की घटना ने उनके जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इसके बावजूद उनका जीवन ज्ञान, कर्म, साहित्य और संघर्ष की एक ऐसी गाथा प्रस्तुत करता है, जो मानवीय जिजीविषा के महत्त्व को रेखांकित करती है।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन : अभावों के बीच संकल्प की ज्योति
डॉ. शकील अहमद अंसारी का जन्म 9 मार्च, 1955 को सकूनत कलाँ, बिहारशरीफ, जिला नालंदा, बिहार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय वसी अहमद अंसारी थे। उनका बचपन, किशोरावस्था और युवावस्था नालंदा जिले के नूरसराय प्रखंड के रतनपुरा गाँव में व्यतीत हुई। उनका प्रारंभिक जीवन आर्थिक कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के बीच बीता। जीवन की परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं, किंतु शिक्षा प्राप्त करने की उनकी आकांक्षा और अपने भविष्य को सँवारने का संकल्प निरंतर बना रहा। उनके संघर्ष का सबसे प्रेरक पक्ष यह है कि उन्होंने विद्यार्थी-जीवन में ही आत्मनिर्भरता का महत्त्व समझ लिया था। पढ़ाई के दौरान वे छोटे-छोटे बालक-बालिकाओं को ट्यूशन पढ़ाया करते थे। इससे जो थोड़ी-बहुत राशि प्राप्त होती, उसे वे अपनी पढ़ाई पर व्यय करते थे। इस प्रकार उनकी शिक्षा केवल पारिवारिक परिस्थितियों के सहारे आगे बढ़ने वाली यात्रा नहीं थी, बल्कि उसमें उनके स्वयं के श्रम, त्याग और उत्तरदायित्व-बोध की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
एक ओर अपनी पढ़ाई जारी रखने की चुनौती थी, तो दूसरी ओर उसके लिए आवश्यक साधन जुटाने का प्रश्न। ऐसे में छोटे बच्चों को पढ़ाकर अर्जित की गई अल्प राशि का अपनी शिक्षा पर व्यय करना उनके दृढ़ संकल्प और आत्मसम्मान का परिचायक है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों के सामने हार मानने के बजाय श्रम को अपना सहारा बनाया। उनका यह विद्यार्थी-जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि शिक्षा के प्रति सच्ची निष्ठा व्यक्ति को उपलब्ध साधनों का सदुपयोग करना और कठिनाइयों के बीच भी अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहना सिखाती है।
डॉ. अंसारी के जीवन का यह आरंभिक अध्याय उनकी आगे की उपलब्धियों की आधारभूमि है। अभावों ने उनकी राह अवश्य कठिन बनाई, किंतु उन्होंने उन्हीं परिस्थितियों के बीच अपने व्यक्तित्व को गढ़ने का प्रयास किया। संघर्ष उनके लिए केवल विवशता नहीं, बल्कि आत्मनिर्माण की सतत साधना बन गया।
शिक्षा : आत्मनिर्माण और ज्ञानार्जन की सतत साधना
डॉ. शकील अहमद अंसारी की शैक्षिक यात्रा उनके परिश्रम, लगन और ज्ञान के प्रति समर्पण की कहानी है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के जगत नारायण सिंह प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने उच्च विद्यालय, दहपर-सरगाँव, नालंदा से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् उन्होंने सरदार पटेल मेमोरियल कॉलेज, बिहारशरीफ से आई.एस.-सी. की पढ़ाई पूरी की। इसके उपरांत उन्होंने नालंदा कॉलेज, बिहारशरीफ से हिंदी प्रतिष्ठा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति उनकी गहरी अभिरुचि ने उन्हें इसी विषय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर उन्होंने मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से हिंदी में स्नातकोत्तर अर्थात् एम.ए. की उपाधि अर्जित की।
