अभावों की धरती से ज्ञान के शिखर तक : भिक्षु प्रज्ञापाल का संघर्ष, साधना और अवदान
लेखक : साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, शंखनाद साहित्यिक मंडली
जिस व्यक्ति के पास विरासत में न संपत्ति हो, न सुविधाएँ और न ही कोई प्रभावशाली सामाजिक आधार, उसके लिए शिक्षा की राह आसान नहीं होती। लेकिन कुछ लोग अभावों को अपनी नियति मानने के बजाय उन्हें संघर्ष की ऊर्जा में बदल देते हैं। भिक्षु प्रज्ञापाल ऐसी ही शख्सियत हैं, जिन्होंने गरीबी, पारिवारिक विछोह, सामाजिक विषमता और संस्थागत उपेक्षा के बीच ज्ञान की साधना जारी रखी। किसान परिवार के एक बालक सूरज से भिक्षु प्रज्ञापाल और फिर एक शोधकर्ता, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता तथा बौद्ध चिंतक बनने तक की उनकी यात्रा असाधारण जिजीविषा की कहानी है।
संघर्ष की कोख से निकला एक सूरज :
भारतीय समाज में शिक्षा आज भी सबके लिए समान अवसरों का पर्याय नहीं बन सकी है। विशेषकर ग्रामीण किसान परिवारों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। खेतों में पसीना बहाकर परिवार का पेट पालने वाले किसान के पास भोजन और आवास की व्यवस्था के अतिरिक्त प्रायः इतने संसाधन नहीं होते कि वह अपने बच्चों को महानगरों या विश्वविद्यालयों में भेजकर उच्च शिक्षा दिला सके। ऐसे परिवेश में किसी किसान परिवार के बच्चे का विश्वविद्यालय तक पहुँचना और पी-एच.डी. जैसी उच्चतम शैक्षणिक उपाधि प्राप्त करना निश्चित रूप से उल्लेखनीय उपलब्धि है।
भिक्षु प्रज्ञापाल का जीवन इसी संघर्षशील चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। उनका जन्म 24 जुलाई 1954 को बिहार के नवादा जिले के छोटे से गाँव सौर में एक अत्यंत साधारण किसान परिवार में हुआ। पिता राम महतो और माता सुमित्रा देवी के घर पहली संतान के रूप में उनका जन्म हुआ। नवजात शिशु के आगमन को परिवार ने उगते सूरज की तरह देखा और उनका नाम सूरज रख दिया।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अभी सूरज ने जीवन की दुनिया को ठीक से समझना भी शुरू नहीं किया था कि उनके जीवन में अंधकार छा गया। तीन वर्ष की आयु के बाद, चौथे वर्ष के प्रारंभिक दिनों में ही उनकी माता का आकस्मिक निधन हो गया। बाल्यावस्था में मातृविहीन हो जाना किसी भी बच्चे के लिए असहनीय त्रासदी होती है। पिता खेती-किसानी में व्यस्त रहते थे। फलतः उनके लालन-पालन का दायित्व दादा-दादी के कंधों पर आ गया। मातृस्नेह की कमी और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों के बीच उनका बचपन बीता।
गुरुकुल की पाठशाला से विश्वविद्यालय तक :
सूरज की प्रारंभिक शिक्षा गाँव की पारंपरिक पाठशाला में हुई। उस समय गाँव में सरकारी विद्यालय नहीं था। एक गुरुजी गाँव के बच्चों को पढ़ाया करते थे। यह पाठशाला प्राचीन गुरुकुल परंपरा की स्मृति को जीवित रखे हुए थी। शिक्षा के बदले कोई नियमित मासिक शुल्क नहीं लिया जाता था। प्रत्येक शनिवार को विद्यार्थी अपने घरों से सूखा अनाज लेकर गुरुजी को देते थे, जिसे 'शनिचरा' कहा जाता था।
भादो के महीने में वर्ष में एक बार 'चक-चंदा' की परंपरा भी निभाई जाती थी। इस अवसर पर गुरुजी के साथ सभी विद्यार्थी घर-घर जाकर गीत गाते थे। विद्यार्थियों के अभिभावक अपनी सामर्थ्य के अनुसार अनाज, पैसे और वस्त्र आदि देकर गुरुजी के प्रति सम्मान प्रकट करते थे। यह व्यवस्था केवल शिक्षा का माध्यम नहीं थी, बल्कि समाज और शिक्षक के बीच आत्मीय संबंधों का भी प्रतीक थी।