इन शैक्षणिक उपलब्धियों का महत्त्व केवल विभिन्न उपाधियों की प्राप्ति में नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों में निहित है, जिनके बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। विद्यार्थी-जीवन में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी शिक्षा का खर्च जुटाना और सीमित साधनों के बावजूद अध्ययन जारी रखना उनके संघर्षशील व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
उनकी शैक्षिक यात्रा यह भी बताती है कि ज्ञानार्जन के लिए केवल प्रतिभा पर्याप्त नहीं होती; उसके साथ निरंतर परिश्रम, धैर्य, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता भी आवश्यक है। हिंदी साहित्य का अध्ययन उनके लिए आगे चलकर अध्यापन, शोध और काव्य-सृजन के व्यापक संसार में प्रवेश का माध्यम बना। इस प्रकार शिक्षा ने न केवल उनके व्यावसायिक जीवन को दिशा दी, बल्कि उनके बौद्धिक और रचनात्मक व्यक्तित्व के विकास में भी निर्णायक भूमिका निभाई।
बेरोज़गारी के दिन : संघर्ष से समझौता नहीं, श्रम से समाधान
शिक्षा पूरी कर लेने के बाद भी जीवन की चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुईं। रोजगार प्राप्त करने के लिए उन्हें बेरोज़गारी के कठिन दौर से गुजरना पड़ा। यह वह समय था, जब शैक्षणिक योग्यता अर्जित कर लेने के बावजूद स्थायी आजीविका का मार्ग सहजता से उपलब्ध नहीं हुआ। किंतु डॉ. अंसारी ने परिस्थितियों के सामने निराश होकर बैठ जाने के बजाय श्रम और अध्यापन को अपना सहारा बनाया।
जीविका चलाने के लिए उन्होंने विभिन्न निजी शिक्षण संस्थानों में अध्यापन-कार्य किया। इस अनुभव ने उनके जीवन-संघर्ष को एक नया आयाम दिया। एक ओर वे अपने अर्जित ज्ञान का उपयोग विद्यार्थियों को शिक्षित करने में कर रहे थे, तो दूसरी ओर अपने भविष्य के लिए स्थायी अवसरों की प्रतीक्षा और तैयारी भी कर रहे थे।
बेरोज़गारी का यह दौर उनके जीवन का ऐसा अध्याय है, जो बताता है कि सफलता की राह प्रायः सीधी और सरल नहीं होती। कभी शिक्षा प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो कभी शिक्षा पूरी होने के बाद रोजगार के लिए। इन दोनों परिस्थितियों में धैर्य, श्रम और आत्मविश्वास ही मनुष्य के सबसे विश्वसनीय साथी बनते हैं।
डॉ. अंसारी ने निजी शिक्षण संस्थानों में अध्यापन के माध्यम से न केवल अपनी जीविका का प्रबंध किया, बल्कि शिक्षण-कार्य से जुड़े अपने अनुभव को भी विकसित किया। अंततः 3 मार्च, 1983 को उनकी नियुक्ति भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के अंतर्गत अंगीभूत आर.एस. कॉलेज, तारापुर में हिंदी व्याख्याता के पद पर हुई। यह नियुक्ति उनके संघर्षपूर्ण जीवन में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि और लंबे परिश्रम का फल थी।
अध्यापन-जीवन : ज्ञानदान के प्रति प्रतिबद्धता
आर.एस. कॉलेज, तारापुर में हिंदी व्याख्याता के रूप में नियुक्ति के साथ डॉ. शकील अहमद अंसारी के जीवन में विश्वविद्यालयीय अध्यापन की दीर्घ यात्रा आरंभ हुई। लगभग सैंतीस वर्षों तक उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दीं। इस अवधि में वे विद्यार्थियों के ज्ञानार्जन, हिंदी भाषा एवं साहित्य के अध्ययन तथा महाविद्यालयीन दायित्वों से जुड़े रहे।