विद्यार्थियों की दिनचर्या भी अनुशासित थी। वे सुबह पढ़ने जाते, दोपहर में भोजन के लिए घर लौटते और फिर विद्यालय आकर शाम तक अध्ययन करते। इसी पारंपरिक शैक्षणिक वातावरण में सूरज की बौद्धिक चेतना का विकास हुआ।
गाँव की पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने निकटवर्ती गाँव के उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वारिसलीगंज स्थित एस.एन. कॉलेज में दाखिला लिया। वहाँ से इंटरमीडिएट और हिंदी ऑनर्स में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। एक किसान परिवार के युवक के लिए यह उपलब्धि कम महत्त्वपूर्ण नहीं थी। लेकिन उनकी ज्ञान-पिपासा अभी शांत नहीं हुई थी।
नालंदा की धरती और बौद्ध अध्ययन की ओर प्रस्थान :
उच्च शिक्षा की आकांक्षा उन्हें नालंदा ले आई। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों को देखकर उनके मन में भारतीय बौद्ध ज्ञान-परंपरा के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न हुई। इन खंडहरों में उन्हें केवल अतीत की इमारतें नहीं दिखाई दीं, बल्कि विश्व को ज्ञान का प्रकाश देने वाली एक महान सभ्यता की स्मृतियाँ दिखाई दीं।
नालंदा की इसी ऐतिहासिक भूमि पर गया के भिक्षु जगदीश काश्यप द्वारा नवनालंदा महाविहार की स्थापना की गई थी। यहाँ पालि भाषा और बौद्ध अध्ययन की उच्चस्तरीय शिक्षा उपलब्ध थी। उस समय यह मगध विश्वविद्यालय के अधीन एक स्वतंत्र इकाई के रूप में कार्यरत था।
सूरज ने 1981-83 सत्र में पालि विभाग में नामांकन कराया। लेकिन शिक्षा प्राप्त करने की राह में आर्थिक संकट एक बार फिर सामने खड़ा था। महाविहार में विदेशी विद्यार्थियों के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रावास की व्यवस्था थी, किंतु भारतीय विद्यार्थियों के लिए समुचित आवासीय सुविधा उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में नालंदा में रहना और भोजन की व्यवस्था करना उनके लिए बड़ी चुनौती थी।
इसी दौरान उनकी मुलाकात कपटिया गाँव की एक विधवा महिला गुलविया देवी से हुई। वह कुष्ठ रोग से पीड़ित परिवार की सदस्य थीं। उनके पति का निधन हो चुका था और वह अपनी अशिक्षित पुत्री के विवाह को लेकर चिंतित थीं। समाज में कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के प्रति व्याप्त घृणा और अस्पृश्यता ने उनके परिवार को सामाजिक रूप से लगभग अलग-थलग कर दिया था।
सूरज ने उस युवती से विवाह करने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनके जीवन में एक नया मोड़ लेकर आया। विवाह के बाद उन्हें नालंदा में रहने और पारिवारिक जीवन व्यवस्थित करने का अवसर मिला। इसी बीच उनके दो पुत्र हुए। पारिवारिक दायित्वों के साथ-साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और मार्च 1985 में 64 प्रतिशत अंकों के साथ प्रथम श्रेणी में पालि की स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की।
यह सफलता केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उन तमाम सामाजिक और आर्थिक बाधाओं पर विजय थी, जो ग्रामीण निर्धन परिवारों के बच्चों की राह रोकती हैं।
अध्यापन, संस्थागत संकट और जीवन का नया मोड़ :
पालि में स्नातकोत्तर शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें राँची विश्वविद्यालय से संबद्ध वरियातु रोड स्थित संघमित्रा कॉलेज में पालि विभाग के व्याख्याता पद पर नियुक्ति मिली। उन्होंने वहाँ लगातार छह वर्षों तक अध्यापन किया। एक किसान परिवार से निकलकर विश्वविद्यालय स्तर पर अध्यापन तक पहुँचना उनके संघर्ष का महत्त्वपूर्ण पड़ाव था।
लेकिन संस्थागत विवाद ने उनके शैक्षणिक जीवन को फिर संकट में डाल दिया। कॉलेज के संचालन और प्रशासनिक स्थिति को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। कॉलेज के संचालक रामोतार वात्स्यायन के प्रयास से पटना उच्च न्यायालय के एक निर्णय के आधार पर संघमित्रा कॉलेज को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला। इसके परिणामस्वरूप राँची विश्वविद्यालय से उसकी स्थायी संबद्धता समाप्त हो गई।
उस समय बिहार सरकार के उच्च शिक्षा निदेशक पद पर राँची विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. पी.एन. ओझा कार्यरत थे। उन्होंने विश्वविद्यालय, कॉलेज प्रबंधन और बिहार सरकार के बीच समझौता कराने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। अंततः कॉलेज बंद हो गया। विद्यार्थियों को स्वतंत्र परीक्षार्थी के रूप में राँची विश्वविद्यालय से परीक्षा देनी पड़ी।
इस घटनाक्रम का प्रभाव प्रज्ञापाल के जीवन पर भी पड़ा। उन्होंने कुछ समय तक एक विद्यालय में अध्यापन किया। झारखंड में रहते हुए उनका परिचय आदिवासी समाज की सांस्कृतिक परंपराओं से गहरा हुआ। उन्होंने सरना संस्कृति और बौद्ध धर्म का तुलनात्मक अध्ययन प्रारंभ किया। इस विषय पर उनका साक्षात्कार 'सरणा संस्कृति और बौद्ध धर्म' शीर्षक से प्रतिष्ठित समाचारपत्र 'प्रभात खबर' में प्रकाशित हुआ। इस अध्ययन ने उनके भीतर सामाजिक न्याय, आदिवासी अस्मिता और बौद्ध दर्शन के अंतर्संबंधों को समझने की नई दृष्टि विकसित की।
सूरज से प्रज्ञापाल बनने की यात्रा :
कुछ समय बाद उन्होंने विद्यालय का अध्यापन छोड़कर बोधगया जाने का निर्णय लिया। वहाँ बुद्धरक्षित के परम शिष्य श्रद्धारक्षित से बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की और भिक्षु जीवन अपना लिया। इसी के साथ सूरज का नाम प्रज्ञापाल हो गया।
यह नाम परिवर्तन केवल धार्मिक औपचारिकता नहीं था, बल्कि उनके जीवन-दर्शन में आए व्यापक परिवर्तन का प्रतीक था। अब उनका जीवन व्यक्तिगत उन्नति की सीमाओं से आगे बढ़कर धम्म, ज्ञान, सामाजिक परिवर्तन और मानव मुक्ति की दिशा में समर्पित होने लगा।
उन्होंने बिहार और झारखंड के विभिन्न गाँवों में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार प्रारंभ किया। इस दौरान उन्होंने बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, जयपाल सिंह मुंडा और शहीद जगदेव प्रसाद के विचारों का गहन अध्ययन किया। इन महापुरुषों की सामाजिक परिवर्तनकारी चेतना ने उनके विचारों और कार्यों को नई दिशा प्रदान की।
उनकी दृष्टि में बौद्ध धम्म केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं था, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, करुणा, विवेक और सामाजिक न्याय पर आधारित जीवन-पद्धति था।
शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन का अभियान :
बोधगया में ही उनकी मुलाकात राष्ट्रपाल महाथेर से हुई। उस समय राष्ट्रपाल महाथेर अंतरराष्ट्रीय साधना केंद्र का संचालन कर रहे थे। प्रज्ञापाल ने वहाँ रहकर वर्षों तक ध्यान-साधना की। राष्ट्रपाल महाथेर की अध्यक्षता में बोधगया में वर्ल्ड बुद्ध फाउंडेशन का पंजीकरण हुआ। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से समाज के वंचित वर्गों का उत्थान करना था।