अध्यापन केवल पाठ्यक्रम पूरा करने या विषयगत जानकारी देने का कार्य नहीं है। एक शिक्षक का दायित्व विद्यार्थियों में विचारशीलता, अध्ययनशीलता, विवेक और जीवन को समझने की दृष्टि विकसित करना भी है। डॉ. अंसारी के अध्यापन-जीवन का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने अपने अर्जित ज्ञान को विद्यार्थियों तक पहुँचाने के कार्य को अपनी व्यावसायिक जिम्मेदारी के रूप में निभाया।
उनके शैक्षणिक जीवन का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें दो बार महाविद्यालय का प्रभारी प्राचार्य नियुक्त किया गया। यह दायित्व उनके अनुभव, संस्थागत कार्यक्षमता और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के निर्वहन से जुड़ा महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। अध्यापन के अतिरिक्त प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्य करना शैक्षणिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों के बीच संतुलन स्थापित करने की अपेक्षा करता है।
वर्ष 2020 में 65 वर्ष की आयु में वे सेवानिवृत्त हुए। इस प्रकार एक ऐसे विद्यार्थी की यात्रा, जिसने कभी अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया था, दशकों तक विश्वविद्यालयीय शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने वाले प्राध्यापक तक पहुँची। यह उपलब्धि उनके परिश्रम, धैर्य और शिक्षा के प्रति अटूट निष्ठा का सशक्त उदाहरण है।
शोध-साधना : रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी के साहित्यिक अवदान का अध्ययन
डॉ. अंसारी का शैक्षणिक व्यक्तित्व केवल अध्यापन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपने महाविद्यालयीन सेवाकाल के दौरान शोधकार्य के माध्यम से हिंदी साहित्य के अध्ययन में भी योगदान दिया। उन्होंने पी-एच.डी. की उपाधि के लिए बिहार के मूर्धन्य लेखक, साहित्यकार और महान स्वतंत्रता-सेनानी श्री रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी की हिंदी साहित्य-साधना विषय पर शोधकार्य सम्पन्न किया।
रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी का व्यक्तित्व साहित्यिक चेतना, राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक सरोकारों के विशिष्ट समन्वय के लिए स्मरणीय है। ऐसे व्यक्तित्व की साहित्य-साधना का अध्ययन करना हिंदी साहित्य की परंपरा, उसकी वैचारिक सक्रियता और समाज से उसके संबंधों को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
डॉ. अंसारी द्वारा इस विषय पर शोधकार्य का चयन हिंदी साहित्य के प्रति उनकी गंभीर अभिरुचि का परिचायक है। अध्यापन के साथ शोध करना निरंतर अध्ययन, संदर्भों के अनुशीलन, विचारों के विश्लेषण और विषय के प्रति दीर्घकालीन एकाग्रता की अपेक्षा करता है। इस दृष्टि से उनकी शोध-साधना उनके शैक्षणिक जीवन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
उनकी यात्रा में यह पक्ष विशेष उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपनी व्यावसायिक जिम्मेदारियों के साथ बौद्धिक जिज्ञासा को भी जीवित रखा। अध्यापन ने उन्हें ज्ञान के प्रसार का अवसर दिया, जबकि शोध ने साहित्यिक परंपरा को गहराई से समझने और उसका विश्लेषण करने की दिशा प्रदान की। इस प्रकार उनके व्यक्तित्व में शिक्षक, शोधार्थी और साहित्य-प्रेमी के गुण एक-दूसरे के पूरक बनकर उभरे।
हिंदी साहित्य के प्रति अनुराग एवं प्रेरणास्रोत
डॉ. शकील अहमद अंसारी के साहित्यिक संस्कारों को विकसित करने में सरदार पटेल मेमोरियल कॉलेज, बिहारशरीफ के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष श्री रामाधीन प्रसाद जी की प्रेरणा का विशेष महत्त्व रहा। उनके मार्गदर्शन ने डॉ. अंसारी की साहित्यिक अभिरुचि को दिशा प्रदान की और हिंदी भाषा एवं साहित्य के प्रति उनके अनुराग को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साहित्य के प्रति अनुराग केवल पुस्तकों के अध्ययन तक सीमित नहीं रहता। वह मनुष्य को अपने समय, समाज, परिवेश और मानवीय संबंधों को अधिक गहराई से देखने की दृष्टि प्रदान करता है। जीवन के अनुभव, सामाजिक परिस्थितियाँ, व्यक्तिगत संघर्ष और दूसरों के सुख-दुःख के प्रति संवेदनशीलता किसी भी रचनाकार की अभिव्यक्ति को समृद्ध बनाते हैं।
डॉ. अंसारी के जीवन में शिक्षा, अध्यापन, शोध और साहित्यिक अभिरुचि का समन्वय दिखाई देता है। विद्यार्थी-जीवन के अभावों से लेकर रोजगार की कठिनाइयों और दीर्घ अध्यापन-जीवन तक के अनुभवों ने उन्हें जीवन की अनेक परिस्थितियों से परिचित कराया। एक संवेदनशील कवि के लिए ऐसे अनुभव विचार और अभिव्यक्ति की आधारभूमि बन सकते हैं।
उनकी साहित्यिक यात्रा इस विश्वास को पुष्ट करती है कि सृजनशीलता किसी निश्चित आयु, पद या व्यावसायिक सीमा में बँधी नहीं होती। साहित्य-साधना निरंतर अध्ययन, अनुभवों के प्रति सजगता और उन्हें अभिव्यक्ति देने की प्रक्रिया है। डॉ. अंसारी के व्यक्तित्व में यह साहित्यिक अनुराग उनके अध्यापन और शोध के अनुभवों के साथ विकसित होता दिखाई देता है।
सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य-साधना : सृजनशीलता की नई दिशा
वर्ष 2020 में सेवानिवृत्ति के बाद डॉ. अंसारी के जीवन में स्वतंत्र लेखन और काव्य-सृजन का पक्ष विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हुआ। सामान्यतः सेवानिवृत्ति को व्यावसायिक जीवन के एक अध्याय की समाप्ति के रूप में देखा जाता है, किंतु सृजनशील व्यक्तित्वों के लिए यह अपने भीतर संचित अनुभवों को अभिव्यक्त करने और साहित्यिक गतिविधियों को अधिक समय देने का अवसर भी बन सकती है।
डॉ. अंसारी ने सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य से अपना संबंध बनाए रखा। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं का प्रकाशन उनकी साहित्यिक सक्रियता का परिचायक है। लेखन के माध्यम से वे अपने विचारों, अनुभूतियों और जीवन-दृष्टि को पाठकों तक पहुँचाते रहे हैं।
उनके जीवन में साहित्य केवल अवकाश के समय का उपक्रम नहीं, बल्कि लंबे शैक्षणिक अनुभवों और जीवन-संघर्षों से अर्जित संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है। वर्षों तक विद्यार्थियों के बीच रहना, साहित्य का अध्ययन करना, शोधकार्य सम्पन्न करना और समाज को निकट से देखना उनकी रचनात्मक चेतना के महत्त्वपूर्ण आधार हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य से जुड़े रहना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि व्यक्ति की सार्थकता केवल उसके पद या पेशे से निर्धारित नहीं होती। उसकी वास्तविक पहचान उसके विचारों, कर्म, संवेदना और सृजनशीलता से बनती है। डॉ. अंसारी की साहित्यिक सक्रियता इसी जीवन-दृष्टि का परिचायक है।
मुंगेर विश्वविद्यालय का कुलगीत : जीवन की एक विशिष्ट उपलब्धि
डॉ. शकील अहमद अंसारी की जीवन-यात्रा में वर्ष 2022 का विशेष महत्त्व है। सेवानिवृत्ति के बाद इसी वर्ष उन्होंने मुंगेर विश्वविद्यालय, मुंगेर के कुलगीत की रचना की। यह उनके साहित्यिक जीवन की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, जिसे वे अपनी श्रेष्ठ उपलब्धियों में गिनते हैं। इस रचना के लिए विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें विशेष रूप से सम्मानित भी किया गया।