इसी उद्देश्य से झारखंड की चुहुपालु घाटी में आदिवासी बच्चों के लिए 'तथागत आदर्श' की स्थापना की गई। यहाँ प्रज्ञापाल ने बच्चों को शिक्षित करने का कार्य प्रारंभ किया। शिक्षा के साथ-साथ संस्था के आर्थिक संसाधनों को मजबूत करने के लिए उन्होंने उपलब्ध समय में चैंतसक डेयरी के संचालन का दायित्व भी संभाला। डेयरी के संचालन में मिली सफलता से संस्था को आर्थिक आधार प्राप्त हुआ।
इस आय से चुहुपालु घाटी में वर्ल्ड बुद्ध फाउंडेशन के नाम पर भूमि खरीदी गई और वहाँ सिद्धार्थ स्कूल की स्थापना की गई। बाद में इस विद्यालय को सीबीएसई पाठ्यक्रम के अनुरूप मान्यता मिली। विद्यालय कई वर्षों तक संचालित हुआ और प्रज्ञापाल ने इसके व्यवस्थापक के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह कार्य इस बात का प्रमाण था कि वे केवल विचारों और भाषणों तक सीमित रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे शिक्षा के लिए संस्थान खड़े करने, संसाधन जुटाने और उन्हें संचालित करने की व्यावहारिक क्षमता भी रखते थे।
नालंदा में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना :
शिक्षा और अनुसंधान के प्रति अपनी गहरी अभिरुचि के कारण प्रज्ञापाल पुनः नालंदा लौट आए। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ शैक्षणिक और पुरातात्विक गतिविधियों को संगठित रूप देने के उद्देश्य से उन्होंने 'बुद्धोलॉजिकल ट्रस्ट ऑफ इंडिया' की स्थापना की। इसके अध्यक्ष का दायित्व स्वयं संभाला और नालंदा चीनी बौद्ध मंदिर के मुख्य पुजारी भंते डॉ. यू. पञ्ञालिंकारा को सम्मानपूर्वक सचिव बनाया। दोनों ने मिलकर नालंदा और आसपास के क्षेत्रों में शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार किया।
जनवरी 1997 में प्रज्ञापाल ने बिहारशरीफ में सीबीएसई पाठ्यक्रम पर आधारित 'प्योर लैंड पब्लिक स्कूल' की स्थापना की। इसका उद्घाटन तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक कुमार और अपर समाहर्ता सभापति कुशवाहा तथा साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा ने दीप प्रज्वलित कर किया। विद्यालय के संचालन के लिए उन्होंने अपने मित्र भिक्षु शीलभद्र को आमंत्रित किया और बाद में विद्यालय का पूर्ण स्वामित्व उन्हें सौंप दिया। आज भी यह विद्यालय बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रहा है।
इसी प्रकार 1998 में उन्होंने चोरा बगीचा की मलिन बस्ती में दलित बच्चों के लिए एक विद्यालय स्थापित किया। यहाँ कामकाजी बच्चों की शिक्षा की विशेष व्यवस्था की गई थी। बच्चों को निःशुल्क पोशाक, पुस्तकें, कॉपियाँ, कलम और स्लेट उपलब्ध कराए जाते थे। इसका उद्देश्य उन बच्चों को शिक्षा से जोड़ना था, जो गरीबी और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण विद्यालय नहीं जा पाते थे।
नालंदा के चीनी बौद्ध मंदिर के भंते पञ्ञालिंकारा के सहयोग से बराकर गाँव में भी एक ग्रामीण विद्यालय की स्थापना की गई। इस कार्य में मुहम्मद तुफैल अहमद खाँ सूरी का सहयोग प्राप्त हुआ। इस विद्यालय से वर्षों तक ग्रामीण बच्चे लाभान्वित होते रहे।
इन संस्थागत प्रयासों में एक उल्लेखनीय विशेषता दिखाई देती है। प्रज्ञापाल ने शिक्षा को केवल संपन्न और सुविधाभोगी वर्ग का अधिकार नहीं माना, बल्कि उसे दलितों, आदिवासियों, गरीबों और कामकाजी बच्चों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
उपेक्षित बौद्ध विरासत की खोज और पुरातात्विक योगदान :