किसी विश्वविद्यालय का कुलगीत केवल शब्दों और स्वरों का संयोजन नहीं होता। वह उस संस्थान की शैक्षणिक चेतना, ज्ञानपरंपरा, आदर्शों, उद्देश्यों और सामूहिक आकांक्षाओं की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होता है। कुलगीत के माध्यम से विश्वविद्यालय की पहचान, उसके मूल्यों और शिक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को काव्यात्मक स्वर मिलता है।
ऐसे महत्त्वपूर्ण संस्थागत गीत की रचना का अवसर प्राप्त होना किसी भी साहित्य-साधक के लिए गौरव का विषय है। डॉ. अंसारी के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष अर्थ रखती है कि उनका पूरा जीवन शिक्षा और साहित्य के बीच विकसित हुआ। एक ओर उन्होंने दशकों तक प्राध्यापक के रूप में विद्यार्थियों को शिक्षित किया, तो दूसरी ओर कवि के रूप में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक अस्मिता को शब्द देने का अवसर प्राप्त किया।
उनकी यह उपलब्धि इस बात का भी संकेत है कि सेवानिवृत्ति के बाद जीवन की रचनात्मक संभावनाएँ समाप्त नहीं होतीं। अनुभव, अध्ययन और साहित्यिक अनुराग व्यक्ति को नए दायित्वों के निर्वहन के लिए समर्थ बनाते हैं। मुंगेर विश्वविद्यालय का कुलगीत डॉ. अंसारी की साहित्यिक यात्रा का एक विशिष्ट अध्याय है, जो उनके शैक्षणिक जीवन और काव्य-साधना के बीच सेतु का कार्य करता है।
इस रचना के लिए विश्वविद्यालय द्वारा दिया गया सम्मान उनके साहित्यिक योगदान की संस्थागत स्वीकृति के रूप में देखा जा सकता है। नालंदा की धरती से जुड़े एक संघर्षशील विद्यार्थी और पूर्व प्राध्यापक का मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलगीतकार के रूप में प्रतिष्ठित होना उनकी जीवन-यात्रा की उल्लेखनीय उपलब्धियों में सम्मिलित है।
1 अप्रैल 2023 की दुर्भाग्यपूर्ण घटना : जीवन-संघर्ष का अत्यंत कठिन अध्याय
डॉ. शकील अहमद अंसारी की जीवन-गाथा में 01 अप्रैल 2023 की एक अत्यंत पीड़ादायक घटना का उल्लेख भी आवश्यक है। उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, उस वर्ष के विषाक्त सांप्रदायिक माहौल के बीच वे गोलीबारी की घटना के शिकार हुए। उन्हें गोली मारी गई, किंतु वे जीवित बच गए। इस घटना के बाद उनका स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ और उन्हें अत्यंत प्रतिकूल स्वास्थ्य-स्थितियों का सामना करना पड़ा।
जीवन भर शिक्षा, अध्यापन, शोध और साहित्य-साधना से जुड़े रहने वाले व्यक्ति के लिए इस प्रकार की हिंसक घटना केवल शारीरिक पीड़ा का कारण नहीं बनती, बल्कि उसके सामान्य जीवन, दैनिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यों को भी प्रभावित कर सकती है। डॉ. अंसारी के संदर्भ में यह प्रसंग उनकी जीवन-गाथा का सबसे मार्मिक और दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है।
जिस व्यक्ति ने बचपन में अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए श्रम किया, बेरोज़गारी के दौर में निजी संस्थानों में अध्यापन कर जीवनयापन किया, दशकों तक महाविद्यालय में सेवाएँ दीं और सेवानिवृत्ति के बाद भी साहित्य-सृजन को अपनाए रखा, उसे जीवन के इस चरण में हिंसा और स्वास्थ्य-संकट का सामना करना पड़ा। यह विडंबना अत्यंत पीड़ादायक है।
उनकी इस स्थिति का उल्लेख करते हुए संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा बनाए रखना आवश्यक है। सांप्रदायिक विद्वेष किसी भी समाज की शांति, सह-अस्तित्व और मानवीय संबंधों के लिए घातक होता है। ऐसी घटनाएँ हमें स्मरण कराती हैं कि शिक्षा और साहित्य का वास्तविक उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान को मजबूत करना भी है।
डॉ. अंसारी की जीवन-यात्रा में यह प्रसंग एक गंभीर प्रश्न उपस्थित करता है—क्या शिक्षा और साहित्य से जुड़े व्यक्तियों सहित समाज के प्रत्येक नागरिक को भय और हिंसा से मुक्त जीवन का अधिकार नहीं होना चाहिए? किसी भी सभ्य समाज की पहचान इसी से होती है कि वहाँ व्यक्ति की सुरक्षा, गरिमा और मानवीय अधिकारों का कितना सम्मान किया जाता है।
उनके स्वास्थ्य पर इस घटना के प्रतिकूल प्रभाव की जानकारी उनकी जीवन-गाथा को अधिक मार्मिक बनाती है। तथापि, इस प्रसंग को उनकी संपूर्ण पहचान नहीं माना जाना चाहिए। उनका व्यक्तित्व इससे कहीं व्यापक है—वह एक संघर्षशील विद्यार्थी, समर्पित शिक्षक, शोधकर्ता और विश्वविद्यालय के कुलगीत के रचयिता का व्यक्तित्व है। उनकी उपलब्धियों और साहित्यिक योगदान को स्मरण करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना उनके साथ हुई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के प्रति संवेदना व्यक्त करना।
व्यक्तित्व एवं जीवन-संदेश : अभावों से उपलब्धियों तक
डॉ. शकील अहमद अंसारी का जीवन संघर्ष, स्वाभिमान, शिक्षा, कर्मनिष्ठा और सृजनशीलता के समन्वय का उदाहरण है। उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि उनकी उपलब्धियाँ किसी एक घटना या अवसर का परिणाम नहीं हैं, बल्कि वर्षों के परिश्रम, निरंतर अध्ययन और अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता से निर्मित हुई हैं।
विद्यार्थी-जीवन में ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाना, शिक्षा पूरी होने के बाद बेरोज़गारी के दौर में निजी संस्थानों में अध्यापन करना, विश्वविद्यालयीय सेवा में प्रवेश पाना, लगभग सैंतीस वर्षों तक अध्यापन करना, दो बार प्रभारी प्राचार्य का दायित्व निभाना और पी-एच.डी. के लिए शोधकार्य सम्पन्न करना—ये सभी प्रसंग उनके जीवन की संघर्षशीलता और कर्मनिष्ठा को सामने लाते हैं।
इसके साथ ही, सेवानिवृत्ति के बाद साहित्य-साधना जारी रखना और वर्ष 2022 में मुंगेर विश्वविद्यालय का कुलगीत रचकर सम्मान प्राप्त करना उनकी रचनात्मक उपलब्धियों को रेखांकित करता है। वर्ष 2023 की हिंसक घटना और उसके बाद उत्पन्न स्वास्थ्य-संबंधी कठिनाइयाँ उनके जीवन का अत्यंत पीड़ादायक पक्ष हैं, किंतु उनके समूचे व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते समय उनकी दीर्घ शैक्षणिक सेवा और साहित्यिक योगदान को भी समान महत्त्व दिया जाना चाहिए।
उनकी जीवन-यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश यह है कि प्रतिकूल परिस्थितियाँ मनुष्य की राह को कठिन अवश्य बनाती हैं, किंतु उसकी संभावनाओं को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकतीं। सीखने की ललक, परिश्रम करने का साहस और लक्ष्य के प्रति निष्ठा व्यक्ति को सीमित संसाधनों के बीच भी आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करते हैं।
डॉ. अंसारी का जीवन विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायी है। उनकी यात्रा बताती है कि शिक्षा प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करना, अपनी क्षमता के अनुरूप कार्य करते हुए आगे बढ़ना और अवसर मिलने पर अपने ज्ञान को समाज के हित में लगाना जीवन को सार्थक बनाने के महत्त्वपूर्ण उपाय हैं।