भिक्षु प्रज्ञापाल का योगदान केवल शिक्षा और सामाजिक कार्यों तक सीमित नहीं रहा। प्राचीन बौद्ध विरासत के संरक्षण के प्रति भी उनकी गहरी प्रतिबद्धता रही है। बुद्धोलॉजिकल ट्रस्ट ऑफ इंडिया की एक बैठक नालंदा स्थित चीनी बौद्ध मंदिर में आयोजित हुई। इसमें बिहार के प्राचीन बौद्ध पुरातात्विक स्थलों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि उपेक्षित पुरातात्विक स्थलों के संरक्षण और प्राचीन टीलों की खुदाई के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का ध्यान आकर्षित किया जाएगा।
इसी क्रम में नालंदा के खंडहरों के समीप स्थित रुक्मिणी स्थान, बराकर, चंडी मौ और राजगीर के विभिन्न पुरातात्विक टीलों का विस्तृत विवरण तैयार कर पुरातत्व विभाग को भेजा गया। इस पहल पर संज्ञान लेते हुए पटना क्षेत्र के तत्कालीन पुरातत्व अधिकारी मोहम्मद के.के. ने विस्तृत विवरण पुरातत्व निदेशालय को भेजा। इसके बाद उत्खनन की अनुमति प्राप्त हुई।
राजगीर से लगभग दस किलोमीटर उत्तर-पश्चिम स्थित चंडी मौ-बेलोर क्षेत्र में शुंग काल से लेकर पाल काल तक के सैकड़ों पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए। यह खोज बिहार की प्राचीन सांस्कृतिक और बौद्ध विरासत को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थी।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना के तत्कालीन अधीक्षक पुरातत्वविद् मोहम्मद के.के. ने इस उपेक्षित पुरातात्विक विरासत को सामने लाने में योगदान के लिए बुद्धोलॉजिकल ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष भिक्षु प्रज्ञापाल और सचिव भिक्षु पञ्ञालिंकारा की सराहना की।
यह उपलब्धि बताती है कि प्रज्ञापाल की दृष्टि केवल धार्मिक प्रचार तक सीमित नहीं थी। वे इतिहास, पुरातत्त्व और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को भी सामाजिक तथा बौद्धिक दायित्व मानते थे।
शोध-साधना और संस्थागत उपेक्षा का दंश :
शैक्षणिक क्षेत्र में प्रज्ञापाल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में पी-एच.डी. की उपाधि शामिल है। डॉ. हरेकृष्ण तिवारी, तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष, नवनालंदा महाविहार के निर्देशन में उन्होंने 'पालि एवं मगही भाषा का तुलनात्मक अध्ययन' विषय पर शोधकार्य पूरा किया और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
यह उपलब्धि उनके लंबे शैक्षणिक संघर्ष की परिणति थी। एक ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसने बचपन में आर्थिक अभाव, मातृवियोग और उच्च शिक्षा के लिए आवासीय संकट का सामना किया हो, शोध की दुनिया तक पहुँचना विशेष महत्त्व रखता है।
वर्ष 2009 में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा पालि-हिंदी शब्दकोश परियोजना प्रारंभ की गई। इस परियोजना में उन्होंने पालि और संस्कृत के विद्वान तथा पूर्व निदेशक डॉ. उमाशंकर व्यास के साथ शोध सहायक के रूप में कार्य करना शुरू किया। लगभग पंद्रह वर्षों तक, अर्थात् 2024 तक, उन्होंने इस परियोजना में अपनी सेवाएँ दीं।
लेकिन विडंबना देखिए कि इतने लंबे समय तक सेवा देने और शोध का अनुभव अर्जित करने के बावजूद उन्हें नवनालंदा महाविहार में स्थायी शैक्षणिक स्थान नहीं मिल सका। परियोजना समाप्त होते ही वे बेरोजगार हो गए।
यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या किसी शिक्षण एवं शोध संस्थान में योग्यता, अनुभव और समर्पण का मूल्यांकन निष्पक्ष ढंग से होता है? क्या वर्षों तक किसी परियोजना में योगदान देने वाले शोधकर्मी के भविष्य की कोई संस्थागत जिम्मेदारी नहीं होती? क्या ज्ञान-सृजन करने वाले व्यक्तियों को केवल परियोजना की अवधि तक उपयोग में लाकर बाद में उनके हाल पर छोड़ देना उचित है?