उनका व्यक्तित्व यह भी स्पष्ट करता है कि शिक्षा, शोध और साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। शिक्षा ज्ञान और विवेक का विकास करती है, शोध ज्ञान को गहराई प्रदान करता है और साहित्य उसे मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है। डॉ. अंसारी के जीवन में इन तीनों का समन्वय उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान है।
उपसंहार : ज्ञान की ज्योति से साहित्य के आलोक तक
नालंदा की धरती से जुड़े डॉ. शकील अहमद अंसारी की जीवन-गाथा अभावों से उपलब्धियों, संघर्ष से आत्मनिर्माण, अध्यापन से शोध-साधना और साहित्यिक अनुराग से संस्थागत सम्मान तक की एक प्रेरक यात्रा है। उनका जीवन इस तथ्य का साक्षी है कि मनुष्य की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल उसकी प्रारंभिक परिस्थितियों से नहीं किया जा सकता; उसके संकल्प, श्रम और निरंतर प्रयास भी उसकी उपलब्धियों को आकार देते हैं।
एक ऐसे विद्यार्थी, जिसने अपनी पढ़ाई के दौरान छोटे बालक-बालिकाओं को ट्यूशन पढ़ाकर अर्जित अल्प राशि से अपनी शिक्षा का खर्च जुटाया, ने आगे चलकर उच्च शिक्षा प्राप्त की, बेरोज़गारी के दिनों में अध्यापन के माध्यम से जीविका अर्जित की और अंततः विश्वविद्यालयीय सेवा में दीर्घकाल तक योगदान दिया। हिंदी साहित्य के प्रति अनुराग ने उन्हें शोध और काव्य-सृजन की दिशा में प्रेरित किया। रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी की साहित्य-साधना पर शोधकार्य उनकी शैक्षणिक गंभीरता का परिचायक है, जबकि मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलगीत की रचना उनके साहित्यिक जीवन की विशिष्ट उपलब्धि है।
वर्ष 2023 की गोलीबारी की घटना और उसके बाद उत्पन्न स्वास्थ्य-संबंधी कठिनाइयाँ उनकी जीवन-गाथा का अत्यंत दुखद पक्ष हैं। यह प्रसंग मानवीय जीवन की अनिश्चितताओं और हिंसा के विनाशकारी परिणामों की याद दिलाता है। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि उनके व्यक्तित्व को केवल इस त्रासदी के संदर्भ में न देखा जाए, बल्कि शिक्षा, अध्यापन, शोध और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को भी सम्मानपूर्वक स्मरण किया जाए।
डॉ. शकील अहमद अंसारी की जीवन-यात्रा का सार यही है कि अभाव मनुष्य की संभावनाओं का अंत नहीं हैं, शिक्षा आत्मनिर्माण का सशक्त माध्यम है, अध्यापन ज्ञानदान की सार्थक साधना है और साहित्य जीवनानुभवों को मानवीय संवेदना प्रदान करने वाला माध्यम है।
निस्संदेह, नालंदा के इस संघर्षशील व्यक्तित्व की जीवन-गाथा हमें परिश्रम, आत्मसम्मान, ज्ञाननिष्ठा और सृजनशीलता का महत्त्व समझाती है। मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलगीतकार के रूप में उनकी उपलब्धि उनके शैक्षणिक और साहित्यिक जीवन का गौरवपूर्ण अध्याय है। उनका जीवन-संदेश यही है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन क्यों न हों, ज्ञान के प्रति निष्ठा, कर्म के प्रति समर्पण और साहित्य के प्रति अनुराग मनुष्य के जीवन को अर्थपूर्ण बनाने की क्षमता रखते हैं। यही डॉ. शकील अहमद अंसारी के संघर्षशील जीवन की उपलब्धि है और यही उनकी जीवन-गाथा का प्रेरणादायी निष्कर्ष भी।
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