प्रज्ञापाल का अनुभव इन सवालों को और तीखा बनाता है। उनका मानना रहा है कि नवनालंदा महाविहार में योग्य लोगों को पर्याप्त अवसर नहीं मिला और संस्थान में पक्षपातपूर्ण प्रवृत्तियों ने स्थान बना लिया। उनके अनुसार, संस्थान के प्रशासनिक चरित्र में बदलाव के साथ अवसरों की उपलब्धता और सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी जटिल हुआ है।
यहाँ प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष के विरोध का नहीं, बल्कि उन संस्थागत व्यवस्थाओं की समीक्षा का है, जिनमें प्रतिभा और अनुभव के बावजूद योग्य शोधार्थियों को उचित अवसर नहीं मिल पाते। नालंदा जैसी विश्वविख्यात ज्ञानभूमि के लिए यह स्थिति विशेष रूप से विचारणीय है।
लेखन, साहित्य और बौद्धिक प्रतिबद्धता :
संस्थागत उपेक्षा और बेरोजगारी के बावजूद प्रज्ञापाल ने अध्ययन-अध्यापन तथा लेखन का कार्य नहीं छोड़ा। उनकी ज्ञान-साधना आज भी जारी है। नवनालंदा महाविहार के पुस्तकालय में उन्हें अध्ययन करते हुए देखा जा सकता है।
उनकी प्रकाशित साहित्यिक और वैचारिक कृतियों में 'मगही भाषा का इतिहास' (2024), 'कलाम सुत्त-सार', 'महामंगल सुत्त-सार', 'विश्व बुद्ध का ऋणी है' और 'हम बौद्ध क्यों बनें' प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त मगही भाषा के अनेक शब्दों का ऐतिहासिक अध्ययन करते हुए उन्होंने शोधपत्रों का प्रकाशन भी किया है।
विशेष रूप से 'मगही भाषा का इतिहास' जैसी कृति का महत्त्व इसलिए भी है कि मगही केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपरा की संवाहक है। इसके ऐतिहासिक विकास, शब्द-संपदा और भाषिक संरचना का अध्ययन क्षेत्रीय अस्मिता तथा भारतीय भाषाई विरासत को समझने में योगदान देता है। उनकी बौद्ध विषयक रचनाएँ भी धम्म के मूल सिद्धांतों को जनसामान्य तक पहुँचाने की उनकी प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त करती हैं।
भिक्षु प्रज्ञापाल का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है :
भिक्षु प्रज्ञापाल का जीवन एक व्यक्ति की सफलता-असफलता का सामान्य वृत्तांत नहीं है। यह उस सामाजिक व्यवस्था का आईना है, जिसमें प्रतिभा अक्सर आर्थिक अभावों, जातिगत विषमताओं, संस्थागत पक्षपात और अवसरों की असमानता से जूझती रहती है।
गाँव की एक साधारण पाठशाला से शिक्षा प्रारंभ करने वाला सूरज आज पालि, मगही, बौद्ध दर्शन, आदिवासी संस्कृति और पुरातत्त्व के अध्ययन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने अध्यापन किया, विद्यालय स्थापित किए, दलित और आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए काम किया, बौद्ध धम्म का प्रचार किया, पुरातात्विक स्थलों को प्रकाश में लाने का प्रयास किया और शोध तथा लेखन के माध्यम से ज्ञान की परंपरा को समृद्ध किया।
उनकी यात्रा में व्यक्तिगत उपलब्धियों से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है उनका सामाजिक अवदान। उन्होंने जिन संस्थाओं की स्थापना की, जिन बच्चों को शिक्षा से जोड़ा और जिन ऐतिहासिक स्थलों को पहचान दिलाने का प्रयास किया, वे उनके जीवन की वास्तविक उपलब्धियाँ हैं।
विडंबना यह है कि जिस नालंदा की ज्ञान-परंपरा से प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन अध्ययन और शोध को समर्पित किया, उसी नालंदा की एक प्रमुख शैक्षणिक संस्था में उन्हें अपने दीर्घकालीन अनुभव के अनुरूप स्थायी स्थान नहीं मिल सका। यह केवल भिक्षु प्रज्ञापाल की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा और शोध व्यवस्था के सामने खड़ा एक बड़ा प्रश्न है।
आज जब शिक्षा को बाजार, पद और प्रतिष्ठा के चश्मे से देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब प्रज्ञापाल जैसे लोगों का जीवन हमें याद दिलाता है कि ज्ञान की वास्तविक प्रतिष्ठा उसके सामाजिक उपयोग और मानवीय सरोकारों में निहित होती है।
वे उन लोगों में हैं, जिन्होंने अभावों को अपनी सीमा नहीं बनने दिया। मातृविहीन बचपन, किसान परिवार की आर्थिक विवशता, उच्च शिक्षा की कठिन राह, संस्थागत संकट, सामाजिक कार्यों की चुनौतियाँ और अंततः शोध-संस्थान की उपेक्षा—इन सबके बावजूद उनकी लेखनी और अध्ययन की लौ बुझी नहीं।
सचमुच, सूरज नाम का वह बालक जीवन के अनेक अंधकारों से गुजरकर प्रज्ञापाल बना। उसके जीवन का संदेश यही है कि ज्ञान की साधना किसी पद, प्रतिष्ठा या संस्थागत मान्यता की मोहताज नहीं होती। लेकिन एक सभ्य समाज और जिम्मेदार शैक्षणिक व्यवस्था का दायित्व अवश्य है कि वह ऐसे ज्ञान-साधकों को उनका उचित सम्मान, अवसर और स्थान प्रदान करे।
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